Saturday, April 21, 2018

ट्राय का घोड़ा

एथेन्स नहीं इंडिया में आया
दिन बदलूंगा नारा लगाया
चमका दमका सबको भरमाया
अब ये सब कुछ तोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

लकड़ी नहीं ये हाड़ मांस का
कातिल है सबके विश्वास का
नायक बनकर महारास का
ये लंबी-लंबी छोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

सबको इसने बांट दिया है
अच्छे अच्छों को छांट दिया है
जो ना माने उन्हें काट दिया है
ये किसको आखिर जोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

बेलगाम दुनिया में ये घूमे
इसके बंदर देख के झूमे
बातों में ये सूरज को चूमे
उल्टी सीधी जोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

आओ इसको मिलकर रोकें
अपने हक से इसको ठोकें
सवाल करने के मिलें जो मौके
पूछना मुंह क्यों मोड़ रहा है
ट्राय का घोड़ा दौड़ रहा है

गगन

Thursday, April 19, 2018

चाय

आओ दोस्त
चाय पी लें
बीते लम्हे
फिर जी लें
वो
जो नुक्कड़ वाली
चाय की फड़ी है
जहां कितनी ही
यादें जुड़ी हैं
वहां बैठ
बातों का बस्ता खोलें
सपनों के कंचे निकालें
उमंगों की आंख मिचौली खेलें
आओ दोस्त
चाय पी लें
क्या कहा
मीठी नहीं
फीकी चाय
थोड़ी सी ठंडी भी हो
ये चाय है
ज़िन्दगी नहीं
बिना मीठे
और गर्माहट के
बेस्वाद लगती है
रिश्तों की नर्मी के
हम लम्हे संजो लें
आओ दोस्त
चाय पीलें
याद है पिछली बार
जब यहां आए थे
सूरज की धूप थी
थी चिड़िया की भी आवाज़
पेड़ की मंद मंद हवा ने
कैसे बदल दिया था
मौसम का मिज़ाज
खाली गिलास
देसी मट्ठी
और वो
सीमेंट के बीम का बैंच
राह देख रहा है
आज भी
आओ
एसी की ठंडक से बाहर
फिर उस रुत को जी लें
आओ दोस्त
चाय पी लें

-गगन दीप चौहान

Sunday, April 15, 2018

कुछ देखना बाकी नहीं

मेरे देश की आज नई तस्वीर देख लो
कुंद हुई इंसाफ की सब शमशीर देख लो

इंसानियत सरे बाज़ार हुई तार तार है
नरभक्षियों के हक में खड़ी ये भीड़ देख लो

राम के भक्त, रहीम के बन्दे परेशान हैं
धर्म की किसने की बदरंग तस्वीर देख लो

अबके कोयल सावन रुत ना कूकें शायद
भेड़ियों ने सब तोड़ ली हैं जंज़ीर देख लो

पानी में मिला लहू और खून हो गया पानी
भाईचारा नफरत ने किया तक़्सीम देख लो

ये मेरा वो तेरा हर तरफ आग लगी है
भूल गए सब गंगा जमुनी तहजीब देख लो

बातचीत के जो भी ज़रिए थे सब उसके थे
फिर उसने खींची खामोशी की लकीर देख लो

मुंसिफ कैसे मुफलिस की फरियाद सुनेगा
खड़े कटहरे में राजा और वज़ीर देख लो

किस से जाकर कहें 'गगन' इंसाफ दिला दो
क़ातिलों से मिल गए मेरे ये वकील देख लो

Wednesday, April 11, 2018

इन्हें माफ न करना!

नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं
रेस्तरां में पार्टी का जश्न मना
जनता का उल्लू बनाते हैं

कितने दलितों पर चला दांव
तब दिल्ली उन्हें नसीब हुई
जैसे चाहा फिर राज किया
कामयाब सभी तरकीब हुई
इनकी बातों में आकर क्यों
हम आपस में लड़ते जाते हैं
नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं

कब सदन चले कब बंद रहे
ये किस पर करता निर्भर है
ये देश चलाने वालों का
क्यों दोहरा दिखे चरित्र है
तीखे सवालों से बचने को
ये मीठी बातें बनाते हैं
नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं

धरने जिन्हें लगें ताकत की दवा
जो आम आदमी के ख़ैरख़्वाह
वो कहते कुछ और करते कुछ
चाहें मिले हमें बस वाह वाह वाह
राजनीति की नई उम्मीदों पर
वो माफी फेरते जाते हैं
नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं

गगन

Tuesday, April 10, 2018

संविधान सभा में डॉ अम्बेडकर के वक्तव्य के अंश

"प्रजातंत्र को केवल बाह्य स्वरूप में ही नहीं बल्कि वास्तव में बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए? मेरी समझ से, हमें पहला काम यह करना चाहिए कि अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निष्ठापूर्वक संवैधानिक उपायों का ही सहारा लेना चाहिए। इसका अर्थ है, हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा। इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग और सत्याग्रह के तरीके छोड़ने होंगे। जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का कोई संवैधानिक उपाय न बचा हो, तब असंवैधानिक उपाय उचित जान पड़ते हैं। परंतु जहां संवैधानिक उपाय खुले हों, वहां इन असंवैधानिक उपायों का कोई औचित्य नहीं है। ये तरीके अराजकता के व्याकरण के सिवाय कुछ भी नहीं हैं और जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही अच्छा है।
दूसरी चीज जो हमें करनी चाहिए, वह है जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को ध्यान में रखना, जो उन्होंने उन लोगों को दी है, जिन्हें प्रजातंत्र को बनाए रखने में दिलचस्पी है, अर्थात् ''अपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में भी समर्पित न करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान न कर दें कि वह संस्थाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाए।'' उन महान व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में कुछ गलत नहीं है, जिन्होंने जीवनर्पयत देश की सेवा की हो। परंतु कृतज्ञता की भी कुछ सीमाएं हैं। जैसा कि आयरिश देशभक्त डेनियल ओ कॉमेल ने खूब कहा है, ''कोई पुरूष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता, कोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।'' यह सावधानी किसी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में अधिक आवश्यक है, क्योंकि भारत में भक्ति या नायक-पूजा उसकी राजनीति में जो भूमिका अदा करती है, उस भूमिका के परिणाम के मामले में दुनिया का कोई देश भारत की बराबरी नहीं कर सकता। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परंतु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है।
तीसरी चीज जो हमें करनी चाहिए, वह है कि मात्र राजनीतिक प्रजातंत्र पर संतोष न करना। हमें हमारे राजनीतिक प्रजातंत्र को एक सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना चाहिए। जब तक उसे सामाजिक प्रजातंत्र का आधार न मिले, राजनीतिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता। सामाजिक प्रजातंत्र का अर्थ क्या है? वह एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करती है।"
-डॉ. भीम राव अम्बेडकर
संविधान सभा में अंतिम वक्तव्य के अंश
नवंबर 1950
साभार

Sunday, April 8, 2018

क़ातिलों का शहर

खुलकर बोलने से पहले
मुंह खोलने से पहले
ज़ुबां डोलने से पहले
शब्द घोलने से पहले
जानो! यहां बरपा कहर है
ये क़ातिलों का शहर है

ज़िन्दा ना कोई यहाँ
ज़िन्दा लाशें सभी हैं
मरघट में जाकर सोई
एक पूरी सदी है
आबोहवा में यहां
नफरत का ज़हर है
ये क़ातिलों का शहर है

विश्व शांति के साधक
मौन हो गए हैं
जो कल तक थे मुख्य
आज गौण हो गए हैं
अराजकता का अंधेरा
ना इसकी सहर है
ये क़ातिलों का शहर है

धर्म संस्कृति की यहाँ
हाट लगी है
गंगाजल की बोली
घाट-घाट लगी है
पानी को भी बनाया
पैसों की नहर है
ये क़ातिलों का शहर है

राजा की नीति ने
विश्वासघात किया है
आमजन को मलाल
किसका साथ दिया है
दम तोड़ गई
यहाँ लोक लहर है
ये क़ातिलों का शहर है

गगन





अंधेरा

चारों ओर
दूर तलक
आस पास भी
बाहर भी अंदर भी
छाया है घटाटोप
अंधेरा
बेचैनी और बेबसी का
अंधेरे में छुपी है
खामोशी सदियों की
सवाल करोड़ों के
ब्लैक होल में
समा जाती है दुनिया
क्या इस
अंधेरे से भी
पैदा होगी
नई दुनिया

गगन

माफ़ी

किसी ने गुफ़ा में दी
तो पहुंचा सलाखों के पीछे
किसी ने हलफनामे देकर मांगी
तो पहुंचा सवालों के नीचे
माफ़ी देने वाला
माफ़ी मांगने वाला
दोनों बराबर के कसूरवार
कहीं उसकी सरकार
कहीं इसकी सरकार
पर भूल गए हैं दोनों
कि जब लगे उसकी अदालत
तो ना माफ़ी चलेगी
ना दलील की दरकार
वहां रहती है बराबर
इंसाफ़ की तराजू
और पड़ती उसकी लाठी
जो होती है बे-आवाज़

गगन

प्यार

ओस की बूँद का
सारी रात फूल पर बिताना
सूरज की नज़रों से बचने को
दिन चढ़े फ़ना हो जाना
प्यार है

माथे पे पसीना
आंखों में चमक
दो जून की रोटी कमाना
मिट्टी में मिट्टी होकर
ऊपर देख मुस्कुराना
प्यार है

गुलाब के फूलों का
तोहफा नहीं
सारे गुलाब बेचकर
उसके लिए ले जाना
अखबार के टुकड़े में लिपटी
कुछ मिठाई
प्यार है

अंग्रेजी के तीन लफ्ज़ नहीं
या हिन्दी के ढ़ाई आखर नहीं
इनके साथ जुड़ी
हर साँस हर धड़कन
प्यार है

गगन

अच्छे दिन

पिलाकर चाय बेस्वाद नींद देश की उड़ाई
पकौड़ा बेचने को फिर रोज़गार बता गए
पुराने सब खतम सारे नए नए नोट थे
उनके प्यारे आ के सीधे बैंक से उड़ा गए
साहेब गर्व से कहते हैं अच्छे दिन आ गए
मोहब्बत की निशानी योगी के हाथ में
गृह-त्यागी चले लिए भोगी को साथ में
देश सुनता था जिसे अलग ही जज़्बात में
मन की बात कर के सारे किस्से मिटा गए
साहेब गर्व से कहते हैं अच्छे दिन आ गए
-गगन



खोज

बंदिशें ख़्वाहिशों का पता ढूंढती हैं
खिज़ां कलियों की खता ढूंढती है
नींद तेरे शहर में बे-ख्वाब आती है
हर दस्तक यहाँ मेरा पता ढूंढती है
है भीड़ बहुत, हमसफर भी बहुत हैं
किसे फिर निगाह हर जगह ढूंढती हैं
मेरे अहबाब लाए बगल में ही खंजर
पुलिस सबकी जेबों में क्या ढूंढती है
जो आए नहीं वादा करके अभी तक
ये पलक आँसुओं का निशां ढूंढती हैं
वो बरसेगा कब ये तो उसको पता है
फिर धरा क्यों गगन में घटा ढूंढती है

गगन

बुत बोलते क्यों नहीं?

बुत
बामियान से
बेलोनिया तक
तोड़े गए
पर ख़ामोश रहे
बुद्ध और लेनिन
बाकी बुत भी
भगत सिंह भी
गांधी भी
बुत बोलते नहीं
चुपचाप देखते हैं
बरबादी का कारवां
अपनी और विचारों की

टूट जाता है सब
वक्त के साथ साथ
बिखर जाता है
बरबाद होती है बुनियाद
सब कुछ टूटने
और बिखरने पर भी

जो चुप रहते हैं
वो बन जाते हैं
बुत
बामियान से बेलोनिया तक

गगन

वक़्त

वक्त इंसान की फितरत बदल देता है
हुस्न ईमान की नीयत बदल देता है
ना कोई आम, ना ख़ास इसके सामने
भगवान की भी किस्मत बदल देता है
जिनके लिए कल तक मैं खाक ना था
उनकी नज़रों में इज़्ज़त बदल देता है
खुशामद और प्यार में है फर्क इतना
कहे अलफ़ाज़ के अर्थ बदल देता है
धूप और छांव का खेल ये ज़िन्दगी
हवा का झोंका मौसम बदल देता है
गगन चूमने को बेताब कई इमारतें
ज़लज़ला आके सूरत बदल देता है

गगन

ਭਗਤ ਸਿੰਘ

86 ਬਾਰ ਤੇਰੀ ਸ਼ਹਾਦਤ
ਯਾਦ ਕਰ ਚੁੱਕੀ ਸਿਆਸਤ
ਮੁੜ ਤੇਰਾ ਨਾਂ ਲਿਆਈ
ਅੱਜ ਆਪਣੀ ਜ਼ੁਬਾਨ 'ਤੇ
ਇੰਕਲਾਬ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ
ਮੁੜ ਗੂੰਜਿਆ ਹੈ
ਸਿਆਸੀ ਅਸਮਾਨ 'ਤੇ

ਇਸ ਵਾਰ ਬਿਆਨ ਨਵੇਂ
ਅਫ਼ਸਾਨਾ ਨਵਾਂ ਹੈ
ਨਸ਼ੇ ਦੇ ਮੁੱਦੇ ਨੂੰ ਭਖਾਉਣ ਦਾ
ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਬਹਾਨਾ ਨਵਾਂ ਹੈ
ਆਪ ਤਾਂ ਅਜੇ ਛੱਡ ਨਾ ਸਕੇ
ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੀ ਸਮਝਾਉਣਗੇ
ਚੜ੍ਹੀਆਂ ਲਾਲ ਸੁਰਖ ਅੱਖਾਂ ਵਾਲੇ
ਕਿਵੇਂ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਨਸ਼ਾ ਛੁਡਾਊਣਗੇ
ਸਹੁੰ ਚੁਕਾਉਣ ਵਾਲਿਆਂ ਦਾ
ਆਪ ਮਾੜਾ ਹਾਲ ਹੈ
ਸਹੁੰ ਖਾਉਣ ਵਾਲੇ ਸੁਣੋ
ਕਰਦੇ ਕੀ ਕਮਾਲ ਹੈ?
ਅੱਜ ਵਹਾਟਸਐਪ-ਫੇਸਬੁਕ 'ਤੇ
ਤੂੰ ਸਾਰੇ ਪਾਸੇ ਛਾਇਆ ਹੈ
ਟਵਿਟਰ ਤੇ ਇੰਸਟਾ ਨੇ ਵੀ ਤੈਨੂੰ
ਟਰੈਂਡਿੰਗ ਦਾ ਟਰੋਲ ਬਣਾਇਆ ਹੈ
ਬਸੰਤੀ ਪੱਗ ਬਣ ਗਈ ਤੇਰੀ
ਸਟਾਈਲ ਸਟੇਟਮੈਂਟ ਜਹਾਨ 'ਤੇ
ਇੰਕਲਾਬ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ
ਮੁੜ ਗੂੰਜਿਆ ਹੈ
ਸਿਆਸੀ ਅਸਮਾਨ 'ਤੇ

ਨਾ ਕਿਰਤੀਆਂ ਨਾਲ ਪਿਆਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ
ਨਾ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਮਿਲੇ ਬਣਦਾ ਹਿੱਸਾ ਵੇ
ਇਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਰਾਜ ਨਹੀਂ
ਆਜ਼ਾਦ ਗੁਲਾਮਾਂ ਦਾ ਕਿੱਸਾ ਵੇ
ਫਿਰਕਾਪ੍ਰਸਤੀ ਵੱਧਦੀ ਜਾਂਦੀ
ਡਿਵਾਈਡ ਐਂਡ ਰੂਲ ਦਾ ਸਾਇਆ ਏ
ਜੋ ਤੇਰੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਦਾ ਭਾਰਤ ਸੀ
ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਹੱਥੀਂ ਗੁਆਇਆ ਏ
ਆਵਾਜ਼ ਚੁੱਕਣ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ
ਮਿਲੇ ਮੌਤ ਵਾਲੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਵੇ
ਆਪਣੀ ਸਰਕਾਰਾਂ ਆਪਣੀਆਂ ਨਹੀਂ
ਇਹ ਸਭਤੋਂ ਵੱਡੀ ਨਮੋਸ਼ੀ ਵੇ
ਸਭ ਦੀਆਂ ਸੋਚਾਂ ਕੈਦ ਹੋਈਆਂ
ਕਿਵੇਂ ਖੋਲ੍ਹੇ ਕੋਈ ਜ਼ੁਬਾਨ ਵੇ
ਇੰਕਲਾਬ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ
ਮੁੜ ਗੂੰਜਿਆ ਹੈ
ਸਿਆਸੀ ਅਸਮਾਨ 'ਤੇ

ਗਗਨ