Sunday, April 22, 2012

तेरी ओर जाने वाली हवा से

सुन, तुझे उड़ना तो आ गया
लेकिन उड़ान संभल कर भरना
पहाड़ों की तरफ से होकर जाओ
तो थोड़ा ठहरना, रुकना फिर चलना
इस मौसम में बेलगाम परिंदे हैं
और मुझे तेरी उड़ान से मोहब्बत है
तेरी दो प्यारी-सी आँखे इतनी उंचाई से
जब जब ज़मीन पर मुझे ढूँढती हैं
मैं ख़ामोश सा लफ्ज़ों में गुम हो जाता हूं
लफ्ज़ इकट्ठे आ जाते हैं, बारिश जैसे
यादें, बातें, मुस्कान, रोना-हंसना, सबकुछ
इतनी ज़्यादा बारिश की कभी आदत ना थी
मैं एक एक बूंद को छूने वाला
कैसे समेट लूं इस लफ्ज़ों के तूफान को
अपने अनकहे शब्दों की चादर में
अब तो चादर भी भीग गई है
कल रात आँखें ज़्यादा गीली हो गई थी ना
बड़ों के लिए सब आसान होता है
मैने सुना है
देखा नहीं किसी ने अब तक
आसमान जैसे बड़े की मुश्किल आसानी को
कहां समेटे आँखों का पानी
कैसे रोके चादर को भीगने से
और कहां थाम ले लफ्ज़ों के तूफान
तुझे उड़ना तो आ गया हवा
तू ही ले जा सब कुछ
उस ओर
उसी की ओर.....
गगन