Thursday, September 26, 2024

*दिल पे ना लें*


चौकीदार शब्द भी 
पेटैंट हो गया 
जब से देश का राजा 
प्रधान SERVANT हो गया 
अब चौकीदार को कुछ कहो
तो चाटुकार चिल्लाते हैं
पता नहीं क्यूं हर बात 
दिल पे ले जाते हैं
अरे तीखा लगा थोड़ा 
तो पी लो ठंडा पानी
अभी तो बाकी है
आनी-आनी वाली कहानी
आनी-आनी के हाथ में 
मानों देश का हर 'आना' है 
चौकीदार से आनी-आनी का 
रिश्ता बड़ा पुराना है
चौकीदार बना राजा 
या राजा ने की चौकीदारी 
सोती रही देश की जनता
आनी-आनी से निभाई यारी
दिन महीने बरसों की 
हदें सब कर दी पार
पक्की यारी निभाकर चमकाया
आनी-आनी का कारोबार
जनता चिल्ला रही सुनिए राजा जी 
हम लोगों की परेशानी 
राजा जी को गोदी में 
खिला रहे आनी-आनी
आनी-आनी और राजा का 
कैसा ये चमत्कार है
पढ़े लिखे डिग्रीधारी बने 
अंधभक्त चाटुकार हैं
मुश्किल जनता की 
ना लेती कम होने का नाम है
सवाल पूछना घोषित हुआ 
देश द्रोह का काम है 
हे आनी... हे राजा 
बजा दिया है तुमने मिलकर 
देश मेरे का बाजा 
कब तक आखिर जनता को 
झूठ-कपट से भरमाओगे
इस बार के झटके से नहीं संभले 
तो फिर बिल्कुल साफ हो जाओगे
इतिहास के पन्नों को पलट लेना 
पता चलेगी दास्तान पुरानी 
जब जनता सोच लेती है बदलाव
तो लिख देती है नई कहानी 
अच्छा भईया! विदा लेता हूं
कहा सुना सब माफ हो
मन की बात कहने से पहले 
मन का मैल तो साफ हो
 
गगन

Tuesday, September 17, 2024

उसकी आवाज़

मैं सुनना चाहता था तुम्हें 
कुछ ऐसे 
कि बस 
तुम कहती रहो 
और मैं सुनता रहूं 
इंतजार कुछ सालों का था 
जो सदियों सा लग रहा था 
और फिर 
मैंने तुम्हें सुना 
जैसे सुनाई देती है 
रेगिस्तान में बारिश की आवाज 
जैसे घने जंगल में सुनाई देता है 
कुदरत का संगीत 
जैसे पूरी खामोशी में 
आपका दिल आपसे करता है बात 
कुछ ऐसे ही 
मैंने सुना तुम्हें
 एक अरसे के बाद 
और हैरान हूं मैं 
कि कैसे 
तुमने संभाल कर रखी है 
अपनी आवाज में वह खनखनाहट 
जिसमें डूबा हुआ है 
इस पूरे जहान का संगीत

गगन

Thursday, August 22, 2024

काश! कृष्ण तुम ऐसा करते

कर रहा दुशासन शील भंग 
जब द्रोपदी का सरे-दरबार 
अंगुली पर बंधी पट्टी के बदले 
तुमने लगा दिया अम्बार
शक्तिशाली भाई थे तुम 
यह शक्ति उसे थमा देते
काश! कृष्ण तुम ऐसा करते 
द्रोपदी को दुर्गा बना देते
शीलभंग करने वाले का 
शीश-भंग होता प्रतिकार 
ना रोती अबला बनती सबला
यह विश्व भी करता जय-जयकार
किसी दुशासन में फिर कहां दम था 
जो सोच भी ले मन में व्यभिचार
त्रेता द्वापर से कलिकाल तक 
यह अजब सी रीत चली आई
अब-जब नारी पर पड़े बिपता
ना आते कृष्ण ना रघुराई
देवी शक्ति के गढ़ से अब
हस्तिनापुर तक कोहराम मचा
फिर दुशासन ने द्रोपदी के
शील हरण का काल रचा
दे देते सुदर्शन चक्र उसे
दुशासन का काल बना देते
काश! कृष्ण तुम ऐसा करते 
द्रोपदी को दुर्गा बना देते। 
तुम नहीं करोगे तो तय है ये
जन-जन में रोष यूँ जागेगा
अस्मत का लुटेरा कोई भी हो
मौत से डरकर भागेगा
चौराहे पर जब फिर लाश टंगेंगी
ऐसे जुल्म और अत्याचारों की
शायद तब ही हो खत्म कहानी
नारी संग होते व्याभिचारों की
तुम कर्ता थे, ये दृश्य तुम्हीं
द्वापर में काश दिखा देते
काश! कृष्ण तुम ऐसा करते 
द्रोपदी को दुर्गा बना देते

गगन

Wednesday, August 7, 2024

दांव सियासी

 100 तक की सांप सीढ़ी

98 तक पहुंच गई

99 पर था एक सांप

सांप था या साज़िश 

ज़हर था या सियासत

काश! कुचल पाती 

उस सांप का फन 

अपने पांव से 

पहलवानी दांव से

जीत लाती असली स्वर्णकाल 

लिख देती इतिहास 

नाम देश के 

जो आता सचमुच 

काम देश के 

उन लाखों बच्चियों के 

जिन्हें नहीं मिलता मौका

कोख से बाहर आने का

उन हज़ारों लड़कियों के 

जिनके लिए मुश्किल है 

राह स्कूल कॉलेज जाने का 

उन अनेकों युवतियों के 

जिन्हें नहीं आज़ादी 

सपने देख उन्हें सच करने की 

देती एक उम्मीद उन्हें

अंधेरे में रोशनी की दीद उन्हें

पर इक सांप ने खेल बिगाड़ा है

घड़ियाली आंसुओं का लिया सहारा है 

पर झूठ ज़्यादा दिन नहीं चलेगा

क्योंकि झूठ के नहीं होते पांव

मैं फिर से उठूंगी.. खेलूंगी पहलवानी दांव 

और फिर से पहुंचूंगी अपनी मेहनत के दम पर 

100 के शिखर पर... स्वर्णिम पल पर 

बस याद रखना हमेशा 

कि मैं हारी नहीं हूं.. हराई गई हूं

दस्तावेज़ी दांव में फंसाई गई हूं

पर आग में तपकर आई हूं मैं 

कुंदन बन कर चमक फैलाऊंगी 

मैं उठूंगी.. लड़ूंगी फिर... और जीतूंगी

विनेश हूं मैं... जीतने के लिए आऊँगी


गगन

Thursday, February 22, 2024

इंतज़ार

दो प्याली
वहीं रक्खी हैं
उसी कोने वाली मेज पर
जहाँ की कुर्सियां
और दीवार भी
जानती हैं हमें
पहचानती हैं खुश्बू
मेरी और तुम्हारी
और महसूस करती हैं
हमारी तरंगों कीआवृत्ति
मैं पढ़ लेता हूँ
धुले हुए कप पर
निशान तुम्हारी उंगलियों के
आओगी इस बार
तो देखूंगा
क्या उसी अंदाज में
आज भी पकड़ती हो
एक प्याली चाय की

गगन

Thursday, July 20, 2023

जंगल

ओ  इंसानों
ढूंढ लो अपने लिए
कहीं और, धरती नई
यहाँ जंगल राज है
यहाँ का राजा शेर है
आम बात है जिसके लिए 
हिरणियों, भेड़ों और मेमनों का शिकार
उसकी सेना भी
हिंसक, वहशी और जंगली
निरी आदमखोर
जिस तस्वीर ने
विचलित कर दिया तुम्हे
शेर की गुफा में
भरी पड़ी हैं 
ऐसी तस्वीरों की एल्बम
जिन्हें खोल लेता है
गाहे-बगाहे सेना के सामने
भर देता है नफरत
ज़हन- ओ- दिल में
कल ही की तो बात है
जंगल के कंटीले दरख़्त की
सबसे ऊंची डाल के सिरे पर
टांग दिया था
नन्हें खरगोश शावक का शरीर
जिसे मादा शावक की
कोख से चीर लाए थे भेड़िये
भूल गए होगे तुम 
इंसानी फितरत के शिकार
ज्यादा याद नहीं रहता तुम्हे
शेर के हृदय में
पीड़ा है आज क्यों कि
इंसानों के सामने
नग्न हो गई है
उसकी असलियत
क्रोध है क्योंकि
जुबान वाले हैं इंसान
उसकी जूठन में बची
बोटियां चाटने के लिए
जीभ लपलपाते, हुआ हुआ करते
रंगे सियारों जैसे गूंगे नहीं
ओ इंसानों
ढूँढ लो धरती कहीं
जंगलराज में बस
शेर है राजा

गगन

Saturday, June 10, 2023

मेरा दीवाना...

हंसी मेरी अगर सुन ले
मस्ती में झूम लेता है
मेरा दीवाना शायर है
शब्दों से चूम लेता है
जो कह दूँ कि जाओ
दुनिया देख कर आओ
मुझे ही देखता रहता है
और बस घूम लेता है
भले ही फूल हों कितने
कलियों ने डाला घेरा हो
मेरी खुशबू से वाकिफ है
सांसो से सूंघ लेता है


🖋गगन