Tuesday, December 17, 2019

जंगल राज में स्वागत है

डरने की ही बात है
ये तो बस शुरुआत है

खाकी हर जगह खड़ी
पेल रही है लट्ठ
लाइब्रेरी को बता रही
गुंडों का जमघट
जिसके इशारे पे चले खाकी
क्या ये उसकी बिसात है
डरने की ही बात है
ये तो बस शुरुआत है

आलू को कोई पूछे ना
राजा बन गया प्याज़
ज़िम्मेदार बोलें जब भी
तो करें कोढ़ में खाज
मुद्दा बना है देश में
कौन किस के साथ है
डरने की ही बात है
ये तो बस शुरुआत है

कहते अर्थ ले जाएंगे
पांच ट्रिलियन के पार
आबादी जो करोड़ों है
कुछ तो दो रोज़गार
अच्छे दिन हैं लापता
अभी तो काली रात है
डरने की ही बात है
ये तो बस शुरुआत है

जनता मूरख नहीं है
ग़लतफहमी ना पालो
तानाशाही नहीं चलेगी
लोकतंत्र को बचा लो
ऐसा ना हो अबकी बार
कोई ना कहे हम साथ हैं
तुम्हारे डरने की भी बात है
ये तो बस शुरुआत है

गगन

Monday, November 18, 2019

प्यार के बीज

कि कुछ बीज
कभी खत्म नहीं होते
ज़मीं समतल या पत्थर हों
हो उर्वर या कि बंजर हो
हवा बहती ही उलटी हो
बाज़ी मौसम ने पलटी हो
ये अंकुर फूट जाते हैं
कलियाँ मुस्कुराती हैं
फूल भी खिलखिलाते हैं
बीज जिन के दिलों में
प्यार के कुदरत ने हैं बीजे
वो अक्सर मिल ही जाते हैं
चेहरे खिल ही जाते हैं
हाथों में हाथ थामे जब
देखें आंखों ही आंखों में
आंसुओं और खुशियों की
बातें हों मौन बातों में
तार जिनके जुड़े होते हैं
बिन कहे समझ जाते हैं
ये जिस्मों का नहीं बंधन
ये रूह की रूहदारी है
उम्र की हदों पर अब भी
बचपन जिनका तारी है
जो रिश्ता प्यार में डूबा
वो सब रिश्तों पे भारी है
है मासूमियत जिनकी पूंजी
सोच से पूरे सच्चे हैं
दुनिया की नज़र में बूढ़े
अंदर से अब भी बच्चे हैं
पके हों बाल और चेहरे को
झुर्रियों ने ही घेरा हो
जो बरसों बाद भी सोचें
काश ये अब भी मेरा हो
कि उनकी बोझिल आंखों में
चमक फिर आ ही जाती है
जब सिलवट ढके हाथों में
लेके कोई हाथ अदब से ही
कहो कैसे हो यूँ पूछे
तो हवा भी गुनगुनाती है
फूल फिर खिल ही जाते हैं
कलियाँ मुस्कुराती हैं
प्यार के बीज ऐसे हैं
किसी भी तौर ना मरते
किसी भी दौर ना मरते
कि अंकुर फूट जाते हैं
और वो मिल ही जाते हैं

गगन






Sunday, November 3, 2019

नई आवाज़

अमन दे, प्यार दे और वफादारी दे
चमन में, कलियों को भी सरदारी दे

नए वादे, नई कसमे, फिर कभी
पिछली ही बकाया है वो उधारी दे

जिन्हें लगती है झूठ तुझसे मेरी वफा
उनसे निभाने को थोड़ी गद्दारी दे

हाल ए मुल्क नेक नीयत से सुधरेंगें
दे नवाज़, इमरान या फिर ज़रदारी दे,

सड़क है सफ़र है, है मंज़िल भी
किसी मुसाफिर से अब तो यारी दे

धरती पे तैयार हैं तमाशबीन कई
गगन को थोड़ी सी तो अय्यारी दे



Tuesday, October 29, 2019

तू जैसे कहे

जान हथेली पर रख कर तेरे दर आए हैं
ठुकरा दे या कर ले प्यार ये तेरी मर्जी है
प्यार में उसके हिस्से के आंसू भी मैंने पिए
अजब इश्क़ की प्यास में ऐसी ही खुदगर्ज़ी है
जिन्दगी तेरे इम्तिहां जो अब तक पास किए
कोई सर्टिफिकेट तो दे दे या सारे ही फ़र्जी हैं
कैसे काटें, छोटी-बड़ी या कोई फिटिंग करें
तेरे लिए अ' जिन्दगी कहाँ बैठा वो दर्ज़ी है
ये रोज़ रोज़ के नाज़ो नखरे सहन नहीं होते
छोड़ो गगन ये उनका चमन, वक्त की अर्ज़ी है


Tuesday, October 22, 2019

जय हरियाणा

हरियाणा की माट्टी चंदन, हरियाणा की धरती पावन
या धरती तो सोन्ना उगलै, इस पै म्हानैं मान सै
दुश्मन नै ये धूल चटावैं, प्हाड़ां म्हैं भी लड़कै आवैं
आड़ै के वीराँ नै राक्खी, भारत मां की लाज सै
मर्द मुच्छैल अड़ै के छोरे, गळ म्हैं तबीजी काले डोरे
छैल गाबरू बांके गोरे, इस मिट्टी के लाल सैं
हरियाणा की छोरी देक्खो, छोरयाँ तै भी आग्गै जावैं
पढण लिखण म्हैं तेज घणी सैं, हरियाणा की शान सैं
इब यें व्हाई जहाज चलावैं, अंतरिक्ष म्हैं जा कै आवैं
कल्पना चावला नै बढाया, सारे देश का मान सै
सारे देस का पेट भरै सै, मेहनत दिन अर रात करै सै
धरती माँ का सै वा पुजारी, बोवै गेहूँ धान सै
गात सारा टूटदा हो चै, स्याळा हो चाहे घाम हो
खून पसीना एक करै वा, हरियाणे का किसान सै
बीन बाँसळी की अवाज, बैंजू जिसा ना कोए साज
तासा बाज्जै डेरू बाज्जै, सात सुराँ का राज सै
कान्नां म्हैं मिसरी-सी घुळ जै, घड़वे की आवाज सुणै जिब
आड़ै के संगीत नै तो, सुरसती का आसिरवाद सै
साम्मण के जिब गीत गूंजैं, भाई कोथली ले कै आवै
सलूमण के त्यौहार म्हैं तो, भाई बाहण का प्यार सै
फाग की मसती म्हैं देखो, देवर भाभी बोळे होरे
कोरड़याँ की मार भी लाग्गै, जणूँ फुल्लाँ का हार सै
चै तो कोए पोप गाओ, कोए रोळ घचोळ मचाओ
गाम्माँ म्हैं तो सुणै दाद्दा, लखमी चंद के सांग सैं
रागणी सुण कै मसती छावै, किस्सा जिब कोए हीर सुणावै
बूढ्याँ नै जवानी सूझै, सुण लीलो-चमन का सांग रै
आड़ै की संसकिरती सारी, देस दुनिया तै सै न्यारी
या धरती म्हानै जान तै प्यारी, इस पै दिल कुरबान सै
माणस न्हैं माणस जिब दिक्खै, गात सारा हरा हो जै
माणसपन सै धरम अड़ै का, माणस की सारे जात सैं
धरम करम के जिकरे म्हैं तो, ना आड़ै कोए भेदभाव सै
एक्के घर म्हैं बसैं ज्यूकर, मोहम्मद अर राम सैं
ईद हो दीवाली हो चै, सारयाँ कै खुसहाली हो बस
हाथ जोड़ कै सारे मांगै, दुनिया खातर वरदान रै
आओ सार रळ कै आओ, सारे मिल कै ठाणा ठाओ,
पूरी दुनिया म्हैं बढावैं, इस धरती का मान रै
खाँड सी घुळ जै सै मुँह म्हैं, बोल्लै जिब हरियाणवी बोल्ली
जय हरियाणा म्हारा नारा म्हारा देस महान सै।   

गगन

Tuesday, September 24, 2019

To #Sweedish #Greta

Hey Greta!
How dare you?
A big challenge too
For the bigger most
The so called Greater
The power full leader
Till date who seems Busier
In keeping some Nation Great
Or putting their army on stake
Purchasing the Biggest arms till date
Though don't know the earth's fate
U raised a point and all the giant
Shining face with a black soul
Have the strength of a black hole
Yes! They can digest all the things
Corruption Cases n Mob linchings
They are busy in telling their land
They are the one who will never end
They sow hate in full generation
Democracy finish, religion based nation
They are trying to achieve more power
Nuclear atomic are a firey shower
They wana kill every one in range
Be it terrorist or Civillian age
Live Cities converted in deadly grave
After massacre they call them brave
They claim to be the biggest dictator
N think world will bow to the destroyer
Forgotten the list of millions dead
Who ruled the same way what they had
Some other indulge in bigger trade
The tarriff war and sudden raids
Currency is weaker n politics strong
They see that nothing in it is wrong
These big shows don't even want to think
The terror which doesn't allow U to blink
This is just the glimpse of reality
But still they gather sake of formality
There will be some even bigger speech
Claims to show the goals they reach
In a day or two they will again start Fight
Forgetting the climate cause just for right
But every thing will finish a day
Then they ll have no safe way
The nature will ask them n sue
Why u did this n How Dare You?

Gagan




Tuesday, September 3, 2019

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है (1-6)

कभी कभी मेरे दिल में -1

For all my friends working in private sector
Let us smile for a while.
कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
कि ग़र सरकारी नौकरी मिल जाती
तो ज़िंदगी में आराम हो भी सकता था
शाम को चाय पीकर बिस्कुट खाकर
दो घड़ी आराम से मैं सो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि कहीं कोई monday, Tuesday, Wednesday
Thursday और Friday की सूरत ही नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह से ज़िन्दगी जैसे
इसे Saturday और Sunday की ज़रूरत भी नहीं
ना कोई बोनस ना इन्क्रीमेन्ट ना प्रमोशन का कोई सुराग
भटक रही है आफिस में ज़िन्दगी मेरी
इक दिन रह जाऊंगा फाइलों के ढेर में कहीं खोकर
मैं जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है

Kabhi-Kabhi Part two मुस्कुराएं

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि फेसबुक के लाइक्स और ट्विटर के ट्वीट
वोटों में बदलते तो हम सौ हो भी सकते थे
हमारी गुगली सही डल जाती तो सबको धो भी सकते थे
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई सी एम, मिनिस्टर और सीपीएस तक नहीं
जबरन मिले विपक्ष के नेता पद की हमें ख्वाहिश थी नहीं
ना कोई चुनाव नज़दीक ना ही रैली कोई
भड़ास मन की खांसी मे निकालनी होगी
अब सोच समझ के हर जगह बोलना होगा
या फिर ईवीएम में कमी खंगालनी होगी
मैं जानता हूँ मेरे वालन्टियर्स मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी-कभी पार्ट -3 इस बार आओ सोचें!

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि सारे राज-भोगी गर कर्मयोगी बन जाते
तो राम राज आ भी सकता था
विश्व गुरू बन कर भारत
दुनिया को राह दिखा भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि दया, धर्म, प्यार और प्रेम की कोई बात ही नहीं
एंटी-रोमियो बन गए वो जिनकी कोई औकात ही नहीं
ना अक्ल, ना शक्ल, ना आचार है, ना विचार,
अजब अंदाज़ में वो सबको सिखाने चले हैं सदाचार
इज्जत की जीत के बाद अब दौर ए बदनामी आएगा ?
जहाँ हर रिश्ते को शक की नजर से देखा जाएगा !
और मेरे लिखे की हकीकत वो कहां समझ पाएगा।
मै जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में - 4

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि 'कड़ी निन्दा' कहने वाला कहते ही मर जाए
उसकी लाश पे कोइ कुछ लाख मदद धर जाए
पर ऐसा अक्सर होता नहीं है,
भाषण देने वाला रोता नहीं है।
ये 'कड़ी निन्दा' मानो मिसाइल बन गया है
ना चलती हैं तोप, ये ज़ुबां पे तन गया है
संस्कृति की बात करने वाले, संस्कृत को हैं भूले
"शठे शाठ्यम समाचरेत्" पर हम झुलाते हैं झूले
ये लफ्फाजी, ये खोखला बड़प्पन हमें कहाँ ले जाएगा
देशवासी यूँ ही बेमौत मरे, तो देश कहाँ चल पाएगा
अपने ही देश में घूमने को हम इजाज़त क्यों मांगे?
विदेशों में घूमने वाला बड़ी बड़ी डींग क्यों हांके?
कोई ये ना पूछेगा कि भीड़ खामोश क्यों थी?
कोई ये ना समझेगा सियासत मदहोश क्यों थी?
पर इस बात की बार बार तोहमत लगेगी
जो बोल सकते थे, क्या सहमत थे वे भी ?
कानों से सुनना और आंखों से बस देखना
कलम को कुंद और अक्ल को मंद बना देता है
तुम्हारा बोलना इसलिए ज़रूरी है दोस्त
कि खामोश रहना ज़ुबां को जंग लगा देता है
धरती का सूरज छिपे तो भी सुबह की आस होती है
आत्मा के अंधेरे में भटकती जिन्दगी अभिशाप होती है
मैं ये वो सब तमाम बातें जानता हूँ
अपने भीतर का तमस पहचानता हूँ
हर शब्द को सौ बार छानता हूँ मेरे दोस्त मगर फिर भी
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है!

कभी-कभी मेरे दिल में-5

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
कि कई मामलों की जांच,
कमीशन वाली सियासत में ना उलझती
तो इंसाफ़ हो भी सकता था
फरेबी कार्रवाइयों पर करोड़ों खर्चने वाला देश
बेअदबी और कत्ले-आम के मनहूस दाग
अपने माथे से धो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई जांच कोई गवाही कोई सुनवाई भी नहीं
सियासत ने कोई गुत्थी कभी सुलझाई ही नहीं
ना सरेआम नस्लकुशी करने वालों को सज़ा होती है
बेअदबी के दोषियों पे राजनीति ना एक रज़ा होती है
अदालतों में आस की डोर सांसों के साथ टूट जाती है
न्याय की देवी आंखों पे पट्टी बाँध भीतर भीतर रोती है
चंद सफेदपोशों ने हर मुद्दे को मज़ाक बना डाला है
कुरसी वालों ने वोट वालों संग किया गड़बड़झाला है
अब उम्मीद रक्खें भी तो किस से करें
उन्होंने शाही अंदाज़ से सब कत्ल कर डाला है
फिर कुछ वक्त के बाद वायदे दोहराए जाएंगे
कसमे वादे कर इंसाफ के सब्ज़बाग दिखाए जाएंगे
फिर शातिर सियासत शह और मात पहले तय कर लेगी
धर्म और जात के नाम पे लोग फिर अपनी जान गवाएंगे
और वो चलेगा कमिश्न या जांच टीम वाली फिर चाल नई
मैं जानता हूँ मेरे कपतान मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में -6

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
कि मंदी को अगर तरक्की माना जाता
तो देश में विकास का सैलाब आ ही सकता था
सब कमियों को छुपाने के लिए
मैं झूठी देशभक्ति का तराना गा भी सकता था
मगर ये हो ना सका...
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि कहीं पर भी प्रगति की कोई बात नहीं
रुपये की तो लगता है जैसे कोई औकात नहीं
ना जीएसटी से बदली है व्यापार की तस्वीर
लगातार गिरके बिगड़ी जीडीपी की भी तकदीर
आंकड़ों के खेल को किसी ने ऐसा घुमाया है
मेक इन इंडिया लगे गडरिए की कहानी में
झूठ मूठ वाला शेर आया है, शेर आया है
अब तो कहानी में चुप रहने वाले ने टविस्ट घोला है
हमेशा बोलने वाला चुप है जब से ये मौन बोला है
इस के सवालों का मेरे पास नहीं कोई जवाब
देखा है किसने देश के हालात किए इतने खराब
फिर भी मेरी आवाज़ पर ले आओगे चुनावी इंकलाब
अच्छे से पता है मुझे मेरे भगतों मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

गगन

Sunday, June 2, 2019

बूँदें नहीं आई

गरम हवाओं के हाथ
पतझर में झर झर गिरे
सूखे पत्तों पर लिख भेजी
दास्तान ए जुदाई
आँखों से आँसू झरे
शब्दों में दर्द-ए-दिल
बादलों ने भी चीत्कार किया
पर
बूँदें नहीं आई
शायद कोई और गणित होगा
बारिश को बुलाने का
सुना था एक बार कभी
समंदर जैसा विशाल कोई
जब लहरें दिखाने लगे
बिरहा के सूरज की तपिश जब
सब्र के पानी को
धुआँ बनाने लगे
तब बदलता है मौसम
फिर चलती है पुरवाई
जब दिल में बहते हैं आंसू
बूँदें लगता है मानो
अब आई और अब आई

गगन

Wednesday, March 20, 2019

बुरा ना मानो होली है

कोई तो है जिसने देश को
सब्ज़बाग दिखलाए हैं
बातों ने जिसकी देखो
कई समझदार उलझाए हैं
सबसे ज़्यादा जिसने देश से
झूठ की बोली बोली है
साहेब! कहीं वो तुम तो नहीं
बुरा ना मानो होली है
कोई तो है जिसको अब भी
सच भी बोलना नहीं आता
मम्मी सोच के परेशान
बेटा लोगों को क्यूं नहीं भाता?
जनेऊ भी पहना और हाथ पर
अब तो बांध ली मोल़ी है
फिर भी बात ना बने कहीं तो
बुरा ना मानो होली है
कोई तो है जो अबके
बिना लड़े ही हार गई
भतीजे संग उतरी बुआ जी
क्यों मैदान ए जंग से बाहर गई
ये आने जाने की अफवाह है अगर
तो किसने हवा में घोली है
फिर भी समझ ना आए तो
बुरा ना मानो होली है
किसने हरे रंग को अबके
पीला हरा सा कर डाला
चोर चोर मौसेरे भाई
फिर कैसा गड़बड़ झाला
च से चप्पल च से चश्मा
दोनों कैसे हमजोली हैं
अब आप भी हो गर झल्लाए तो
बुरा ना मानो होली है
कौन है जो था आम कभी
पर अब तो ख़ास बन छाया है
जिनसे कभी पंजा लड़ाता था
अब हाथ मांग कर आया है
आम आदमी बन कर जिसने
माफी को बनाया ठिठोली है
अब भी समझ ना आए तो
बुरा ना मानो होली है
इन सबके बीच कोई तो है जो
बस मूरख बन जाता है
ये उल्लू सीधा कर निकल पड़ें
वो हाथ मलता रिरियाता है
आइना देखो और दिखाओ इन्हें
ये पांच साल वाली टोली है
दोबारा नज़र ना आएगी कहीं
मैं सच कहता हूँ कि होली है

गगन

Thursday, January 17, 2019

मारे गए गुलफ़ाम

कुबेरों को कोई इक चीज़ भी महंगी नहीं लगती
मुफलिसों को हर इक शै के बढे हुए दाम लगते हैं
हों भरे पेट तो पकवान सब बेस्वाद हैं लगते
लगी हो भूक तो फिर चने भी बादाम लगते हैं
वो जानें क्या है हाथी, घोड़े, उनके, ऊंट की चालें
सियासी बिसात पे वज़ीर भी हमें गुलाम लगते हैं
वो सपनों का मसीहा है, दिखाता झूठ की दुनिया
के अच्छे दिन हमें तो मारे गए गुलफ़ाम लगते हैं
अंधेरा है बनो जुगनू भले पर कोशिशें करना
शमां रौशन जो करते थे अभी आराम करते हैं
चलो जल्दी से लिखो कुछ, यूँ ही कोई तुक मिला देना
अदब के काम ये उनको, बड़े आसान लगते हैं
ज़मीं से जड़ें जुड़ती हैं, भले ऊंचा हो कोई पेड़
हजारों गगन को छूने के, लाख अरमान रखते हैं