Saturday, December 22, 2018

डर लगता है


ये कहने में कि मुझे कभी-कभी डर लगता है
अब तो सचमुच डर लगता है
वो बात अलग है देश ये मेरा
प्यार है इससे, ये घर लगता है
पर इस घर में बहे अगर
निर्दोषों का खून कहीं
तो डर लगता है
अपने बच्चों जैसे सब इंसानों के बच्चे
क्या समझाएं उन्हें, कि क्यों कुछ लोग
अपने अधर्म के पक्के, अक्ल के कच्चे
दिख जाए कहीं जो खून सनी भयानक तस्वीरें
मासूमों का क्यों, क्या, कैसे, वाला सवाल
जैसे शर लगता है
सच कहता हूँ तब जवाब देने में
डर लगता है
वो कहते हैं कि डरो नहीं, हम हैं ना
हमारी ताकत ज़्यादा, दिखते कम हैं ना
क्या बतलाएँ उन्हें, कि इस ताकत में
भरा हुआ मुझे नफ़रत का ज़हर लगता है
जब भी उन गुस्से से भरी आंखों को देखूं
तो अब भी मुझे इक बच्चे सा ही डर लगता है
'पुलिस वाले अंकल तो ताकतवर हैं ना'
इक तस्वीर देखती मासूम का मुझसे है कहना
गंदी बात करने वालों को वो जेल ले जाते
फिर कैसे कोई उन्हे मार गया, आप क्यों नहीं बताते
जिन्हें लगता है सारे बयान सिर्फ सियासी हैं
वो बताएँ मासूम आंखों में क्यों भरी उदासी है
क्या जवाब दूं कि क्यों सब ही खूंखार से हो गए
गंगाजमुनी तहज़ीब भूल अंगार से हो गए
कैसे किसी की सोच को किसी के उकसाने पर
ज़हनो दिल में खून का प्यासा शज़र लगता है
ये सोच सोच कर सचमुच मुझे डर लगता है

गगन



Tuesday, December 18, 2018

34 साल बाद....


महाभारत में एक पात्र है दुर्योधन... लेकिन इसी पात्र को कहीं कहीं पुत्र मोह से ग्रस्त, सत्ता पर काबिज़ रहने की इच्छा रखने वाले धृतराष्ट्र ने सुयोधन कह कर भी संबोधित किया है। सुयोधन और दुर्योधन में फर्क सिर्फ उतना ही है जितना सज्जन और दुर्जन में है। किसी का नाम सज्जन होने से वो सज्जन हो जाए ऐसा ज़रूरी नहीं... कर्म के आधार पर ही किसी की सज्जनता या दुर्जन होने का पता लगता है। 1984 के नवंबर महीने के शुरूआती तीन दिन में देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों, गलियों और तमाम इलाकों को सिखों के खून से रंग देने का जो कातिलाना खेल खेला जा रहा था... 2018 में 34 साल बाद उस के नायक तो नहीं पर खलनायक को दिल्ली हाईकोर्ट ने आखिरकार सज़ा सुना दी... वही दिल्ली जिसे कौरव पांडव हस्तिनापुर कहते थे... उसके आधुनिक इतिहास में नवंबर 1984 की एक दो और तीन तारीख को ना सिर्फ संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द को शामिल करने वाले देश के लिए एक काले अध्याय के रूप में सदियों तक याद रखा जाएगा बल्कि कितने ही ऐसे लोग जिनकी चीखें... भीड़ के सामने मजबूर होने की दुहाई.... दरिंदों के हाथों लुटती अस्मत... और मेहनत और प्यार से बसाए आशियानों से उठता धुआँ आज भी इंसानियत का दम घोट देता है। दिल्ली हाईकोर्ट के माननीय न्यायधीश ने अपने फैसले में इस कत्लेआम को मानवता के विरुद्ध अपराध करार दिया। हालांकि अदालत ने ये फिक्र भी ज़ाहिर की कि हमारे देश के अपराध सम्बंधी कानून में नस्लकुशी और मानवता के विरुद्ध अपराध जैसे शब्दों का शामिल ना किया जाना चिंताजनक है। 34 साल बाद फैसला आया तो पीड़ित परिवारों की आंखों से आंसू छलक आए... अदालत के अंदर की तस्वीरें भी कुछ जुदा नहीं थी... फैसला सुनाते हुए जस्टिस मुरलीधर की आंखे भी नम थी और मामले में पीड़ितों की पैरवी कर रहे एच. एस. फूलका भी अपने सहयोगी वकीलों के साथ आंसुओं को रोक नहीं पाए। हाईकोर्ट की आनलाईन साईट से फैसले की प्रति डाउनलोड कर पढने की कोशिश की तो कई बार भावनाओं का आवेग रोकना नामुमकिन था। आखिर कैसे कोई इंसानी भीड़ इतनी हिंसक हो सकती है कि किसी शख्स को मारने के लिए एक या दो बार नहीं बल्कि तीन-तीन बार हैवानियत का नंगा नाच खेले। सोचिए क्या बीती होगी उस बेटी पर जिसके बाबुल को उसकी आंखों के सामने भीड़ ने ज़िंदा जला दिया हो... बचने की हर कोशिश नाकाम हुई हो और आखिरकार बचे हो सिर्फ जले हुए जिस्म... किसी का धड़. किसी की टांगे... किसी की बांह... ज़्यादातर मामले ऐसे जहां कत्ल किए गए लोगों के चेहरे जला दिए गए थे... गले में टायर डाल कर ज़िन्दा जला दिया... परिवारों ने पहचान की तो बाजुओं पर गुदे हुए नाम पढकर... कलाई पर बंधी घड़ी देखकर... या फिर कपड़ों के रंग से...। अदालत के फैसले के शुरूआती कुछ पन्ने ही पढ लिए जाएं तो दिमाग सुन्न हो जाता है। आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि कैसे इतने बड़े नरसंहार को अंजाम दिया गया। और क्यों... जवाब ढूंढने की कोशिश में नवंबर महीने का ही एक सूत्र हाथ लगा... साल 1950 था... संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने संविधान सभा में जो अंतिम वक्तव्य दिया उसकी पहली पंक्ति और दूसरा पैराग्राफ काफी कुछ बयान करता है। 

प्रजातंत्र को केवल बाह्य स्वरूप में ही नहीं बल्कि वास्तव में बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
....दूसरी चीज जो हमें करनी चाहिए, वह है जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को ध्यान में रखना, जो उन्होंने उन लोगों को दी है, जिन्हें प्रजातंत्र को बनाए रखने में दिलचस्पी है, अर्थात् ''अपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में भी समर्पित न करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान न कर दें कि वह संस्थाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाए।'' उन महान व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में कुछ गलत नहीं है, जिन्होंने जीवनपर्यन्त देश की सेवा की हो। परंतु कृतज्ञता की भी कुछ सीमाएं हैं। जैसा कि आयरिश देशभक्त डेनियल ओ कॉमेल ने खूब कहा है, ''कोई पुरूष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता, कोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।'' यह सावधानी किसी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में अधिक आवश्यक है, क्योंकि भारत में भक्ति या नायक-पूजा उसकी राजनीति में जो भूमिका अदा करती है, उस भूमिका के परिणाम के मामले में दुनिया का कोई देश भारत की बराबरी नहीं कर सकता। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परंतु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है।

एक बात समझ आई कि भारतीय प्रधानमंत्री मरहूम इंदिरा गाँधी के कत्ल के बाद हुए इस नरसंहार में जिन लोगों ने कातिलों का अग्रणी होने की भूमिका निभाई और जो इस बात का सहारा लेते हैं कि ये सिर्फ एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी (जबकि हकीकत इ्ससे कोसों दूर है)... वे तमाम लोग राजनीति में भक्ति या नायक पूजा के मतावलंबी तो अवश्य ही हैं या थे। और ऐसा नहीं कि राजनीति में नायक पूजा का ये दौर सिर्फ इंदिरा गांधी की मृत्यु के साथ ही शुरू या खत्म हो गया... बल्कि ये दौर अब भी जारी है। डॉ. अम्बेडकर ने उन लोगों के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर करने को कुछ हद तक सही माना था जिन्होंने जीवनपर्यन्त देश की सेवा की। पर मौजूदा दौर में एक बड़ी गिनती उन लोगों की है जो ऐसे नेताओं की अंध भक्ति में लीन है जिनका राजनीतिक कद ऊंचा तो बेशक बहुत ज़्यादा हो पर मर्यादित रूप में वे कहां किस पैमाने पर खरे उतरते हैं ये सवाल लाख टके का है। क्या नेताओं की अंध भक्ति का ये रास्ता और ऊपर से सत्ता का दुरुपयोग कर सियासत का किसी भी घटनाक्रम की जांच प्रक्रिया को प्रभावित करते जाना हमे सही मायने में दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र बना रहने देगा। शायद नहीं...

34 साल बाद हाईकोर्ट के फैसले ने बहुत सी उम्मीदों को ज़िन्दा किया है... पर इन 34 सालों में हमने गंवाया भी बहुत कुछ है इसे भी नकारा नहीं जा सकता... कितने ही परिवार ऐसे हैं जो वक्त पर न्याय ना मिलने से निराश हो कर दुनिया के दूसरे हिस्सों में जा बसे... और इसके साथ ही अपने दिलों में बसा कर ले गए एक नफरत.. देश के सिस्टम और कानून के लिए। इस नफरत का सहारा लेकर कोई भी उन्हें बरगलाए, उनके जज़्बात को छेड़ देश के खिलाफ कोई भी ज़हर उगलवाए तो उसके सामने हम बेबस से हो जाते हैं... क्यों कि उन लोगों की यादों में बसे ज़ख्म टीस देते हैं... कुछ मित्रों ने लिखा, पीड़ित परिवारों की आंखों में खुशी के आंसू.... माफी चाहता हूं पर अगर आप आंसुओं को कभी महसूस कर पाए हों तो आंसुओं में तपिश होती है.... माननीय अदालत ने जो फैसला सुनाया उससे पीड़ित परिवारों की आंखों से जो आंसू के रूप में बहा वो ऐसा दर्द था जिसे 34 साल तक वो अंदर ही अंदर पी रहे थे... आंसुओं को बाहर निकलने नहीं दिया... अंदर ही ये हलाहल इकट्ठा होता रहा... और गनीमत ये कि अब जाकर भी न्याय हुआ और दोषियों को सज़ा मिली.. तो ये लावा फूटा... इन आंसुओं की बूंदों में मैने महसूस किया एक मां का दर्द,  एक पत्नी की पीड़ा, एक बहन का संताप, एक बेटी की अनकही दास्तान... खुशी नहीं.... अभी भी कितने चेहरे ऐसे हैं जिनके खिलाफ गवाही देने को बहुत से लोग तैयार हैं... ये चेहरे बहुत बड़े ओहदों पर भी पहुंचे हैं.... अगर हम वाकई चाहते हैं कि 34 साल बाद ही सही पर दुनिया हमारे देश को एक सही मायने में लोकतांत्रिक देश का दर्जा दे तो एक कोशिश अब भी करने की ज़रूरत है जिस में दुनिया के अलग अलग कोने में जाकर बसे ऐसे परिवारों को इकट्ठा किया जाए जो गवाही देना चाहते हैं... सबूत देना चाहते हैं और बताना चाहते हैं वो दर्द जिसके गुनाहगार सिर्फ एक दो चेहरे नहीं बल्कि एक पूरी की पूरी जमात है... जो आज भी धमकियां देकर, रौब झाड़कर कानून की पहुंच से बाहर है। ऐसे लोगों को निर्भय कर और इस विश्वास के साथ देश लाया जाए कि उन्हें इन्साफ मिलेगा तो शायद हम एक नई सुबह की शुरूआत कर पाएं।   

Sunday, November 25, 2018

New Year Wish

नववर्ष  में सर्वत्र शांति हो
किसी के दिल में ना कोई भ्रांति हो
न कहीं भी कभी भी कोई क्रांति हो
सबको मिले खुशी, ना हो कोई fear
दुनिया में हर कोई दूजे को कहे
O my dear, Happy New Year

Dec 1999
Gagan

Sunday, October 28, 2018

गीत

चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे
है हवाओं में खुशबू तेरे प्यार की
धड़कनें क्यों न दिल की मचलती रहें

1)
लहरें सागर से करने लगी मसखरी
किश्ती मांझी को रस्ता बताने लगी
बेल पेड़ों से जाकर लिपटने लगी
पत्तियां शाख से क्यों बिछड़ती रहें
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे

2)
शब्दों से दूर होने लगी लेखनी
स्याही काग़ज़ पे फ़ीकी पड़ने लगी
आँखों ने आंसुओं को न रस्ता दिया
पलकों पे दावानल क्यों दहकती रहे
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे

3)
मेहंदी फीकी पड़ी, प्यार गहरा गया
उम्र बढती गई, हुस्न शरमा गया
वो तसव्वुर में मिलने को आते रहे
ख्वाबों से क्यों ना ये दिल बहलने लगे
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे

गगन

Wednesday, October 17, 2018

ज़िन्दगी

कट जाए अगर तो फिर ग़म क्या है
तू उलझ गई ये शिकायत है ज़िन्दगी
वो मिले तो आधी अधूरी चाहत जैसे
ये किस दौर की मोहब्बत है ज़िन्दगी
उसे दिल में उतरना अच्छे से आता है
ये तो कोई और ही दस्तक है ज़िन्दगी
हवा है खुशबू है बहार है मौसम भी है
मेरे लिए ही क्यों पतझड़ है ज़िन्दगी
बादल उसकी आँखों से बरसते हैं गगन
उसके लिए अधूरी सी हसरत है ज़िन्दगी

गगन

Monday, October 8, 2018

वो

खिड़की से तो चाँद निकलता कभी सुना था मैने ये
उसने झांका सूरज नज़रें नीची करके भाग गया
इक मुस्कान किसी की कैसे ले आती बहार यहाँ
उसके आंसू के कतरे से शहर समंदर पार गया
किसकी बोली कोयल को भी मीठी भाषा सिखलाए
उसकी चुप्पी से जीवन में तेज़ कोई तूफान गया
बहार की आमद होती जब भी उसका आना होता था
उसके जाने से पतझड़ का मौसम लगे पहाड़ हुआ
गगन भी चुप है, धरती चुप है, हवा ना कोई शोर करे
एक उसी की कमी से जग लगता जैसे शमशान हुआ

मैं

आंसू आग तूफान या धुआँ हूँ मैं
मुझमे उतर के देख तू क्या हूं मैं
तू जो सोचता रहा तेरा वहम था
मुझसे मिलके जान ले क्या हूं मैं
ख्वाब तेरे आसमां के पार जाते
ज़मीं पे हकीक़त की इंतेहा हूं मैं
ईमान की ज़मीं सादगी का करम
ऐसे मुल्क से गुज़रती हवा हूँ मैं
जो मौसम मोहब्बत जवाँ करे है
उसी रुत कोई गुल खिला हूँ मैं
उससे क्या मेरी हदें पूछते हो
गगन क्या जाने कि क्या हूँ मैं


वक्त

होंगी जागीरें या रहेगा फकीर
कैसे बोलेगी ये हाथों की लकीर
ऐसे लोगों को सब करें हैं सलाम
जो संवारें हैं बिगड़ी सी लकीर
सिर्फ किस्मत पे भरोसा ना कर
ज़ोर ए मेहनत से बदल दे तकदीर
जिन्हें होना था राजा, बन को गए
उस विधाता की कैसे पलटी लकीर
ज़िक्र ना इल्म का जिनके हाथ में था
देव की वाणी को दे गए वो नज़ीर
हाथ हाथों में उसने थाम लिया
फिर दिलों की मिल गयी थी लकीर
उठ गगन दिल में हौसला तो कर
देख वो कैसे बदलेगा तस्वीर

कुछ ना कुछ तो कहती हैं

अलसाई सी उसकी आँखें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
इंतज़ार में कट गई रातें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
उसकी आँखों में दुनिया के
धर्म ग्रन्थ सब पढ डाले
प्रार्थना और अरदास दुआएं
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
नफरत के नश्तर ने बींधा
वादी का बचपन सारा
बम गोली में तोतली बोली
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
खून पसीने से सींची पर
फसल खुदकुशी की काटी
खेतों में जलती वो चिताएं
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
सावन बरसेगा अब के तो
उम्मीदों की बारिश सा
आसमां को तकती निगाहें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
सबके सपने करूंगा पूरे
मंज़िल ग़र मिल जाएगी
पढी लिखी सबकी आशाएँ
कुछ ना कुछ तो कहती हैं

गगन

मासूम

37वां साल
बहुत कुछ सिखा देती है
जिन्दगी इतने सफर में
पर वो मासूम अभी भी
बच्ची सी है
मेरे दिल के घर में
कई ऐसे रिश्ते
कई ऐसे बंधन
मैं मन से जुड़ी थी
वो खोजते थे बस तन
समझ ही ना पाई
ये क्या हो रहा है
जिस जिस पे भरोसा था
सब खो रहा है
कैसे इस मोड़ पे
ले आई है ज़िन्दगी
ना शैतानियों का मन है
ना होती है बंदगी
किस से कहूँ
हाल ए दिल मैं सुनाऊं
कभी समझ ना पाई
किसे अपना बनाऊं
मैं पंछी सा आज़ाद
जीना चाहती हूँ
डर है किसी
जाल में फंस ना जाऊं
वो कब आएगा
जो मन को भी थामे
सिर्फ तन ना देखे
रूह को पहचाने
मेरी प्यास ऐसी
तलब बन गई है
अजब एक ज़िद
खुद से ही ठन गई है
कोई दे जो दस्तक
मेरे प्यारे दिल पे
चाहती हूँ आए
कहे कुछ वो मिल के
पर खुद ही मैं दरवाज़े
बंद कर रही हूँ
समझ नहीं आता
जी रहीं हूँ हर पल
या पल पल मर रही हूँ
मेरा हाथ थामो
मुझे ले ही जाओ
उस देस जहाँ से
सब देख पाओ
है तुम पर यकीं
कि शिकायत ना होगी
अमानत समझना
खयानत ना होगी

अधूरापन

रात अपनी है
नींद अपनी है
ख़्वाब अपने हैं
बात अपनी है
अपने हैं जज़्बात
ख्यालात अपने हैं
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है

आस अपनी है
प्यास अपनी है
अपना है सारा समंदर
अपनी है हर लहर
उजालों से पहले की
उजास अपनी है
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है

दिल अपना है
दिमाग अपना है
शरारत अपनी है
समझ अपनी है
अपनी है हर सोच
अपना हर सपना है
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है

कवि कर्म

काग़ज़ की तलवारों से लोहा जब काटा जाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

कुछ निर्बुद्धा जडबुद्धि जबसे राजा के चाटुकार हुए
कविताओं के मंच तभी से बिकते जैसे व्यापार हुए
कड़वे सच का शब्द घोल, कानों की मैल पिघलाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

सोने और चाँदी की कलमें, सत्ता के मसनद लील गए
कितने जो तलवे चाट मरे, कई कल्पनाओं के शील गए
काठ कलम से धरती का सच तख्ती पे लिक्खा जाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

खेतों में लटकती लाशों की, जिन्हें ना दिखती मजबूरी है
दिल्ली के उस सिंहासन की, गांव से बढ रही दूरी है
वोट की फसल काटने राजा, खलिहानों में जब आएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

धरती गगन मिल कर जागें, नव युग का सब आह्वान करें
वो झूठ के किले में बैठे जो, उन्हें सारा सत्य बयान करें
अपने अंतर्मन के सच को, जब हर कोई समझ में लाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा












Friday, September 7, 2018

दोहे

बने सियासत सारथी, कैसे कैसे लोग
देश मर रहा भूक से, उनके छप्पन भोग

बेशर्मी मरी शर्म से, सुनकर उनकी बात
कोटि बार बोलें असत्य, सत्य नहीं बन पात

वे बोलें तो दिवस कह, कह दें तो कह रात
देशभक्त ना बन सके जो राजभक्त बन जात

शब्द सुदर्शन चल गया, अब भक्त होंगे परेशान
त्राहिमाम करती धरा, हुए खत्म विधि विधान

झूठी पोथी बांच के, लई सरकार बनाय
राजा मन की बक रहा, बहरा हुआ समुदाय

बिन गृहस्थी के जो जिया, क्या जाने परिवार
वानप्रस्थ के काल में, राजा सजाए दरबार

पूरे जीवन जो ना चला, कभी भी सीधी राह
अनुशासन की बात करे, कैसे वो तानाशाह

गगन

Tuesday, August 28, 2018

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
कि कई मामलों की जांच,
कमीशन वाली सियासत में ना उलझती
तो इंसाफ़ हो भी सकता था
फरेबी कार्रवाइयों पर करोड़ों खर्चने वाला देश
बेअदबी और कत्ले-आम के मनहूस दाग
अपने माथे से धो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई जांच कोई गवाही कोई सुनवाई भी नहीं
सियासत ने कोई गुत्थी कभी सुलझाई ही नहीं
ना सरेआम नस्लकुशी करने वालों को सज़ा होती है
बेअदबी के दोषियों पे राजनीति ना एक रज़ा होती है
अदालतों में आस की डोर सांसों के साथ टूट जाती है
न्याय की देवी आंखों पे पट्टी बाँध भीतर भीतर रोती है
चंद सफेदपोशों ने हर मुद्दे को मज़ाक बना डाला है
कुरसी वालों ने वोट वालों संग किया गड़बड़झाला है
अब उम्मीद रक्खें भी तो किस से करें
उन्होंने शाही अंदाज़ से सब कत्ल कर डाला है
फिर कुछ वक्त के बाद वायदे दोहराए जाएंगे
कसमे वादे कर इंसाफ के सब्ज़बाग दिखाए जाएंगे
फिर शातिर सियासत शह और मात पहले तय कर लेगी
धर्म और जात के नाम पे लोग फिर अपनी जान गवाएंगे
और वो चलेगा कमिश्न या जांच टीम वाली फिर चाल नई
मैं जानता हूँ मेरे कपतान मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

Thursday, August 23, 2018

वंशानुगत बीमारी

बंधन आज भी
वैसे ही हैं
जो तब थे
जब सफेद बाल भी
स्याह थे
विद्रोह तब भी थे
आज भी जारी हैं
भूखे रहना
तब भी प्रदर्शन था
आज भी
दर्द भरे गीत
तब भी अपनापन जताते थे
आज भी बजते हैं
एमपी3 में
लगातार
कंकरीट के जंगलों में
हवा तब भी ख़ामोश थी
आज भी मौसम
दम घोटे हुए है
सिसकियां आज भी
सिर्फ तकिये को सुनाती हैं
अपनी आवाज़
लाल आंखों की कहानी
बहाने बना रही है
हर सुबह के बाद
अपनों के साथ
जंग जीतने का विश्वास
आज भी कायम
दिल का तेज़ धड़कना
आज भी बदस्तूर जारी है
यह इश्क़ की
वंशानुगत बिमारी है

-गगन

Sunday, July 8, 2018

एक चूहे की मौत !

'यार, ये कोई सिस्टम थोड़े ही है कि अगर चूहा गिरफ्त में आ गया तो उसे मार ही डालो... हां... अरे समझ में आता है कि कुछ फाइलों को नुक्सान पहुंचाया बेचारे ने... पर ऐसे थोड़े होता है कि सरेआम जान ही ले लो...' परेशानी के आलम में अपने बड़े बाबू सुबह से अब तक पता नहीं कितनी बार ये बात दोहरा चुके थे... सिलवटी चेहरे में पान और जर्दे से लाल हुए ओंठ उनके श्यामल चेहरे को मकान की दीवार पर टंगने वाले बजर बट्टू का रूप देते थे...। बस उनकी मूछें पीले रंग की नहीं थी... बाकी तो सब बिल्कुल वैसा... पलकों की सीमा रेखा को पार कर बाहर गिरने को बेताब आंखों की पुतलियां... मानो किसी ने बचपन में ही बड़े बाबू का गला दबा दिया हो और कार्टून फिल्मों के कैरेक्टर की तरह उनकी आंखें बाहर को निकल आई हों....। सरकारी दफ्तर में बाबू की कुर्सी को पिछले तकरीबन 28 साल से तोड़ने की कोशिश में लगे बड़े बाबू का ये चूहा प्रेम समझ नहीं आ रहा था...। मासूम से नए नवेले शागिर्द की तरह मैने भी आखिर पूछ ही लिया... 'बड़े बाबू ! बात क्या है... इतनी नाराज़गी... अरे एक चूहा ही तो मरा है... वैसे भी सारे दफ्तर में उसकी मौजूदगी से अजीब सी गंध भरी हुई थी...।'

'यही तो.... यही फर्क है तुम्हारी जेनरेशन एक्स वाई ज़ेड और हमारी जेनरेशन में.... हर चीज़ को बस एक ही नज़रिए से देखना.... अरे.... सोचो... थोड़ा दिमाग पर ज़ोर दो... कितना मददगार था ये चूहा सरकारी सिस्टम को चालू रखने में....।' बड़े बाबू तो बस बिफर ही पड़े।

'चालू रखने में... मतलब.... कैसे ?' सोचा नहीं था, पर एक दम मुंह से निकल ही गया, इंतज़ार किया कि बड़े बाबू आराम से ही जवाब दें।

'अरे मेरे चंदू लाल चंद्राकर... कैसे समझाऊं तुम्हें... तुम तो आए अभी हो.... साल भी नहीं हुआ... तुमसे पहले जीवन बाबू थे ना... उनकी रोज़ी बचाई थी इसी चूहे के पुरखों ने....।'

मामला मेरे लिए और ज़्यादा उलझ रहा था... चूहा और नौकरी... मतलब रॉबिन हुड टाईप चूहा... ना चाहते हुए भी चेहरे के हाव भाव में सवाल तैरने सा लगा। 'भई... जीवन बाबू ने सरकारी फाईल में हेराफेरी के ज़रिए किए थे लाखों के वारे न्यारे... जांच हुई तो फिर एक एक चीज़ की पड़ताल हुई... और सवाल जब फाईल का आया तो वो मिली ही नहीं.... जानते हो क्यों।'

'क्योंकि उसे... य... य... ये चूहा खा गया था' हैरानी के साथ आशंका के सम्मिश्रण वाला सवाल-कम-जवाब ज़ुबां पर आ ही गया। 

'जी... छोटे बाबू... समझो... समझो हालात को... अरे सिर्फ जीवन बाबू की नौकरी नहीं... कारपोरेशन की इस तीन मंज़िला सरकारी इमारत में सारी इमारत की भी जांच हो जाए तो भी कोई हमारे इस कमरे में आने की हिम्मत नहीं करता... जानते हो क्यों?' बड़े बाबू का अजीब सा सवाल था।

'हूं... ऊं... हुं... नहीं.. नहीं तो....' नादान शागिर्द जैसा मेरा जवाब आया।

'ये जो अभी थोड़ी देर पहले तुम जिस अजीब सी गंध का ज़िक्र कर रहे थे ना... वो गंध ही है जो इस कमरे के अंदर मौजूद फाईलों.... मेरे... तुम्हारे और इस कमरे के अंदर दम तोड़ते सरकारी सिस्टम के लिए लक्ष्मण रेखा का काम करती है... ये अजीब सी गंध ही है जिसने 28साल की सरकारी नौकरी के मेरे करियर में एक बार भी किसी भी अधिकारी को यहां फटकने भी नहीं दिया... ये गंध ही है जिसमें रमकर फाईलों में मुंह छुपाए हुए कितनी ही बार मैने कितनी ही इन्स्पेक्शन कमेटियों को जांच के दौरान काम में बिज़ी होने का गच्चा दिया है...।' बड़े बाबू का एकालाप जारी था। अब मेरी समझ में भी चूहा प्रेम की ये पीड़ा आने लगी थी। ये चूहा प्रेम दरअसल सरकारी सिस्टम के एक कटु शाश्वत सत्य की तरह मेरे सामने मुंह बाए खड़ा था। मैं मन ही मन सोच रहा था कि देश के सिस्टम से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति कर भी दी जाए तो क्या.... आखिर सिस्टम में फाईलों के निपटारक चूहे और उनके प्रति दफ्तरों के बाबुओं का ये प्रेम जब तक खत्म नहीं होगा... तब तक चूहाचार... मेरा मतलब भ्रष्टाचार जारी रहेगा।

Monday, July 2, 2018

तेरा जाना

खिड़की से तो चाँद निकलता कभी सुना था मैने ये
उसने झांका सूरज नज़रें नीची करके भाग गया
इक मुस्कान किसी की कैसे ले आती बहार यहाँ
उसके आंसू के कतरे से शहर समंदर पार गया
किसकी बोली कोयल को भी मीठी भाषा सिखलाए
उसकी चुप्पी से जीवन में तेज़ कोई तूफान गया
बहार की आमद होती जब भी उसका आना होता था
उसके जाने से पतझड़ का मौसम लगे पहाड़ हुआ
गगन भी चुप है, धरती चुप है, हवा ना कोई शोर करे
एक उसी की कमी से जग लगता जैसे शमशान हुआ

Tuesday, June 12, 2018

चंदा

अ सुबह...
ज़रा ख़ामोशी से देख...
वो गेसुओं की काली बदलियां
उन बदलियों मे मेरा चाँद है
पाक़ साफ मुहब्बत से भरपूर
वो पूर्णिमा की चमक लिए
मेरा प्यार है
हवाओं...!
तुम उसकी ज़ुल्फ़ें मत हिला देना
इन बदलियों को इस चाँद पे रहने दो
ये इसे मेरी नज़रों से बचाती हैं...
पर इन्हें मालूम नहीं
दिल में जब यार की तस्वीर बस जाए
तो फिर कहाँ किसी ओर नज़र जाती है
अभी मेरे चाँद ने आंखें नहीं खोली
वो जानता है कि उसके पास है
मय का दरिया
उसे मालूम है कि
मैं प्यासा हूँ जन्मों का
अ' चाँद जब जाग जाओ
तो कुदरत प' अपना करम करने के बाद
इस रुत को प्यारी सी नज़र से देखकर
फिर एक बार मेरी ओर चेहरा घुमा लेना
मेरे शहर में जुदाई की गर्मी है
इसे अपने अक्स से ठंडी सी हवा देना
मैं इंतज़ार करूंगा तेरे जागने का
उस के बाद ही इबादत मेरी शुरू होती है
गगन

Thursday, May 31, 2018

Shahkot Quote Unquote

ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਹੋ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ... ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਪੂਰੀ ਵਜਾਰਤ ਦੀ ਮਿਹਨਤ ਅਤੇ ਚੋਣ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦੇ ਆਖਿਰੀ ਦਿਨ ਮੁੱਖਮੰਤਰੀ ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸੜਕ ਤੇ ਉਤਰਨਾ ਕਾਮਯਾਬ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਰੇਤ ਦੀ ਮਾਈਨਿੰਗ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਚ ਵਿਵਾਦਾਂ ਚ ਘਿਰੇ ਰਹਿਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਹਰਦੇਵ ਸਿੰਘ ਲਾਡੀ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਦੇ ਸ਼ਾਹ ਬਣੇ... ਵੋਟਾਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਮਿਲੀਆਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਦੇ ਫਰਕ ਨਾਲ ਲਾਡੀ ਨੇ ਨਾਇਬ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਨੂੰ ਸ਼ਿਕਸਤ ਦਿੱਤੀ ਇਹ ਤਾਂ ਹਰ ਕਿਸੇ ਨੇ ਤੁਹਾਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਹੀ ਹੈ ਪਰ ਅਸੀਂ ਜੋ ਦੱਸਣ ਜਾ ਰਹੇ ਹਾਂ ਉਹ ਇਸ ਪੂਰੀ ਚੋਣ ਜੰਗ ਦੇ ਕਈ ਪਹਿਲੁਆਂ ਨੂੰ ਪੇਸ਼ ਕਰੇਗਾ... ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਬੇਸ਼ੱਕ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੇ ਦੋ ਦਹਾਕਿਆਂ ਤੋਂ ਸਥਾਪਿਤ ਗੜ੍ਹ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਕੇ ਸ਼ਾਹੀ ਜਸ਼ਨ ਮਨਾ ਸਕਦੇ ਨੇ ਵੱਡੇ ਵੱਡੇ ਬਿਆਨ ਵੀ ਕਾਂਗਰਸ ਜਾਰੀ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ ਪਰ ਸੱਚ ਇਹ ਵੀ ਹੈ ਕਿ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਹਲਕੇ ਦੀ ਜ਼ਿਮਨੀ ਚੋਣ ਲਈ ਕੈਪਟਨ ਕੈਬਿਨੇਟ ਦਾ ਸਕੱਤਰੇਤ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਤੱਕ ਹੀ ਸੀਮਤ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ.... ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਵੱਡੇ ਚਿਹਰਿਆਂ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਛੋਟੇ ਵਰਕਰਾਂ ਤੋਂ ਕੁੱਝ ਵੱਡੇ ਬੁਲਾਰਿਆਂ ਤੱਕ ਹਰ ਕੋਈ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਚ ਹਾਜ਼ਰੀ ਲੁਆ ਰਿਹਾ ਸੀ... ਹਾਜ਼ਰੀ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਉਮੀਦਵਾਰ ਦੀ ਜਿੱਤ ਲਈ ਸੀ ਜਾਂ ਆਪਣੀ ਹੀ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਮੰਤਰੀਆਂ ਨੂੰ ਇਹ ਦੱਸਣ ਲਈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਵੀ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਆਏ ਹਾਂ... ਇਹ ਆਗੂ ਹੀ ਬਿਹਤਰ ਦੱਸ ਸਕਦੇ ਨੇ... ਖੈਰ... ਚੋਣਾਂ ਨੇ ਅਤੇ ਚੋਣਾਂ ਚ ਹਰ ਪਾਰਟੀ ਇਸੇ ਤਰੀਕੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਬੰਦੀ ਕਰਦੀ ਹੈ.... ਕਾਂਗਰਸ ਨੇ ਕਿਲ੍ਹੇਬੰਦੀ ਚ ਮੰਤਰੀਆਂ ਦੀ ਅਨ-ਆਫੀਸ਼ੀਅਲ ਡਿਉਟੀਆਂ ਲਾ ਦਿੱਤੀਆਂ ਤਾਂ ਘੱਟ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਿਹਾ... ਕੈਂਪਿੰਗ ਕੀਤੀ ਖੁਦ ਸੁਖਬੀਰ ਬਾਦਲ ਤੇ ਬਿਕਰਮ ਸਿੰਘ ਮਜੀਠੀਆ ਹੋਰਾਂ ਨੇ... ਇਹ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੀ ਅਗਲੀ ਪੀੜੀ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਸਥਾਪਤ ਕਰਨ ਦੀ ਲੜਾਈ ਸੀ ਸੋ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਨੂੰ ਸਾਂਭਣ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਅਗਲੀ ਪੀੜੀ ਹੀ ਸਭਤੋਂ ਵੱਧ ਸਰਗਰਮ ਰਹੀ... ਅਜੀਤ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਸੀਨੀਅਰ ਬਾਦਲ ਦੇ ਮੋਢੇ ਨਾਲ ਮੋਢਾ ਜੋੜ ਕੇ ਤੁਰਨ ਵਾਲੇ ਸਿਪਹਸਲਾਰ ਸਨ ਤਾਂ ਨਾਇਬ ਕੋਹਾੜ ਨੂੰ ਹੱਲਾ ਸ਼ੇਰੀ ਦੇਣ ਲਈ ਛੋਟੇ ਬਾਦਲ ਯਾਨੀ ਸੁਖਬੀਰ ਹੁਰਾਂ ਨੇ ਮੋਰਚਾ ਬੰਨਿਆ... ਪਰ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੀ ਕਿਲ੍ਹੇਬੰਦੀ ਚ ਕਾਂਗਰਸ ਦੀ ਸਨ੍ਹਮਾਰੀ ਕਿਸ ਹੱਦ ਤੱਕ ਹੋਈ ਅੰਦਾਜ਼ਾ ਇਸੇ ਗੱਲ ਤੋਂ ਲਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਨਾਇਬ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਆਪਣੇ ਹੀ ਪਿੰਡ ਦੇ ਦੋਵੇਂ ਪੋਲਿੰਗ ਬੂਥਾਂ ਤੋਂ ਹਾਰ ਗਏ... ਕੋਹਾੜ ਕਲਾਂ ਪੂਰਬੀ ਦੇ ਪੋਲਿੰਗ ਬੂਥ ਨੰਬਰ 101 ਦੀਆਂ ਕੁੱਲ 706 ਚੋਂ 545 ਵੋਟਾਂ ਪੋਲ ਹੋਈਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਚੋਂ ਕਾਂਗਰਸ ਦੇ ਲਾਡੀ ਨੂੰ 298, ਨਾਇਬ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਨੂੰ 232 ਅਤੇ ਆਮ ਆਦਮੀ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਮਹਿਜ਼ ਇੱਕ ਹੀ ਵੋਟ ਹੱਥ ਲੱਗੀ... ਕੋਹਾੜ ਕਲਾਂ ਪੱਛਮੀ ਦੇ ਪੋਲਿੰਗ ਬੂਥ ਨੰਬਰ 102 ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਵੀ ਕੁੱਝ ਜੁਦਾ ਨਹੀਂ ਸੀ... ਕੁੱਲ 538 ਚੋਂ 445 ਵੋਟਾਂ ਪੋਲ ਹੋਈਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਚੋਂ ਕਾਂਗਰਸ ਨੂੰ 217 ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਨੂੰ 209 ਅਤੇ ਆਮ ਆਦਮੀ ਪਾਰਟੀ ਨੂੰ ਮਹਿਜ਼ ਇੱਕ ਹੀ ਵੋਟ ਮਿਲੀ... ਯਾਨੀ ਨਾਇਬ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਆਪਣੇ ਹੀ ਪਿੰਡ ਚ 74 ਵੋਟਾਂ ਦੇ ਫਰਕ ਨਾਲ ਹਾਰ ਗਏ... ਪਰ ਧੱਕਾ ਲੱਗਿਆ ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਕਾਕੜਕਲਾਂ ਨੂੰ ਜੋ ਨਾਇਬ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਦੇ ਦੋਵਾਂ ਪਿੰਡਾਂ ਚੋਂ ਸਿਰਫ ਦੋ ਵੋਟਾਂ ਹਾਸਿਲ ਕਰਕੇ ਬਾਕੀ ਦੇ ਉਮੀਦਵਾਰਾਂ ਤੋਂ ਵੀ ਪਛੜ ਗਏ... ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਦੇ ਨਾਲ ਇਹ ਹਾਲ ਸਿਰਫ ਪਿੰਡ ਕੋਹਾੜ ਚ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ... ਅਜਿਹੇ ਹੀ ਹਲਾਤ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਆਪ ਦੇ ਜੱਦੀ ਪਿੰਡ ਚ ਵੀ ਸਨ ਪਿੰਡ ਕਾਕੜ ਕਲਾਂ ਦਾ ਪੋਲਿੰਗ ਬੂਥ ਨੰਬਰ ਹੈ 49... ਚੋਣ ਕਮਿਸ਼ਨ ਵੱਲੋਂ ਮੁਹੱਈਆ ਕਰਾਏ ਗਏ ਅੰਕੜਿਆਂ ਮੁਤਾਬਿਕ ਕੁੱਲ੍ਹ 950 ਚੋਂ ਇੱਥੇ 675 ਵੋਟਾਂ ਪੋਲ ਹੋਈਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਚੋਂ ਹਰਦੇਵ ਲਾਡੀ ਇੱਕ ਵਾਰ ਮੁੜ ਮੋਹਰੀ ਰਹੇ 347 ਵੋਟਾਂ ਲੈ ਕੇ... ਜਦੋਂ ਕਿ ਨਾਇਬ ਸਿੰਘ ਕੋਹਾੜ ਨੇ 179 ਵੋਟਾਂ ਹਾਸਿਲ ਕੀਤੀਆਂ ਪਰ ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਆਪਣਾ ਪਿੰਡ ਵੀ ਨਾ ਜਿੱਤ ਸਕੇ ਅਤੇ ਸਿਰਫ 130 ਵੋਟਾਂ ਤੱਕ ਹੀ ਸੀਮਿਤ ਰਹਿ ਗਏ। ਇਹ ਸਿਰਫ ਰਤਨ ਸਿੰਘ ਕਾਕੜ ਕਲਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਨਹੀਂ ਇਸ ਹਾਰ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਆਮ ਆਦਮੀ ਪਾਰਟੀ ਨੂੰ ਸੋਚਣਾ ਹੋਵੇਗਾ ਕਿ ਉਹ ਕਿਹੜੀ ਰਾਹ ਤੇ ਤੁਰ ਪਈ ਹੈ... ਜਿਸ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਉਸ ਨੇ 2017 ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਪੰਜਾਬ ਚ ਹੋਈਆਂ ਦੋ ਜ਼ਿਮਨੀ ਚੋਣਾਂ (ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ ਤੇ ਸ਼ਾਹਕੋਟ) ਚ ਸਾਫ ਅਕਸ ਪਰ ਸਿਆਸੀ ਤਜ਼ਰਬੇ ਚ ਸਿਫਰ ਰਹੇ ਉਮੀਦਵਾਰਾਂ ਨੂੰ ਉਤਾਰ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਜ਼ਮਾਨਤਾਂ ਵੀ ਜ਼ਬਤ ਕਰਾ ਦਿੱਤੀਆਂ.. ਇਸ ਤਰੀਕੇ ਤਾਂ ਕੋਈ ਵੀ ਸ਼ਾਇਦ 2019 ਚ ਆਮ ਆਦਮੀ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਟਿਕਟ ਲਈ ਵੀ ਅਪਲਾਈ ਨਾ ਕਰੇ... ਉਹ ਗੱਲ ਵੱਖ ਹੈ ਕਿ ਆਪਣੇ ਹੀ ਇਲਾਕੇ ਚ ਹੋਏ ਲਿਟਮਸ ਟੈਸਟ ਚ ਫੇਲ੍ਹ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸੁਖਪਾਲ ਖਹਿਰਾ ਇਸ ਨੂੰ ਵੀ ਕੇਂਦਰੀ ਹਾਈ ਕਮਾਨ ਦੀ ਨਾਕਾਮੀ ਕਰਾਰ ਦੇ ਰਹੇ ਨੇ ਪਰ ਚੋਣ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦੇ ਆਖਿਰੀ ਦਿਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਡੋਰ ਟੂ ਡੋਰ ਕੈਂਪੇਨ ਤੇ ਨਜ਼ਰ ਰੱਖਣ ਦੀ ਥਾਂ ਸ਼ਾਹਕੋਟ ਛੱਡ ਰਾਣਾ ਗੁਰਜੀਤ ਦੀ ਸ਼ੁਗਰ ਮਿਲਾਂ ਚੋਂ ਪਾਣੀ ਦੇ ਸੈਂਪਲ ਲੈਣ ਚ ਬਿਜ਼ੀ ਖਹਿਰਾ ਨੂੰ ਕੀ ਆਪ ਦੇ  ਵਾਲੰਟੀਅਰਸ ਇਹ ਸਵਾਲ ਪੁੱਛਣਗੇ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਇੱਕ ਵੱਡੇ ਅਹੁਦੇ ਤੇ ਬਹਿ ਕੇ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਨਾਲ ਲੜ ਰਹੇ ਹੋ ਜਾਂ ਸਿਰਫ ਨਿੱਜੀ ਪੱਧਰ ਦੀ ਭੜਾਸ ਕੱਢ ਰਹੇ ਹੋ... ਵਾਲੰਟੀਅਰਸ ਸ਼ਾਇਦ ਹੀ ਪੁੱਛਣ... ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਨਵੇਂ ਦੌਰ ਦੀ ਸਿਆਸਤ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸੀਨੀਅਰ ਆਗੂ ਤੋਂ ਸਵਾਲ ਪੁੱਛਣਾ ਮਨਾ ਹੈ... 

Wednesday, May 30, 2018

पति पत्नी

माना वो भी थोड़ा जवां है
आखिर को मेरा हमनवा है
बाल मेरे जो उड़ गए थोड़े
गोरे से हुआ वो गेहुंआ है
एजी ओजी का दौर खत्म
क्यों चिल्लाते हो, क्या है?
पांडुलिपियां* संभालें कैसे!
घर में महाभारत हुआ है
मन माफिक सुनता है वो
कर अनसुना जो मैंने कहा है
रूखी सूखी मिश्री लगे थी
वो बादाम को कहे चना है
एक डोर से बंधे दो जीवन
36 का बेशक आंकड़ा है
हक दोनों का दूजे पर पूरा
बेलन का निशां अभी रवां है
मिला था 'गगन' से दीप जहाँ
क्षितिज वो कोरी कल्पना है

गगन

Friday, May 18, 2018

कच्छे वाले होते हैं अच्छे वाले

कच्छे वाले होते हैं अच्छे वाले
झूठे या सच्चे वाले
कुंवारे या बच्चे वाले
पक्के और कच्चे वाले 
कच्छे वाले होते हैं अच्छे वाले
कच्छे का रंग
बातों का ढंग
शासन नहीं संघ
बनाए नियम निराले
कच्छे वाले होते हैं अच्छे वाले 
जिन्होंने शाखा लगाई
लाठी ले की रखवाई
अब हुई जब फसल कटाई
खुल गए किस्मत के ताले
कच्छे वाले होते हैं अच्छे वाले
कैसी प्रभु की माया है
कच्छा हर जगह छाया है
राज्य को वो हैं पालते
जिन्होंने ना बच्चे पाले
कच्छे वाले होते हैं अच्छे वाले
सीधा सच टेढ़ा होता है
प्रजा परेशान जागती
कलि में राजा सोता है
गगन भी आंसू बहाए
धरा पर है दुर्काले
कच्छे वाले बन गए हैं अच्छे वाले

Saturday, April 21, 2018

ट्राय का घोड़ा

एथेन्स नहीं इंडिया में आया
दिन बदलूंगा नारा लगाया
चमका दमका सबको भरमाया
अब ये सब कुछ तोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

लकड़ी नहीं ये हाड़ मांस का
कातिल है सबके विश्वास का
नायक बनकर महारास का
ये लंबी-लंबी छोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

सबको इसने बांट दिया है
अच्छे अच्छों को छांट दिया है
जो ना माने उन्हें काट दिया है
ये किसको आखिर जोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

बेलगाम दुनिया में ये घूमे
इसके बंदर देख के झूमे
बातों में ये सूरज को चूमे
उल्टी सीधी जोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

आओ इसको मिलकर रोकें
अपने हक से इसको ठोकें
सवाल करने के मिलें जो मौके
पूछना मुंह क्यों मोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

गगन

Thursday, April 19, 2018

चाय

आओ दोस्त
चाय पी लें
बीते लम्हे
फिर जी लें
वो
जो नुक्कड़ वाली
चाय की फड़ी है
जहां कितनी ही
यादें जुड़ी हैं
वहां बैठ
बातों का बस्ता खोलें
सपनों के कंचे निकालें
उमंगों की आंख मिचौली खेलें
आओ दोस्त
चाय पी लें
क्या कहा
मीठी नहीं
फीकी चाय
थोड़ी सी ठंडी भी हो
ये चाय है
ज़िन्दगी नहीं
बिना मीठे
और गर्माहट के
बेस्वाद लगती है
रिश्तों की नर्मी के
हम लम्हे संजो लें
आओ दोस्त
चाय पीलें
याद है पिछली बार
जब यहां आए थे
सूरज की धूप थी
थी चिड़िया की भी आवाज़
पेड़ की मंद मंद हवा ने
कैसे बदल दिया था
मौसम का मिज़ाज
खाली गिलास
देसी मट्ठी
और वो
सीमेंट के बीम का बैंच
राह देख रहा है
आज भी
आओ
एसी की ठंडक से बाहर
फिर उस रुत को जी लें
आओ दोस्त
चाय पी लें

-गगन दीप चौहान

Sunday, April 15, 2018

कुछ देखना बाकी नहीं

मेरे देश की आज नई तस्वीर देख लो
कुंद हुई इंसाफ की सब शमशीर देख लो

इंसानियत सरे बाज़ार हुई तार तार है
नरभक्षियों के हक में खड़ी ये भीड़ देख लो

राम के भक्त, रहीम के बन्दे परेशान हैं
धर्म की किसने की बदरंग तस्वीर देख लो

अबके कोयल सावन रुत ना कूकें शायद
भेड़ियों ने सब तोड़ ली हैं जंज़ीर देख लो

पानी में मिला लहू और खून हो गया पानी
भाईचारा नफरत ने किया तक़्सीम देख लो

ये मेरा वो तेरा हर तरफ आग लगी है
भूल गए सब गंगा जमुनी तहजीब देख लो

बातचीत के जो भी ज़रिए थे सब उसके थे
फिर उसने खींची खामोशी की लकीर देख लो

मुंसिफ कैसे मुफलिस की फरियाद सुनेगा
खड़े कटहरे में राजा और वज़ीर देख लो

किस से जाकर कहें 'गगन' इंसाफ दिला दो
क़ातिलों से मिल गए मेरे ये वकील देख लो