Monday, December 5, 2011

बहुत दिनों बाद....

मेरे शब्द नाचने से डरने लगे हैं
निज़ाम खुश है दिन फिरने लगे हैं
वक्त था जब आँधी का अ लिखने से
खबर आती थी दरख्त गिरने लगे हैं
अब परिंदों का चालान काटेंगे जनाब
आदमज़ात आसमान में उड़ने लगे हैं
क्या कभी खबर आएगी शरीफों की
सुर्खियों में अब बदमाश छपने लगे हैं
आसमान चुप,हवा खामोश,अजब सन्नाटा
बहुत दिनों बाद दिन डरने लगे हैं


गगन

Monday, October 10, 2011

जगजीत...... शायद....

तुमने जग को जीता अपने सुरों से संगीत के जादू से... तुम्हारी आवाज़ में मखमली अहसास था जिसे हर उस शख्स ने महसूस किया जिसके हमनवां तुम तब तब बने जब उसे ज़रूरत थी... फिर ये सफर चाहे खुशियों से भरा हो या रास्तों में ग़म के काँटे रहे हों... जिस गीत को, ग़ज़ल को तुम्हारे होठों ने छू लिया वो अमर हो गया... बेशक तुम खुद आकाश के सूनेपन को महसूस करते रहे... खुद के ग़म को छिपाते रहे लेकिन खासियत यही थी कि हर हाल में मु्सकुराते रहे.... ज़िंदग़ी की किताब के हर वरक से आहिस्ता आहिस्ता नक़ाब सरकता गया... इस मुकम्मल सफर में तुम सभी के साथ रहे... ग़ज़ल गायकी की इस दुनियां में बहुत से चेहरे देखे बहुत सी आवाज़े सुनी लेकिन हर बार ज़हन में एक ही बात आती थी किसका चेहरा अब मैं देखूं तेरा चेहरा देखकर... मेरी आँखों ने चुना है तेरी आवाज़ को दुनिया देखकर..... क्या आवाज़ को देखा भी जा सकता है... ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सिर्फ तुम हो... एक दोस्त की दोस्ती का अहसास थी तुम्हारी आवाज़... तुम पूछते थे प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगे... और जवाब बस एक ही होता था तुमको देखा तो ये ख्याल आया... ज़िंदग़ी धूप तुम घना साया.... लेकिन अब दिल बार बार एक ही बात कह रहा है... तुम चले जाओगे तो सोचेंगे हमने क्या खोया और क्या पाया... ज़हन में कई सवाल हैं.... बहुत पहले से तुम कदमों की आहट जान लेते थे... ज़िंदग़ी को तुम दूर से पहचान लेते थे फिर तुम्हे कोई ऐसी जगह कैसे ले जा सकता है जहाँ ना चिट्ठी ना कोई संदेस.... खुद के बचपन के सावन, काग़ज़ की कश्ती और बारिश के पानी को तुम फिर से हासिल कर गए होगे... लेकिन इस दिल को कैसे समझाएं...जो ज़िंदग़ी की राह में इस कदर मजबूर हो गया कि इतने हुए करीब के हम दूर हो गए....फराज़ के अल्फाज़ ही कुछ सहारा दे रहे हैं.. जो गए हैं वो फिर कब लौटे हैं फराज़, फिर भी तू इंतज़ार कर शायद.....

Friday, October 7, 2011

गधावृत्ति

गधा
बहुतों का
बाप बन जाता है
जब वो
कुर्सी पर
चढ जाता है
कुर्सी बनाती है
उसे समझदार
और हमें गधा
पूछते रह जाते हैं हम
देव। मेरे भाग्य में है क्या बदा...
गधा इस युग में कहीं भी
कभी भी
कुर्सी पा जाता है
और उससे ज़्यादा अक्लमंद
खच्चर को ठेले में
और घोड़े को ताँगे में
जोता जाता है
कुर्सी पर बैठा गधा
सर्वज्ञ कहलाता है
बिना कुछ पढे
बिना कुछ लिखे
कभी पीएचडी
तो कभी डी. लिट् कर जाता है
फिर उसका ढेंचू ढेंचू चिल्लाना
गीत बन जाता है
और वो बन गायक
बाज़ार पर छा जाता है
गधा सीख गया है
घड़ियाली आँसू बहाना
झूठ का साथ देना
सच छिपाना
लोकिन नहीँ भूला अब भी
चारा खाना
दुलत्ती चलाना
लेकिन जब जब गधा
लात चलाता है
तो उसके खुर का निशान
हम जैसों की पीठ पर आता है...
एक बात
जो गधे और उसके जैसे
और गधों में खास है
वो ये
कि उसे अपने गधे होने का अहसास है
इसलिए
जब उसके चारों और
सच का हॉर्न बजाती भीड़ हो
तो वो चुप रहता है
मूर्तिवत्
किसी से कुछ नही कहता
लेकिन इस भीड़ के जाते ही
चिल्लाता है
और अपनी ढेंचू ढेँचू सबको
ऊंचे सुर में सुनाता है
दरअसल
चार टांगों वाली कुर्सी की
चौपाए गधे से यारी है
और इन दोनो का मेल आज तक
पूरी दुनिया पर भारी है
लेकिन
ये सब
ना गधे की
और ना कुर्सी की माया है
कसूर उस समझदार गधावृत्ति का है
जिसने उसे
सुनकर, गुनकर, झेलकर
और फिर चुनकर
कुर्सी पर बैठाया है......


"गगन"

Saturday, October 1, 2011

बापू... से... हे राम तक.....

बापू हैप्पी बर्थडे।
कैसे हो... ये तो नहीं पूछूँगा...
मालूम है दुखी होगे
हो भी क्योँ ना
आखिर हमारी पीढी ने ऐसा कौन सा तीर मारा है जिसे देखकर तुम्हे खुशी हो।
सिवाए इसके कि रामलीला मैदान में दो लोक नेताओं की लीला का परदा उठाया है और गिरा भी दिया। अंदाज़ बेशक अलग थे... एक की शुरूआत भूखे रहने के अनशन से हुई हालाँकि भूख असल में किस चीज़ की थी अभी भी इस पर बड़ी बहस शुरू हो सकती है। लेकिन जैसी नीयत वैसी बरकत बचपन से सुना है... तो नीयत में गड़बड़ी थी... ना बापू ना... हम तो कह नहीं सकते लेकिन कहीँ ना कहीँ तो कुछ ना कुछ तो था। तभी तो रामलीला मैदान में परदा उठने के बाद एक रंग में नज़र आए लोक नेता के चेहरे का रंग वर्दी के रंग को देखते ही उड़ गया... खैर ज़ख्मों को कुरेदना मेरा मकसद नहीँ मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए... तो लीजिए बापू सूरत भी बदल गई और कपड़ों के रंग भी... इस बार जो शख्स मंच पर आया वो एक दम बिंदास तबीयत... सच्ची बोलूं तो कमाल का बंदा.... पहले जेल में बैठकर बिना कुछ किए वर्दी वालों को खूब डराया... बेचारे वर्दी वाले हालत ऐसी हो गई कि अब भी कोई तुम्हारे मार्का वाली यानी गाँधी टोपी पहन कर थाने चला जाए तो नीचे से उपर तक सब सैल्यूट करते हैं... बापू सच में लगा तुम कहीं ना कहीं ज़िन्दा ज़रूर हो... इतने दिनों के बाद तिरंगे को भी खुल कर लहराते हुए देखा... सो दूसरी लीला बहुत जबरदस्त लगी पर कहीं ना कहीं एक टीस ज़रूर दिल में है बापू... भारत छोड़ो आंदोलन तो 42 में चलाया था ना... इतने सालों के बाद भी नतीजा सामने नहीँ आ रहा... देख लो... इस मुल्क को छोड़ कर जाने को कोई तैयार ही नहीं ना भ्रष्टाचार, ना गरीबी, ना भुखमरी, ना बेकारी.... तभी तो सब इकट्ठे हो गए... तुम्हारे नाम पर... हाँ किसी ने ये भी मज़ाक मे कहा कि ये अहिंसा नहीँ है बल्कि हम हिंदुस्तानियोँ की हालत ही ऐसी हो गई है कि हम कुछ करना ही नहीँ चाहते... क्या वाकई ये सच है बापू... बताओ ना... तुमने तो सब देखा ही होगा ना... असल में तुम्हारी शहादत के बाद पता नहीँ क्योँ इस मुल्क में गाँधी की राह पर कदम रखने वाले हर शख्स को हर चौराहे पर एक गोडसे खड़ा नज़र आता है और फिर ज़ुबान से बस ये ही निकल जाता है हे राम...................

गड़बड़ी है गड़बड़ी

कोई समझ ना पाया है
किसने पैसा खाया है
सबने शोर मचाया है
है गड़बड़ी
गड़बड़ी है गड़बड़ी
गड़बड़ी है गड़बड़ी
बचने की है सबको पड़ी
है गड़बड़ी
टूजी टूजी टूजी टूजी बना हौव्वा
गड़बड़ी है गड़बड़ी
गड़बड़ी है गड़बड़ी

Thursday, September 29, 2011

कविता

कोई दिल को दिल ही समझले
बस
इतनी इल्तिज़ा है
वर्ना खिलौने तो और भी हैं
जी बहलाने के लिए

ऑल इज़ वैल

मुश्किल में थे मन्नू भाई... अरे क्या कहा मन्नू भाई को नहीं जानते.... डूब कर मत मर जाइए कहीं जाकर... जी हाँ सही पढा मत मरिएगा अगर आपको नहीँ पता मन्नू भाई के बारे में, क्योँकि मन्नू भाई के बारे में तो हम आपको बताएंगे... हमारे गाँव के सरपंच हैं... चलती बिचारोँ की तनिक भी नहीं... हँ पढे लिखे ज़रूर अव्वल दरज़े के हैँ लेकिन पढे लिखे मूरखों॥ मेरा मतलब है तथा कथित बुद्धिजीवियों की कोई कमी थोड़ी है हमारे गाँव में... एक को अवाज़ लगाओ हज़ारोँ तैयार.... खैर बात हो रही थी मन्नू भाई की परेशानी की... मुश्किल ये थी कि उनका जन्म दिन था... अरे जन्मदिन होना मुश्किल नहीं... भई सब्र कीजिए मन्नू भाई आप और हम जैसे ही हैं तो जन्म दिन तों होना ही है... अवतार थोड़ी होगा.... हाँ सुनिए... मन्नू भाई का जन्म दिन और बिगड़ गए पुन्नू काका... हाँ हाँ वही मंदिर के पास वाले बगीचे में जो रखवाली करते हैँ दिन रात... बिचारे काका आँखें इतनी कमज़ोर हो गई हैँ कि नाक से बड़ा चशमा लगवाना पड़ा... अब नाक और चश्मे का क्या मेल... भई हमें मालूम है... कोई मेल नहीं लेकिन पुन्नू काका को देखकर आपको सब समझ आ जाएगा... हंसिएगा मत नहीं तो काका भड़क जाएंगे... इस भड़कने की वजह बने चड्डी चाचा... भई पुन्नू काका और चड्डी चाचा के बीच लड़ाई हुई बीस रुपए के लेन देन को लेकर.... क्या कहा सिर्फ २० रुपए अरे हुज़ूर ये सिर्फ २० रुपए नहीं बहुत बड़ी रकम है हमारे गाँव के लिए अब ये गाँव है कोई दिल्ली नहीं जहाँ कई हज़ार करोड़ का काम हो... खैर पुन्नू काका और चड्डी चाचा की लड़ाई पहुंची मन्नू भइया के दरबार तो परेशान तो होना ही था.... फिर.... फिर कमरे में तीनों को बिठाकर शन्नो ताई ने वो किलास लगाई कि बस पूछो ही मत.... अब शन्नो ताई के बारे में भी आपको बताना पड़ेगा अरे हमने बताया ना कि मन्नू भाई की नही चलती... यहाँ चलती है शन्नो ताई की.... ये हैं कौन... अरे ज़्यादा सवाल मत पूछा करो दोस्त तबीयत बिगड़ जाएगी और फिर से मन्नू भाई का मूड़ बिगड़ जाएगा। तो कुल मिलाकर बात यहाँ खत्म हुई कि तीन घंटे तक लगी किलास के बाद मन्नू भइया हंसे और फिर चड्डी चाचा और पुन्नू काका ने भी हाथ मिला ही लिए.... इकट्ठे ही आवाज़ लगाई शन्नो ताई ऑल इज़ वैल.................