कुबेरों को कोई इक चीज़ भी महंगी नहीं लगती
मुफलिसों को हर इक शै के बढे हुए दाम लगते हैं
हों भरे पेट तो पकवान सब बेस्वाद हैं लगते
लगी हो भूक तो फिर चने भी बादाम लगते हैं
वो जानें क्या है हाथी, घोड़े, उनके, ऊंट की चालें
सियासी बिसात पे वज़ीर भी हमें गुलाम लगते हैं
वो सपनों का मसीहा है, दिखाता झूठ की दुनिया
के अच्छे दिन हमें तो मारे गए गुलफ़ाम लगते हैं
अंधेरा है बनो जुगनू भले पर कोशिशें करना
शमां रौशन जो करते थे अभी आराम करते हैं
चलो जल्दी से लिखो कुछ, यूँ ही कोई तुक मिला देना
अदब के काम ये उनको, बड़े आसान लगते हैं
ज़मीं से जड़ें जुड़ती हैं, भले ऊंचा हो कोई पेड़
हजारों गगन को छूने के, लाख अरमान रखते हैं
Thursday, January 17, 2019
मारे गए गुलफ़ाम
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