बधाई हो...। बधाई उन तमाम लोगों को जिन्होंने एक लंबे वक्त के बाद येन केन
प्रकारेण ये साबित करते हुए कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लठतंत्र की ताकत
अभी भी असरदार है... आरक्षण के लिए एक और नई कैटेगरी के निर्माण की चर्चा को सरकारी
गलियारों में भी शुरु करा दिया है। बेशक इस के लिए चले तथाकथित आंदोलन में 20 हज़ार करोड़ का नुक्सान हुआ
हो, जैसा एसोचेम ने अपनी
रिपोर्ट में कहा है, या हज़ारों लोग सड़कों पर अपने बच्चों के साथ हलकान हुए हों... राज्य की
सड़कों को कई दिनों तक ना भरने वाले ज़ख्म दे दिए गए हों... या तथाकथित गुंडा
तत्वों का, जिन्हें ना तो जाट
अपना मान रहे हैं ना ही राज्य के दूसरे राजनीतिक दल अपना कार्यकर्ता, गुस्सा अलग अलग शहरों की
पहचान बन चुके व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर निकला हो। कुल मिलाकर बहुत कुछ ऐसा है जो
अपने साथ कई सवाल लेकर आया है। पर जवाब कौन देगा ? ख़ैर जवाब जानने से पहले पूरे मामले में बैकग्राउंड
फिल्म्स भी देख ली जानी चाहिएं। यूपीए सरकार का कार्यकाल और हरियाणा में कांग्रेस
सरकार का 10 साल का राज,
दोनों के आखिरी दिनों में ये
स्पष्ट हो गया था कि वापसी तो अब मुमकिन नहीं। पर फिर भी कोशिश यही थी कि एक बार
आखिरी दांव खेल लिया जाए। हरियाणा की राजनीति जाटों की भागीदारी के बिना नहीं
चलती। ये एक कटु सत्य है। और ये अब नज़र भी आ रहा है। जाट वोट बैंक को ब्लैंक चैक
की तरह कैश करवाने की कोशिश में जाट आरक्षण का बिगुल फूंका गया। हैरानी ये है कि
स्थिति अब जैसी ही थी बस सरकार अलग थी। केंद्र में यूपीए और हरियाणा में
कांग्रेस....। पर रेल लाईने रोक दी गई थी । ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई पर ब्रेक लग
गई। परेशानी आम आवाम को तब भी हुई थी। इस सब के बीच पहले लोकसभा चुनाव में करारी
हार और फिर विधानसभा चुनावों की आमद... ऐसे में जाटों के लिए आरक्षण संजीवनी बन
सकता था। इसी सोच ने एक विवादास्पद फैसला करवाया... जाटों को आरक्षण... उस प्रदेश
में जहां जाट जनसंख्या मे सबसे बड़ा हिस्सा हैं। चुनाव नज़दीक थे तो किसी भी दल ने
विरोध नहीं किया। कुछ ने करना भी नहीं था क्योंकि उनके राजनीतिक चश्मे से पहली
चीज़ जो किसी भी काम में किसी शख्स के अंदर देखी जाती थी वो थी जाट या गैर जाट। इन
दलों के मठाधीश अपनी सभाओं मे सार्वजनिक ऐलान भी कर देते थे कि अगर सरकारी नौकरी
लगना था तो जाटणी के पेट से पैदा होणा था। सो ऐसे दलों ने विरोध नहीं किया। कुछ
ऐसे दल जिन्हे पहली बार सत्ता सुख की संभावना नज़र आ रही थी वो भी विरोध में नहीं
उतरे। चुनावी नतीजे आए तो आरक्षण के राग को हवा देने वाली कांग्रेस हाशिए पर थी।
सत्ता सुख के इच्छुक दलों की आकांक्षाएं पूरी हो चुकी थी। बाकी दलों की हालत ये थी
कि ना तो अंदरूनी स्तर पर और ना ही बाहरी स्तर पर कोई बड़ा मुकाम। सत्ता में आई
बीजेपी ने एक कोशिश की गैर जाट चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने की। कोशिश सिरे चढी।
संघ की पृष्ठभूमि और बड़े वक्त तक पार्टी के लिए परदे के पीछे रहकर काम करने वाले
मनोहर लाल खट्टर को कमान मिली हरियाणा की। राज्य के सिस्टम में बदलाव के प्रयास
हुए। एक बड़ा बदलाव ये हुआ कि कुछ शुरुआती स्तर की सरकारी नौकरियों में इंटरव्यू
खत्म कर दिया गया। हालांकि पहले इस तथाकथित इंटरव्यू में किए गए खेल प्रदर्शन से
ही सरकारी नौकरी का मौका मिल जाता था या पुलिस विभाग, जिसकी मौजूदा दौर में ढीली कार्रवाई सवालों के घेरे
में है, में सिपाही भर्ती
होने के लिए फिज़िकल टेस्ट और लिस्ट में नाम होना ज़रूरी होता था। नए बदलाव से
बड़ी चोट इन विभागों में जाने की तैयारी कर रहे युवाओं को भी लगी। सिपाही भर्ती
होने के लिए अब लिखित परीक्षा पास करना भी लाज़मी कर दिया गया है। तो फिज़िकल पास
करने के लिए की गई तैयारी पानी में जाती नज़र आई। ये बेचैनी धीरे धीरे बढने लगी।
क्योंकि हाल-फिलहाल में सरकारी नौकरियों के लिए मंगवाए गए आवेदनों को लेकर सरकार
के कई विधायकों और मंत्रियों के पास सिफारिश करवाने आए लोगों को टका सा जवाब भी
मिलना शुरु हो गया था कि नौकरी लगेगी तो सिर्फ योग्यता के आधार पर। एक बार फिर से
जाटों को आरक्षण के मुद्दे की याद दिलाई जाने लगी। सुप्रीम कोर्ट ऐसे मसलों पर
सख्त हुआ तो आरक्षण मिलने की सारी उम्मीदें हवा हो गई। जाट नेताओं ने आंदोलन की
राह पकड़ने की तैयारी की। तो कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट से सांसद राजकुमार सैनी
खुलेआम इसके विरोध में उतर आए। बयानबाज़ी धीरे धीरे तल्ख होती गई। सैनी ने खुद को
गैर जाट और ओबीसी में आरक्षित श्रेणियों के नेता के तौर पर पेश करते हुए आरक्षण की
मांग का धुर विरोध किया। अपनी तीखी शब्दावली की वजह से सैनी लगातार सुर्खियों में
रहे। पार्टी को भी लगा कि जो हो रहा है शायद ठीक ही है। ये एक बड़ी भूल साबित हुआ।
सैनी को आगे बढने से रोकने की कोशिश अगर पार्टी करती तो शायद मामला उतना ना उलझता।
पर ऐसा नहीं हुआ और मामला गरमाता गया। चुनौतीपूर्ण लहज़े में सैनी जाट नेताओं को
और जाट आरक्षण के पैरोकार सैनी को धमकाते रहे। और फिर जो तस्वीर हरियाणा की सामने
आई उसने प्रदेश के अंदर और प्रदेश से दूर रह रहे हर हरियाणवी को शर्मसार किया है। 36 बिरादरियों का प्रदेश
कहलाने वाले क्षेत्र में मौजूदा हालात बद से बदतर हैं...। दिल्ली से बाहर निकलते
ही जीटी रोड पर जिन ढाबों की मौजूदगी ना सिर्फ सैलानियों बल्कि विदेशियों को भी
आकर्षित करती थी उनमें से कईयों में तोड़ फोड़ हुई है.... रोहतक की जिस रेवड़ी की
मिठास यहां आने वाले लोगों को स्वाद का एहसास देती थी, उस रेवड़ी का व्यापार करने वाले आंदोलन मे मिली
कड़वाहट को शायद ही भुला पाएं... कैथल में सैनी के समोसे का स्वाद चख चुके लोगों
को अब कितने दिन तक उस स्वाद की वापसी का इंतज़ार करना होगा कहा नहीं जा सकता।
प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में दुकानों औऱ प्रतिष्ठानों में सिर्फ आगज़नी नही की
गई बल्कि बाकायदा लूटपाट की गई है। तस्वीरें हर जगह से सामने आई हैं। बस और रेल
सेवा तो ठप्प कर ही दी गई। जो लोग निजी गाड़ियों से आ जा रहे थे उन्हें भी घेरकर
उनके साथ हुई मारपीट की खबरें भी सामने आई हैं। गाड़ियों के टायरों में सब्बल
मारकर पंचर कर देना, गाड़ियों में आग लगा देना तोड़ फोड़ करना... आखिर इस सबका मकसद क्या....। वो
लोग जो अपने मासूम बच्चों के साथ सफर कर रहे हैं... उन्हें तो शायद किसी को आरक्षण
दिए जाने या ना दिए जाने से कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला... फिर उनके साथ ऐसा
व्यवहार क्यों। जाट नेता कहते हैं कि तोड़-फोड़
और आगज़नी करने वाले लोग उनके आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं... तो क्या वो इसके साथ
ही सरकार से ये भी अपील करेंगे कि ऐसे गुंडा तत्वों को देखते ही गोली मार दी जाए।
सरकार की भूमिका भी सवालों में इसलिए है क्योंकि खुद उसके मंत्रियों के, विधायकों के पूर्व मंत्रियों
के घरों में आगजनी हुई है। यानि जब तथाकथित वीआईपी ही सुरक्षित नही तो आम जनता
क्या उम्मीद करे। पूरा घटनाक्रम बरवाला के रामपाल प्रकरण की याद दिलाता है। वहां
भी सरकार चार दिन के बाद तब हरकत में आई थी जब रामपाल के समर्थक धीरे धीरे करके
भारी तादाद में जमा हो चुके थे और स्थिति हिंसक हो चुकी थी। यहां भी ऐसा ही हुआ
है। जाट नेताओं ने पहले से ही एक तय तारीख से आंदोलन का ऐलान जब कर दिया था तो
पूरे हालात को काबू में करने के लिए क्यों कोई योजना सरकार ने नहीं बनाई। क्या इस
भयावह वर्तमान का इंतज़ार किया जाना लाज़मी था ? राज्य के दूसरे राजनीतिक दल भी कम नहीं... दिल्ली
के जंतर मंतर पर बैठ अनशन करने वाली कांग्रेस क्या ये स्वीकार भी करेगी कि आरक्षण
का ये जिन्न उसी के चुनावी चिराग से निकला हुआ है....। इनेलो ने तो जिस तरीके से
खुद को जाट आरक्षण के समर्थन में मज़बूती से खड़ा दिखाया उसने कोई रास्ता छोड़ा ही
नहीं है...। जाट आरक्षण के लिए सरकार ने एक विशेष पिछड़ा वर्ग बनाने का ऐलान भी कर
दिया है। क्या ये सही है ? या अब बाकि की जातियों को भी ये रास्ता सरकार दिखा रही है कि आरक्षण लेना हो
तो लोकतंत्र नहीं लठतंत्र में यकीन करो। ऐसा क्यों ? पूर्व राष्ट्रपति मरहूम डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने 2020 के भारत के लिए एक विशाल
स्वप्न देखा था। एक भयावह हकीकत ये हो सकती है कि 2020 में ज़्यादातर जातियां इस बात के लिए संघर्ष कर
रही होंगी कि उन्हें सामान्य वर्ग में रहने दिया जाए। हरियाणा अजीब सी कशमकश से
गुज़र रहा है...। प्रदेश की धरती ये सोच रही है कि यहां भगवान यानि हरि के आने की
वजह से जो नाम हरियाणा मिला था... उसे आने वाले दिनो में लठतंत्र या लोकतंत्र के
कब्रिस्तान के तौर पर पहचाना जाने लगा तो क्या होगा... बिहार में कुछ वक्त पहले
जिस जंगलराज की बात की जाती थी क्या वो हरियाणा के मौजूदा हालात से अलग था... सवाल
कायम है।