Sunday, July 16, 2017

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है... कड़ियां

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि 'कड़ी निन्दा' कहने वाला कहते ही मर जाए
उसकी लाश पे कोइ कुछ लाख मदद धर जाए
पर ऐसा अक्सर होता नहीं है,
भाषण देने वाला रोता नहीं है।
ये 'कड़ी निन्दा' मानो मिसाइल बन गया है
ना चलती हैं तोप, ये ज़ुबां पे तन गया है
संस्कृति की बात करने वाले, संस्कृत को हैं भूले
"शठे शाठ्यम समाचरेत्" पर हम झुलाते हैं झूले
ये लफ्फाजी, ये खोखला बड़प्पन हमें कहाँ ले जाएगा
देशवासी यूँ ही बेमौत मरे, तो देश कहाँ चल पाएगा
अपने ही देश में घूमने को हम इजाज़त क्यों मांगे?
विदेशों में घूमने वाला बड़ी बड़ी डींग क्यों हांके?
कोई ये ना पूछेगा कि भीड़ खामोश क्यों थी?
कोई ये ना समझेगा सियासत मदहोश क्यों थी?
पर इस बात की बार बार तोहमत लगेगी
जो बोल सकते थे, क्या सहमत थे वे भी ?
कानों से सुनना और आंखों से बस देखना
कलम को कुंद और अक्ल को मंद बना देता है
तुम्हारा बोलना इसलिए ज़रूरी है दोस्त
कि खामोश रहना ज़ुबां को जंग लगा देता है
धरती का सूरज छिपे तो भी सुबह की आस होती है
आत्मा के अंधेरे में भटकती जिन्दगी अभिशाप होती है
मैं ये वो सब तमाम बातें जानता हूँ
अपने भीतर का तमस पहचानता हूँ
हर शब्द को सौ बार छानता हूँ मेरे दोस्त मगर फिर भी
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है!
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कभी-कभी पार्ट -3 इस बार आओ सोचें!
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि सारे राज-भोगी गर कर्मयोगी बन जाते
तो राम राज आ भी सकता था 
विश्व गुरू बन कर भारत
दुनिया को राह दिखा भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि दया, धर्म, प्यार और प्रेम की कोई बात ही नहीं
एंटी-रोमियो बन गए वो जिनकी कोई औकात ही नहीं
ना अक्ल, ना शक्ल, ना आचार है, ना विचार,
अजब अंदाज़ में वो सबको सिखाने चले हैं सदाचार
इज्जत की जीत के बाद अब दौर ए बदनामी आएगा ?
जहाँ हर रिश्ते को शक की नजर से देखा जाएगा !
और मेरे लिखे की हकीकत वो कहां समझ पाएगा।
मै जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
गगन
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कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि फेसबुक के लाइक्स और ट्विटर के ट्वीट 
वोटों में बदलते तो हम सौ हो भी सकते थे
हमारी गुगली सही डल जाती तो सबको धो भी सकते थे
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई सी एम, मिनिस्टर और सीपीएस तक नहीं
जबरन मिले विपक्ष के नेता पद की हमें ख्वाहिश थी नहीं
ना कोई चुनाव नज़दीक ना ही रैली कोई
भड़ास मन की खांसी मे निकालनी होगी
अब सोच समझ के हर जगह बोलना होगा
या फिर ईवीएम में कमी खंगालनी होगी
मैं जानता हूँ मेरे वालन्टियर्स मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
गगन दीप चौहान
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कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
कि ग़र सरकारी नौकरी मिल जाती 
तो ज़िंदगी में आराम हो भी सकता था
शाम को चाय पीकर बिस्कुट खाकर
दो घड़ी आराम से मैं सो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि कहीं कोई monday, Tuesday, Wednesday
Thursday और Friday की सूरत ही नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह से ज़िन्दगी जैसे
इसे Saturday और Sunday की ज़रूरत भी नहीं
ना कोई बोनस ना इन्क्रीमेन्ट ना प्रमोशन का कोई सुराग
भटक रही है आफिस में ज़िन्दगी मेरी
इक दिन रह जाऊंगा 
खोकर फाइलों के ढेर में कहीं  
मैं जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
गगन दीप चौहान