ये कहने में कि मुझे कभी-कभी डर लगता है
अब तो सचमुच डर लगता है
वो बात अलग है देश ये मेरा
प्यार है इससे, ये घर लगता है
पर इस घर में बहे अगर
निर्दोषों का खून कहीं
तो डर लगता है
अपने बच्चों जैसे सब इंसानों के बच्चे
क्या समझाएं उन्हें, कि क्यों कुछ लोग
अपने अधर्म के पक्के, अक्ल के कच्चे
दिख जाए कहीं जो खून सनी भयानक तस्वीरें
मासूमों का क्यों, क्या, कैसे, वाला सवाल
जैसे शर लगता है
सच कहता हूँ तब जवाब देने में
डर लगता है
वो कहते हैं कि डरो नहीं, हम हैं ना
हमारी ताकत ज़्यादा, दिखते कम हैं ना
क्या बतलाएँ उन्हें, कि इस ताकत में
भरा हुआ मुझे नफ़रत का ज़हर लगता है
जब भी उन गुस्से से भरी आंखों को देखूं
तो अब भी मुझे इक बच्चे सा ही डर लगता है
'पुलिस वाले अंकल तो ताकतवर हैं ना'
इक तस्वीर देखती मासूम का मुझसे है कहना
गंदी बात करने वालों को वो जेल ले जाते
फिर कैसे कोई उन्हे मार गया, आप क्यों नहीं बताते
जिन्हें लगता है सारे बयान सिर्फ सियासी हैं
वो बताएँ मासूम आंखों में क्यों भरी उदासी है
क्या जवाब दूं कि क्यों सब ही खूंखार से हो गए
गंगाजमुनी तहज़ीब भूल अंगार से हो गए
कैसे किसी की सोच को किसी के उकसाने पर
ज़हनो दिल में खून का प्यासा शज़र लगता है
ये सोच सोच कर सचमुच मुझे डर लगता है
गगन
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