Sunday, November 13, 2016

यात्रा संस्मरण : दिल्ली से चूड़धार वाया चंडीगढ़

चंडीगढ़ को सिटी ब्यूटीफुल कहा जाता है... और मुझे लगता है कि ऐसा कहने वाला पहला शख्स शायद हिमाचल से वापसी में चंडीगढ रुका होगा... क्यों कि सिटी के स्तर पर तो इस शहर का कोई मुकाबला नहीं.... हर चीज़ तरतीबवार मानों अनुशासन में बांध दिया गया हो सब कुछ.... पर कुदरत की खूबसूरती यानि ब्यूटी को कोई अनुशासन में कैसे बांध सकता है... वो तो उसकी मर्ज़ी है जिसे चाहे अपने रंग दिखा दे.... और इसीलिए असल ब्यूटीफुल है हिमाचल.... चंडीगढ़ से हिमाचल की वादियों के दीदार के अपने सफर के पहले दिन यानि 9 जून की सुबह पंचकूला में टी प्वाईंट पर दिल्ली से आने वाले अपने तीन दोस्तों के इंतज़ार में खड़ा हुआ मैं ऐसा ही कुछ सोच रहा था... ख़ैर एक लंबे इंतज़ार और मेरे दोस्तों को खिझा देने वाली 4-5 फोन कॉल्स (खिझा देने वाली इसलिए क्योंकि मैं पूछता था कहां पहुंचे, और उन्हें खुद नहीं मालूम था कि कहां पहुंचे, दरअसल वो रास्ता सिर्फ ड्राईवर को पता था) के बाद त्रिदेव प्रकट हुए... विनी, विक्की और विशाल... और फिर शुरु हुआ सफ़र... बारिश में नहा कर सिर्फ चंडीगढ़ ही नहीं निखरता... ऐसे मौसम में चंडीगढ से शिमला की ओर चलें तो आप महसूस करेंगे कि रिमझिम फुहारों से कुदरत भी मुस्कुराने लगती है... पहाड़ों पर छाई हरियाली और कहीं कहीं इस धुली धुली हरियाली की चादर से मुंह बाहर निकालकर रास्तों को ताकते बड़े बड़े पत्थर...
सब कुछ ऐसा है कि पहले दीदार में ही... कई दिनों की थकावट मिनटों में काफ़ूर हो जाती है... कुछ ऐसे ही सीधे-तिरछे रास्तों से होकर हम आगे बढते रहे... शिमला से चंडीगढ़ के रास्ते को चारमार्गी किए जाने का काम भी इस रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ रहा है... जो एक तरफ जहां आने वाले दिनों में इस रास्ते के सुगम होने की खुशी देता है तो वहीं एक शंका भी मन में पैदा होती है कि कुदरत के साथ इंसान और मशीन का ये खेल क्या जायज़ है... ख़ैर बारिश का मौसम और पहाड़ का सफर और सुबह का वक्त... कुल मिलाकर तीनों चीज़ें ऐसी थी कि चाय पीने की तलब दिल में पैदा हो गई.... किसी को चाय पीनी थी और किसी को छोटी छोटी शंकाएं थी... जो गाड़ी रुकवाकर दूर की... चाय पीने के लिए हम जिस पड़ाव पर रुके वहां पहुंच कर जुगाड़ तकनीक का एक और नमूना देखने को मिला
ऐसे जुगाड़ का सबसे बड़ा फायदा ये कि पानी भी चैक किया जा सकता है और पानी की बर्बादी को रोका भी जा सकता है... सस्ते में वाशबेसिन बनाने का ये आइडिया कहीं कैम्पिंग के दौरान आपने भी शायद इस्तेमाल किया हो.. चाय पीने के लिए गाड़ी से उतरे तो कुदरत स्वागत कर रही थी बारिश की बूंदों के साथ... आस पास का मौसम रूमानी था... तो लगे हाथ कुछ एक लम्हों को कैमरे में कैद कर लिया...।

अक्सर मैदानी इलाकों से पहाड़ों में जाते वक्त कुदरत का जो भी रूप हमें नज़र आता है वो ही दिल को लूट लेता है... क्यों कि मैदान में ना तो उस ताज़गी का एहसास होता है जो पहाड़ों में मिलती है और ना ही इतनी हरियाली इस रूप में कहीं नज़र आती है... पर ये तो असल शुरुआत का काउंटडाऊन भी नहीं था... सफर में आगे बढते बढते एक जगह पहुंच कर हमे ऐसा लगा मानों वक्त कहीं थम सा गया हो... गाड़ी का एसी हमने बंद कर दिया था और खिड़कियां खोल ली थी... इस जगह पहुंचे तो कानों को जो सुन रहा था उससे दिल में एक ही ख्याल आया कि अपने बचपन की क्या क्या चीज़ें हम अगली पीढी को शायद नहीं दे पा रहे... आवाज़ें... चहचहाहटें... शहर के शोरोगुल से दूर पहाड़ के बीचों बीच हवा के झोंके की आवाज़... किस्म किस्म के पंछियों की आवाज़.... एक और छोटे से पड़ाव के लिए हमने गाड़ी को रुकवा लिया... सफर के आगाज़ की ये तस्वीर हमे आने वाले तीन दिनों के रोमांच से भर रही थी। कुछ ने मेडिटेशन की कोशिश की तो कुछ सेल्फी के लालच में बंध गए.... कुल मिलाकर सब कुछ मज़ेदार... सब कुछ ऐसा जिसे ढूंढने हम यहां आए थे
वक्त धीरे धीरे बीतता हुआ सा लग रहा था... ऐसा लगता था मानों वक्त को भी कोई जल्दी नहीं है और शहर की भागदौड़ से दूर वो भी यहां कुछ आराम करना चाहता है....। सफर की पहली मंज़िल का आना बाकी था... चंडीगढ शिमला हाईवे पर सोलन से होकर पहुंचा जाता है सिरमौर... सिरमौर यानि हमारा बेस कैंप.... हिमाचल के इस ज़िले की ख़ास बात ये है कि सिरमौर नाम का कोई भूभाग इस ज़िले में नहीं है... सिर्फ सिरमौरी ताल नाम से एक जगह है जो ज़िले की वेबसाईट पर दिखाई गई है। सिरमौर का ही एक इलाका है राजगढ़और इसी राजगढ़ में था हमारा पहला पड़ाव कैंपिंग एरिया राजगढ़ हिल्स। एक ऐसी जगह जहां शायद आप अगर बिना जानकारी लिए सीधे जाना चाहें तो आधे रास्ते से ही वापिस लौट आएं...। इसीलिए ज़रूरी है कि जाने से पहले एक बार ऑनलाईन चैक ज़रूर कर लें। अपने लिए बुकिंग मेरे दोस्तों ने ऑनलाईन कर दी थी... और अच्छा खासा डिस्काउंट भी हमे ऑनलाईन मिल गया था। राजगढ से पहले ही बाईं ओर नीचे की तरफ उतरते पथरीले से रास्ते से होकर आप पहुंचते हैं राजगढ हिल्स। रास्ता ऐसा है कि एक बार में एक ही गाड़ी गुज़र सकती है... और इसीलिए मन में ये ख्याल भी आ सकता है कि कहीं गलत तो नहीं आ गए। पर जब आप नीचे होटल में पहुंचते हैं तो यहां की मेहमान नवाज़ी का अंदाज़ आपका दिल जीत लेगा। महानगरों के अच्छे अच्छे होटल में आपको सिवाए पानी के एक गिलास के और कुछ परोसा नहीं जाता। लेकिन राजगढ हिल्स में हम तकरीबन थक चुके मुसाफिरों के लिए स्वागत पेय के तौर पर खुमानी का जूस तैयार था।



जूस और वो भी एक दम शुद्ध। तबियत खुश हो गई। होटल को जिस तरीके से बनाया गया है वो वाकई काबिले तारीफ है। अगर एक नज़र में समेटा जाए तो आप यही कह सकते हैं कि एक पूरे पहाड़ को अलग अलग मंज़िलों में बांट दिया गया है और इन मंज़िलों में सबसे नीचे बैडमिंटन कोर्ट, उसके ऊपर कोटेज, उसके ऊपर टैंट और सबसे ऊपर यानि जहां आप सबसे पहले पहुंचते हैं वहां रेस्टोरेंट है। खूबसूरत जगह... आरामदायक इंतज़ाम...। अगर परिवार के साथ आप घूमने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो दो दिन की छुट्टियां सिर्फ इस होटेल में ही बिताई जा सकती हैं। ख़ैर होटल की शुरुआती मेहमान नवाज़ी के बाद होटल के मैनेजर विक्रम शर्मा से मुलाकात हुई। विक्रम ने सलाह दी कि कुछ देर के आराम के बाद फ्रेश होकर हम आस पास के एक दो स्पॉट्स को देखने चल सकते हैं। हमें भी आईडिया जंच गया। एक उम्मीद से थोड़ा सा लंबे इंतज़ार के बाद मिले ताज़ा और गरमा गरम खाने के बाद हम अपनी कोटेज में चले गए। थोड़ी देर आराम के बाद स्पॉट सीईंग (दृश्यावलोकन) के लिए रवानगी हुई। शर्मा जी के साथ सड़क के रास्ते होते हुए राजगढ को पार कर हम हरिपुर धार को जाने वाले रास्ते पर निकल पड़े। लभग आधे घंटे के सफर के बाद एक छोटे से साथ लगते पहाड़ पर गाड़ी चढाने को शर्मा जी ने बोला। पहाड़ पर चढे तो देखने को जो तस्वीर मिली उसने रूह खुश कर दी। पूरी वादी का नज़ारा आंखों के सामने था
कुछ देर इस जगह रुकने के बाद हमें शर्मा जी ने बताया कि वो एक इससे भी अच्छी जगह हमें दिखाना चाहते हैं पर उसे लेकर वो खुद आश्वस्त नहीं हैं। आगे के रास्ते में ही वो स्पॉट है। शर्मा जी के मुताबिक ये एक वॉटर फॉल था। हम मन ही मन खुश होते हुए आगे बढे तो सिर्फ यही सोच रहे थे कि पहाड़ों से गिरता पानी देखने में कितना मज़ा आएगा। पर जैसे जैसे हम आगे बढ रहे थे रास्ता बदतर होता जा रहा था... सड़क खत्म होती गई और गड्ढे बढते गए। इसी बीच दो से तीन ऐसे स्पॉट आए जहां झरना होने के सिर्फ निशान बाकी थे। एक बार तो हमें लगा कि शायद शर्मा जी ने हमे बना दिया है। पर एक जगह जाकर छोटी सी पुलिया के पास शर्मा जी ने गाड़ी रुकवाई। पानी की एक धार पत्थरों के बीच से नीचे गिर रही थी। हम उस धार को देखकर शर्मा जी पर अपनी भड़ास निकालने ही वाले थे कि शर्मा जी ने उपर पहाड़ की तरफ चलने को कहा। ऊपर जाकर जो नज़ारा देखने को मिला उसे बयान करना मुश्किल और दिखाना ज्यादा आसान है।
और फिर शुरु हुआ मस्ती का दौर.....
कंडानाला से वापसी के बाद हम चारों अगले दिन के बारे में सोच रहे थे...शाम की खूबसूरती जैसे जैसे गहरा रही थी... हमारे दिलो दिमाग पर अगले दिन के सफर को लेकर कई ख्याल आ रहे थे...  खैर होटल वापिस पहुंचने पर जो पहला काम हमने किया वो था मचान का स्पेस बुक करना.... कल्पना कीजिए आप पहाड़ी के हिस्सों को काटकर बनाए खूबसूरत होटल में हैं... जहां अलग अलग हिस्सों में अलग अलग सुविधाएं दी गई हैं... और उसी होटल में बना है एक मचान.... जहां से दिखाई देता है पहाड़ों का बेहद खूबसूरत नज़ारा... इस नज़ारे का ही लुत्फ लिया हमने उस मचान पर बैठकर... डिनर के वक़्त होटल मैनेजर शर्मा से बात हुई चूड़धार जाने को लेकर... शर्मा जी का मानना था कि क्योंकि मेरे तीन दोस्त दिल्ली से और मैं चंडीगढ़ से हूं तो चूड़धार की ट्रैकिंग पूरी करना शायद हमारे बस से बाहर हो... शर्मा जी ने हमें उन तमाम लोगों के किस्से सुनाए जो आधे रास्ते से ही वापिस लौट आए थे... बहरहाल खाना खाने के बाद हमने सुबह जल्दी होटल से निकलने का तय किया ताकि बेस कैम्प नौहराधार सही वक्त से पहुंच सकें। सुबह सुबह मेरी आंख जल्दी खुल गई और इस वक्त में मैने वो सब सुना और महसूस किया जो कंकरीट के जंगलों मे अब ना सुनाई देता और ना दिखाई देता। होटेल मे बनाई मचान पर खड़े होकर सिर्फ अलग अलग पंछियों की आवाज़ें... कुदरत का ये कलरव ऐसा था जिसे मैं हमेशा के लिए संजो लेना चाहता था... सो कोशिश की इसे रिकॉर्ड करने की... साथ ही होटेल मे ही एडवेंचर एरिया में जाकर अपनी क्षमताओं को भी एक बार परख लिया। क्योंकि शर्मा जी की बातों से एक चीज़ तो तय थी कि चूड़धार की राह उतनी आसान नहीं। खैर तैयार होकर हम चारों होटेल से निकल चले... होटेल से नौहराधार तक का रास्ता वही था जिसके सहारे हम कंडानाला तक गए थे, सो कंडानाला तक जाते जाते कई सूखे हुए झरने वाली जगहों को देख हमने मैनेजर शर्मा जी को याद किया कि कैसे शर्मा जी भी सिर्फ सुनी सुनाई बात के आधार पर हमे कंडानाला तक ले आए थे। जब तक नौहराधार पहुंचे तो भूख ज़ोर पकड़ चुकी थी क्योंकि होटल से हम बिना नाश्ता किए ही निकल चुके थे। नौहराधार में नाश्ता करते करते ढाबा मालिक से चूड़धार का रास्ता पूछा तो उसने बड़े सीधे तरीके से बताया कि जो सामने पहाड़ देख रहे हैं ना एक बार बस इस की चोटी पर पहुंच जाइए उसके बाद तो सीधे हाथ की तरफ आपको चलते जाना है... साथ ही ये भी बताया कि रास्ते में खाने पीने के सामान की दुकाने भी मिल जाएंगी सो ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है । होटल से निकलने से पहले हम चारों ने अपने गरम जैकेट तो साथ रख लिए थे पर एक दो चीज़ें ऐसी थी जो मुझे अपने मित्र और वरिष्ठ पत्रकार संजीव शर्मा जी से पता चली थी कि रास्ते के लिए छाता या रेनकोट साथ लेना ज़रूरी है और साथ ही टॉर्च भी रखें ताकि रोशनी मिलती रहे। नाश्ता करने के बाद विक्की और विनीत को थोड़ा आगे भेज कर मैं और विशाल इस छोटी मोटी खरीददारी के लिए आसपास घूमे। एक अच्छी बात जो हमें होटेल मैनेजर शर्मा जी और बाकी के लोगों ने भी कही वो ये कि पगडंडी वाला कच्चा रास्ता जो आपको दिखाई देता है उसे ना छोड़ें वरना गुम होने का खतरा रहता है। ऐसी एक दो घटनाएं बीते कुछ वक्त में हुई भी थी। नौहराधार की अगर बात करें तो छोटा सा कस्बा है जो एक ऐसे पहाड़ की तलहटी मे है जिस पर सिर्फ पत्थर ही पत्थर नज़र आते हैं सफेद और हल्के ग्रे रंग के पत्थर.. छोटी बड़ी शिलाएं... पहली नज़र में ही रोमांचित करने वाला पहाड़ और हम चारों, जिनमें से कोई भी पेशेवर पर्वतारोही नहीं, जो ज़्यादातर ऐसा काम करते हैं जिसमें पानी पीने तक के लिए कुर्सी से उठना नहीं पड़ता, जिनमें से तीन 30 से ज़्यादा उम्र के हैं... हम चारों इस पहाड़ की चोटी को सर करने के लिए उसके पहलू में पहुंच चुके थे...पहाड़ पर चढते चढते कुछ लोग दिखे... जो उपर की तरफ ही जा रहे थे... कुछ ऐसे भी थे जो पहाड़ से वापिस आ रहे थे... उनसे पूछा तो हाथ से उपर की तरफ इशारा करके बताते गए कि इस तरफ जाइए... एक और बोर्ड भी हमे नज़र आया... फौजी दा ढाबा... 1.5 किलोमीटर आगे.... हमें खुशी हुई कि चलो सुबह का नाश्ता नौहराधार... दोपहर का खाना फौजी के ढाबे पर और शाम की चाय और रात का खाना चूड़धार में... सोच पर तो कोई टैक्स नहीं सो सोचा तो जा सकता है... और इसीलिए शायद हमने भी सोच लिया...। पर जनाब कहते हैं कि हर ख़्वाब की तामीर उतनी आसान नहीं होती जितनी ख़्वाब में नज़र आती है... डेढ़-दो घंटे तक पत्थरों के बीच से पगडंडियों और रेत से बने रास्ते पर.... पत्थरों पर लगे तीर के निशान के सहारे चलते-चलते हम चाबधार पहुंचे। चाबधार.... नौहराधार के सामने दिखाई देते पहाड़ पर बसा... बमुश्किल 15-20 घरों का गांव...



घर भी वैसे जैसे 70-80 के दशक की फिल्मों में गांव में दिखाए जाते थे... लगता है मानों पत्थरों को एक दूसरे के उपर टिकाकर दीवारें खड़ी कर दी गई हों.... बिल्कुल तंग से रास्तों के दोनों तरफ बने घरों में से ज़्यादातर पर ताला लगा था... एक-आध जगह पर गाएं और गौवंश बंधे हुए थे....  हमने अंदाज़ा लगाया कि नौहराधार क्योंकि पास ही है तो इसी लिए शायद आजीविका के लिए चाबधार के लोग नीचे कस्बे में चले जाते होंगे...। चाबधार में ही एक जगह पर बच्चों को गोद में उठाए जानवरों की देखभाल करती कुछ महिलाएं दिखी तो विनीत ने सवाल पूछ लिया... आंटी यहां से चूड़धार कितना दूर है... सवाल पूछते वक्त हम चारों की हालत ऐसी थी कि पीने का पानी खत्म हो चुका था... प्यास ज़ोरों से लगी थी... और लग रहा था कि शायद हमने गलत फैसला लिया है... (पहाड़ पर ट्रैकिंग के शुरुआती और आखिरी दो घंटे काफी मुश्किल रहते हैं) आंटी का जवाब सुनकर हमारा दिमाग एक बारगी तो घूम गया... आंटी ने हंसते हुए कहा... हा हा हा... अभी क्या भैय्या अभी तो बहुत पड़ा है... ये तो शुरु भी नहीं हुआ.... हम चारों ने एक दूसरे की तरफ आत्मविश्वास भरी स्माईल दी... मानों कह रहे हों कोई बात नहीं कर लेंगे यार। आंटी ने ये भी बताया कि फौजी का ढाबा भी गांव में ही है। ये सुनकर सांस में सांस आई कि चलो कुछ स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक्स भी खरीद लेंगे और थोड़ा राहत भी मिलेगी। पर कहते हैं ना जब किस्मत हो...... । फौजी का ढाबा बंद था। आस-पास कोई ये बताने को भी नहीं कि क्यों बंद था। खैर अनदेखे अनजाने फौजी ढाबे के मालिक को चार भूखे प्यासे दोस्तों ने बहुत सी दुआएं (पढें बद्दुआएं) दी और एक बार फिर से रुख किया चूड़धार का। चाबधार से आगे निकल कर पहाड़ के ऊपर एक ऐसी जगह आती है जहां अभी तक शायद बॉलीवुड के किसी फिल्मकार की नज़र नहीं पड़ी... क्योंकि अगर ऐसा होता तो कुदरत की बिखेरी बेइंतिहा खूबसूरती सिल्वर स्क्रीन के ज़रिए कईयों को अपना दिवाना बना चुकी होती। सबसे पहले विक्की पहाड़ के उपर मौजूद समतल मैदान पर कदम रखते ही इस सौंदर्य के बाहुपाश में बंध गया.... एक एक करके हम तीनों भी इस जगह पहुंच गए.... नयनाभिराम... ये शब्द ऐसे ही नज़ारों के लिए गढा गया होगा.... पहाड़ पर हरी भरी घास का समतल मैदान... वहां से सामने नज़र आता दूसरा पहाड़... उस पर लगे हरे भरे दरख्त और पूरे वातावरण की शांति को अपनी मस्ती में लपेटने की कोशिश करते तेज़ हवा के सर्र सर्र करते झोंके.... पहले एक-डेढ़ घंटे की थकावट एक मिनट में दूर.... हम तीनों कुछ देर के लिए वहीं लेट गए.... थोड़ी भूख लगी थी तो कुछ बिस्कुट नमकीन खा लिए... सच बताऊं तो दुनिया के किसी बड़े से बड़े आलीशान होटल के कमरे में आपको ऐसा आराम नहीं मिल सकता जो हम तीनों को पहाड़ के उपर खुली हवा में घास के मैदान पर मिल रहा था। इस हरियाली की शुरुआत के साथ ही हमने खालिस पत्थर वाले पहाड़ के पहले पड़ाव को पार करने की खुशी को महसूस किया और आगे बढ चले... कुछ दूर ही चले थे कि उस मैदान से अलग अलग रास्ते निकलते नज़र आने लगे... ये चकराने वाली स्थिति थी... एक गलत कदम हमे लापता कर सकता था... इसी बीच उसी हरे मैदान की ओर से दो लड़के आते हुए नज़र आए। हमने पूछा तो उन्होंने बताया कि वो भी चूड़धार जा रहे हैं। दोनों शिमला से आए थे। हमने गुज़ारिश की कि हमें भी साथ ले चलो तो दोनों खुशी खुशी मान गए। इससे एक कदम और आगे बढते हुए दोनों ने हमारे पिट्ठू बैग भी उठा लिए। ये पहाड़ की सरलता की एक नई तस्वीर थी। दोनों शिमला के पास किसी गांव से थे। अनिल और अजित...। उन दोनों को हैरानी इस बात पर थी कि हम चारों में से तीन दिल्ली से और मै चंडीगढ़ से चूड़धार जाने के लिए ही आए हैं। आपको ये भी बता दूं कि चूड़धार ज़्यादातर वो लोग जाते हैं जो या तो पहाड़ी अंचल से हैं और जिनके कुलदेवता या पारंपरिक पूजन और धार्मिक कर्मकांड में चूड़धार की यात्रा अनिवार्य है। हालांकि बीते कुछ सालों में इस जगह के रोमांच ने सैलानियों को आकर्षित करना शुरु किया है पर एक व्यावसायिक पर्यटन स्थल के तौर पर अपनी पहचान स्थापित करने में चूड़धार को अभी वक्त लगेगा। खैर, अनिल और अजीत का साथ मिला तो चूड़धार के सफर का अंजान रास्ता भी हमें जाना पहचाना सा लगने लगा। पहाड़ के पत्थरों से आगे का रास्ता कच्ची पगडंडी का शुरु होता है। ये रास्ता हरियाली वाला है। अब तक के सफर के बाद विनीत को थोड़ी सी दिक्कत महसूस होने लगी था तो अजित लकड़ियों के ढेर में से डंगा (लकड़ी का डंडा) ले आया। आगे का रास्ता कुछ ऐसा था जैसे आप पहाड़ की किनारी किनारी पर चल रहे हों.... आपके बायें हाथ पहाड़ की चढाई और दायें हाथ उतराई... खास बात ये कि दोनों ओर पेड़ काफी लगे हुए हैं.... तो सूरज की धूप अपना असर नहीं दिखा पाती... पत्थरों वाले पहाड़ का रास्ता रोमांच से भरपूर है तो ये जंगल वाले पहाड़ का रास्ता खूबसूरत। पहाड़ी दरख्तों से गिरे छोटे छोटे तिनके ऐसे लगते हैं मानों कुदरत ने आपके स्वागत के लिए लकड़ी के रंग का कालीन (वुडन कार्पेट) बिछाया हो। एक और ख़ास बात ये कि बेशक ये रास्ता जंगल का है पर यहां कोई जंगली जानवर नहीं है यानि आप बिना किसी डर के नैसर्गिक सौंदर्य का मज़ा ले सकते हैं। इसी रास्ते पर चलते चलते एक ऐसी जगह आई जहां हमारे दाईं और एक गुफा बनी हुई थी। गुफा भी कुछ ऐसी मानों दो तीन शिलाओं को एक दूसरे के साथ जोड़कर रख दिया गया हो। यहां पहुंच कर अजीत ने एक लोक मान्यता बताई कि अगर कोई मन्नत मांग कर एक पत्थर उठाकर इस गुफा के ऊपर से दूसरी तरफ फैंक दिया जाए तो मन्नत पूरी हो जाती है। गुफा की ऊंचाई कुछ 60 फुट के करीब होगी। और भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि आप गुफा के दाईं और बमुश्किल 10-15 कदम और इसी तरह बाईं ओर भी 10-15 कदम तक ही इस गुफा का पूर्ण आकार देख सकते हैं। अजित और अनिल दोनों ने लोक मान्यता का अनुसरण किया। कामयाबी नहीं मिली हम लोगों ने भी थोड़े हाथ आजमाए पर नाकाम ही रहे। कुछ एक मिनट की ये प्रक्रिया एक खेल जैसी थी। जिसने हमें एक बार फिर ऊर्जावान कर दिया। रास्ते के दो स्थानीय जानकार साथ होने का फायदा हमें एक और रूप में मिला वरना एक आम सैलानी की तरह हम भी इस गुफा के पास से होकर गुज़र जाते और हमे शायद पता भी ना चलता ऐसी किसी मान्यता का। पहाड़ी जंगल से होकर गुज़रने वाला ये कच्ची पगडंडी का रास्ता कई जगह बेहद संकरा सा हो जाता है। रास्ते में गिनी चुनी जगह ऐसी हैं जहां पहाड़ से बहकर आ रहे पानी को इकट्ठा करने के लिए कुछ जुगाड़ किया गया है। जो पानी हम नौहराधार से लेकर चले थे वो खत्म हो चुका था और अब पहाड़ से आ रहा पानी का ये प्राकृतिक स्रोत ही हमारे लिए एक बड़ा सहारा था। धीरे धीरे आगे बढते-बढते हमें थकावट होने लगी थी। विशाल, जिसे हम काफी देर से शाबाशी दे देकर आगे चला रहे थे, की हालत खराब होने लगी थी। और एक जगह जाकर उसकी हिम्मत जवाब देने लगी। मैं वापिस जा रहा हूं। अब और चलने की हिम्मत नहीं है। आप लोग जाओ चूड़धार मैं नीचे होटल में आराम कर लूंगा। विशाल ने डिक्लेयर कर दिया। हम सबके लिए ये टेस्ट मैच में पहला विकेट गिरने जैसा था। पैदल चलते हुए हमे 3 से 4 घंटे हो चुके थे। थकान सब पर असर दिखा रही थी। मुश्किल ये थी कि कोई दुकान भी रास्ते में दिखाई नहीं दी थी जिससे खाने पीने के लिए कोई चीज़ ले लें। विशाल ने जब आगे जाने से मना किया उस वक्त हम एक ऐसी जगह खड़े थे जहां आगे थोड़ी ऊंचाई की तरफ रास्ता जाता था। तभी मेरे मन में पता नहीं क्या ख्याल आया। मैने विशाल को कन्विन्स किया कि थोड़ा सा और आगे चलते हैं हो सकता है सौ एक मीटर के बाद कोई दुकान आ जाए। सारी हिम्मत को फिर से इकट्ठा कर हम चल पड़े। ऊंचे रास्ते को पार किया ही था कि सामने खुले मैदान में कैप जैसी दो जगहें नज़र आई.... हम पहले पड़ाव पर पहुंच चुके थे। थके-हारे दोस्तों को उम्मीद की किरण नज़र आ गई थी। चूड़धार के सफर में ये पहला पड़ाव खुले मैदान में बांस की लकड़ी, पत्थरों और प्लास्टिक की पॉलीथीन शीट से बनाई दो दुकाने हैं। अगर दोपहर के वक्त आप पहुंचते हैं तो खाने में चावल के साथ दाल, राजमा, कढ़ी जैसा कुछ मिल सकता है। इसके अलावा चाय, कोल्ड-ड्रिंक्स, चिप्स, नमकीन, बिस्किट भी मिल जाते हैं। हम दोस्तों ने खाना खाया और थोड़ी देर के लिए कमर सीधी की। पहले पड़ाव पर बनी इन दुकानों में अंदर ही मिट्टी का प्लेटफार्म बनाकर 10-20 लोगों के आराम करने की व्यवस्था भी की गई है। विशाल ने खाना खा लिया था तो उसे बुखार और बदन दर्द की दवाई भी दे दी। सभी पहले से बेहतर महसूस कर रहे थे। दुकान से कुछ सामान की खरीददारी कर हम आगे बढे। पहाड़ों के बीच मौजूद इस समतल मैदान से आगे के सफर के लिए पत्थरों की पगडंडी बनी हुई है। हरे घास के मैदान के बीच पत्थरों का रास्ता और सामने खड़ा पहाड़ ऐसा लगता है मानों किसी बड़े से बंगले के पोर्श में जाने के रास्ते पर आप आगे बढ रहे हों। कुछ ही दूर चले थे कि विनीत ने कुछ ऐसा कहा जिससे एक बारगी तो मैं भी डर गया। गगन मैं आगे नहीं जा पाऊंगा, मैं और विशाल वापिस लौट जाते हैं। तुम सब आगे जाकर आओ। मेरा विज़न ब्लर हो रहा है। मेरे लिए ये अप्रत्याशित था। विनीत के साथ हम सब वहीं बैठ गए और उसे समझाया कि देख अगर जाएंगे तो सब इकट्ठे जाएंगे वरना हम भी वापिस चलेंगे। हम जानते थे कि विनीत के लिए ये मुश्किल है पर ये भी तय था कि आधे रास्ते से वापिस नीचे लौटना भी उतना आसान नहीं होगा। ख़ैर विनीत को भी पेन किलर्स देकर और ये वायदा करके चलने के लिए तैयार किया कि जहां वो कहेगा हम रुक जाएंगे और आराम से चलेंगे। एक बार फिर हम आगे बढ़ चले। रास्ता पहाड़ी जंगल का ही था। धीरे धीरे चलते चलते सब कुछ सामान्य हो गया। जंगल के पहाड़ी रास्ते पर चलते चलते कई जगह फोटो सेशन भी हम लोगों ने किए। खाना खाने के बाद की सुस्ती और थकावट के बाद मिले थोड़े आराम का आलस हम पर हावी था। शरीर का वार्म-अप भी ठंडा हो गया था। तो रफ्तार भी कम हो गई थी। जैसे जैसे आगे बढते गए शरीर में ऊर्जा का संचार होता गया। रास्ते में एक जगह बैठकर हमने विशाल की ताजपोशी भी की । तौलिए का ताज बनाकर। दरअसल विशाल को ठंड लग रही थी और उससे कानों पर तौलिया बंध नहीं रहा था इसलिए ये अनोखी दस्तारबंदी हुई। वक्त बीतने के साथ साथ मौसम में गुलाबी ठंडक का अहसास हमें होने लगा था। जंगल की हरियाली और वातावरण की नमी इसे बढा रही थी। लेकिन एक बात हमारी फिक्र भी बढा रही थी, वो ये कि काफी देर से हम जंगल के इस रास्ते पर चल रहे थे और अभी तक दूसरा पड़ाव नहीं आया था। तीसरा कब आएगा ये कहना नामुमकिन था। जोश में आकर मैने टीम को लीड करना शुरु किया। काफी आगे आगे तक मैं और अजीत चलते रहे जिससे बाकी के लोग भी थोड़ा खुद को स्पीड-अप कर सकें। कुछ ही देर में हल्की बूंदा बांदी जैसा हमें महसूस हुआ। हम सभी ने सुबह की खरीददारी में से अपने अपने रेनकोट निकाले और पहन लिए। मेरी और अजीत की रफ्तार अभी बाकी सब से थोड़ा ज़्यादा थी। अनिल ने विनीत का हाथ पकड़ा हुआ था और इसलिए वो थोड़ा पीछे चल रहा था। थोड़ी ही देर में पहाड़ का एक घुमावदार मोड़ पार करने के बाद सीधी सीधी पगडंडी आ गई, जिस पर काफी आगे तक देखा जा सकता था। मैं आगे आगे चल रहा था। हल्की बूंदा बांदी अब थोड़ा ज़्यादा होने लगी थी, बूंदे मोटी हो गई थी। रफ्तार बढाते ही सीधी पगडंडी के आखिरी सिरे पर पहुंचने से कुछ पहले ही चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। हमें फिर से दो तीन दुकानों जैसा कुछ नज़र आ रहा था। ये दूसरा पड़ाव था। बूंदा बांदी पूरी तेज़ होने के कुछ पलों में ही हम इस पड़ाव तक पहुंच गए थे। अंदर जाकर देखा तो पहले पड़ाव की दुकानों की तरह यहां भी एक तरफ चाय वगैरह बनाने का इंतज़ाम और दूसरी तरफ आराम करने के लिए खुली जगह थी। हम लोग भी यहां लगभग पसर गए। कुछ पहाड़ी स्कूली बच्चे अपने स्कूल टीचर के साथ चूड़धार जाने के लिए यहां आए हुए थे। उनके टीचर ने बचाया कि इस के बाद ज़्यादा रास्ता नहीं लगभग डेढ से दो घंटे और लगेंगे। हमें एक बार फिर से लगा जैसे नव ऊर्जा का संचार हुआ हो। दूसरे पड़ाव पर हमने चाय पी औऱ पूछा कि तीसरा पड़ाव कहां आएगा। हमें पता चला कि तीसरा पड़ाव है ही नहीं इस दूसरे पड़ाव का नाम ही तीसरी है। यानि इसके बाद अब सीधे चूड़धार पहुंचकर ही ब्रेक लगेंगे। ये सोचकर रोमांच का अहसास हुआ। शाम की चाय पीने के बाद तीसरी से आगे जाने के लिए एक बार हम फिर से कदम बढा चुके थे। हालांकि इस वक्त तक पांव की एड़ी में एक अजीब सी टीस परेशान करने लगी थी, पर जूते उतार कर दर्द की जगह देखना मतलब खुद को कमज़ोर करना.... ये ही सोचकर दर्द को पटखनी दी और एक बार फिर हम सब चल पड़े तीसरी से आगे। पहले पड़ाव से लेकर तीसरी तक का रास्ता जहां पहाड़ी जंगल का था वहीं तीसरी से आगे का रास्ता सफाचट पहाड़, उस पर उगी घास और पहाड़ के साथ साथ बनी कच्ची पगडंडी वाला था। तीसरी से जैसे ही आगे चलते हैं तो बिल्कुल सामने खड़े पहाड़ की एक किनारी से रास्ता जाता है दूसरी तरफ। ऐसा लगता है मानो आप एक दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में जा रहे हों। रास्ते की बनावट भी ऐसी है कि पहाड़ के एक तरफ, जहां तीसरी मौजूद है वहां से पत्थर की बनी सीढियां जाती हैं और दूसरी तरफ रास्ता नीचे उतरता है पत्थरों के बीच से ही। ऐसा लगता है मानों पहाड़ के उस पार की दुनिया नें एक दरवाज़ा बनाया हुआ है जिसके इस पार तीसरी का पड़ाव है तो उस पार चूड़धार तक पहुंचने की आखिरी चुनौती। दिन अभी छिपा नहीं था और शाम के करीब 6 – सवा छह का वक्त था जब तीसरी से हमने अपना सफर शुरु किया। हमें लग रहा था कि अगर कुल दो ढाई घंटे का सफर है तो हम आठ साढे आठ बजे तक चूड़धार पहुंच जाएंगे। सफर शुरु हुआ और पहाड़ के पीछे की तरफ बनी पगडंडी पर चलते-चलते हमें कुछ ही देर में महसूस होने लगे कि आगे क्या दिक्कत आएगी। दरअसल तीसरी के बाद के रास्ते में सफर ऊंचाई वाला है। जहां ऑक्सीजन थोड़ी कम होने लगती है और सांस लेने के लिए नाक और मुंह दोनों का इस्तेमाल करना पड़ता है। तीसरी से आगे का ये रास्ता कुछ ऐसा है जो कई जगह पर बेहद खतरनाक लगता है। कुछ ऐसा कि एक बार भी आप संतुलन बनाने में चूके तो रास्ते से सीधा तलहटी में। इसी रास्ते पर चलते चलते कुछ थकावट अब महसूस होने लगी थी। सुबह 10 बजे से लगातार ट्रैकिंग करते करते 9 घंटे हो चुके थे। थोड़ी देर में अंधेरा घिर आया। एक छोटी टॉर्च अनिल और अजीत के पास थी और एक बड़ी लाईट वाली टॉर्च हमने सुबह ही नौहराधार से ली थी। अंधेरा होने से पहले हमने तय किया कि सभी अपने गर्म कपड़े और रेनकोट भी पहन लें। क्योंकि शाम के वक्त में बादरल औऱ ओस दोनों ही इस पहाड़ी रास्ते पर ठंड को बढा सकते थे। अजीत औऱ मैं छोटी टॉर्च के साथ आगे आगे बढे बीच में अजीत और विनीत को रखा और सबसे पीछे विक्की और विशाल बड़ी टॉर्च के साथ चले। हम चारों में से विक्की और विशाल इस वक्त में सबसे ज़्यादा सक्षम थे। मुझे अपने पांव की एड़ी में दर्द की वजह से अजीत का सहारा लेना पड़ रहा था और विनीत को भी थकावट महसूस हो रही थी। अंधेरा घिरने लगा तो दिन के उजाले में जो रास्ता खूबसूरती से लबरेज़ नज़र आ रहा था वो ही अब डरावना लगने लगा था। ठंड के साथ-साथ थकावट असर दिखाने लगी थी। तय ये किया कि कुछ दूर चलने के बाद थोड़ी थोड़ी देर के लिए हम रुकेंगे और बैठेंगे। अभी तक मैं पूरी तरह से ट्रैकिंग का मज़ा ले रहा था पर अब चेहरे पर कुदरती हंसी की जगह बनावटी मुस्कुराहट आ रही थी और अपने दोस्तों को शाबाश शाबाश चलो चलो कहने में भी अजीब सा महसूस हो रहा था। हद तो तब हुई जब एक जगह हम कुछ देर के लिए बैठे और मैने आंखे बंद कर ली और नींद ने मुझे घेर लिया। विक्की ने मुझे आवाज़ दी तो मुझे सुनाई तो दिया पर ऐसा लगा जैसे कोई सपने में बुला रहा है। वजह साफ थी, आरामपरस्ती की आदत से एक दम से 10 घंटे की पहाड़ी ट्रैकिंग ने शरीर को बुरी तरह थका दिया था। जहां दिमाग से शरीर को संदेश तो जा रहे थे पर शरीर उसे मानने को तैयार नहीं था। ये अजीब हालात थी। पर मेरे दोस्तों ने मुझे उठाया और फिर हमने फैसला किया कि अब कहीं रुकेंगे नहीं। कुछ आगे जाकर एक रास्ता पहाड़ पर ऊपर की ओर और दूसरा नीचे की ओर जा रहा था। दिन का वक्त होता तो रास्ता पहचानने में दिक्कत नहीं होती पर रात में ये मुश्किल थी कि अगर एक बार गलत रास्ता पकड़ा तो फिर गए काम से। अनिल ने ऊपर की ओर जाने वाले रास्ते पर थोड़ा आगे तक जाकर देखा तो वहां झाड़ियां ही थी.... यानि रास्ता बंद था फिर नीचे की ओर जाने वाला रास्ता भी चैक किया तो वहां से आगे रास्ता नज़र आया। इस वक्त एक और चीज़ जो रास्ता समझने मे हमारी मदद कर रही थी वो थी पानी स्पलाई की पाईप लाईन, जो इस बात का सबूत थी कि आगे की तरफ रिहाइशी इलाका है।थोड़ा और आगे बढे तो एक और ऊंचाई नज़र आई। अजीत के मुताबिक उस उंचाई के पार ही चूड़धार था। हालांकि पिछले काफी वक्त से अजीत और अनिल भी हमें यकीन दिला रहे थे कि बस आधे घंटे बाद चूड़धार आ जाएगा। ऐसा करते करते वक्त बीतता जा रहा था।हमने पहाड़ी की ऊंचाई भी पार की और फिर वहां से नज़र आई कुछ रोशनी। ये लाईट्स चूड़धार की थी। चूड़धार के लिए ऊंचे पहाड़ से नीचे की तरफ उतरना था। पानी की टंकियों के पास से होकर जाता रास्ता मंदिर के पीछे की तरफ मिलता है। लगभग सवा 10 बजे हम चूड़धार पहुंच चुके थे। रोमांच चरम पर था। लग रहा कुछ अविश्वसनीय सा कर दिखाया हो। चूड़धार, पहाड़ियों के बीच मौजूद छोटा सा क्षेत्र है। जहां पहाड़ी शैली में बना शिर्गुल देवता का मंदिर, कुछ एक दुकानें और कुछ दो चार पक्की इमारतें हैं। हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि पहले हम खाना खा लें। चूड़धार की खास बात ये कि दुर्गम इलाके में सुविधाओं से रहित होने के बावजूद मंदिर की प्रबंधन कमेटी ने तमाम इंतज़ाम किए हुए हैं। जिसमें आने वाले हर श्रद्धालु के लिए लंगर में खाना मिलता है वहीं सोने के लिए कंबल भी मुहैय्या करवाए जाते हैं। जिसके लिए पांच रुपए प्रति कंबल की दर से सिक्योरिटी जमा करनी होती है। जिसे आप वापिस भी ले सकते हैं। भंडारे के लिए लाईन लगी हुई थी। जूते उतार कर हम भी लाईन में लग गए। लाईन जाकर एक हाल में खुलती थी जहां खाना खिलाने के लिए छोटे और बड़े लकड़ी के बेंच सारे हाल में लगाए हुए थे। बड़ा यानि ऊंचा बेंच खाना रखने के लिए और छोटा बैंच बैठने के लिए। ठंड से परेशान हम सभी को गरम गरम चावल और दाल का वो प्रसाद किसी फाईवस्टार होटल के डिनर से भी अच्छा लग रहा था। भंडारे में हर श्रद्धालु के लिए थाली और गिलास की व्यवस्था है। भंडारा वितरण करने वाले लोग एक बड़े से लकड़ी के टोकर से चावल बांटते रहते हैं और दूसरा शख्स उसी पर दाल डालता रहता है। प्रसाद हाथ से ही खाया जाता है। खाना खत्म हुआ तो सब लोग उठने लगे। पर मेरे लिए उठना मुसीबत बन गया । वजह था टांगों में नसों का अकड़ना ऐसा लग रहा था कि टांग मोड़ने की कोशिश की तो टूट जाएंगी। दर्द से मैं चिल्ला रहा था। अनिल ने मुझे सहारा दिया और जैसे तैसे मैं सीधा खड़ा हुआ। खाना खाकर हम बाहर आए तो जूते पहनने के लिए पहुंचे। जूते पहनते वक्त मेरी कंपकंपी छूट गई। पता चला कि चूड़धार मे रात को पारा शून्य से कई डिग्री नीचे गिर जाता है। खैर जूते पहन कर हम में से अनिल, विनीत और विक्की कंबल का इंतज़ाम करने में जुटे। हमें बेतहाशा ठंड महसूस हो रही थी तो हम लोग हरेक के लिए चार से छह कंबल लेना चाहते थे। ताकि दो-तीन नीचे बिछा सकें और बाकी ओढ सकें। पर अनिल और अजीत ने जो किया वो देखकर उन दोनों के लिए मन में सम्मान कई गुना बढ गया। अनिल ने कहा कि वो दोनों 4 कंबल में ही एडजस्ट हो जाएंगे। ताकि बाकी सब लोगों को कंबल मिल सकें। ये सोच कमाल की थी। सरलता से निकली सोच... जहां हम सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सब के लिए सोचते हैं। सोने का इंतज़ाम लंगर हाल में ही किया गया था। बैंच हट गए थे और नीचे दरियां बिछा दी गई थी। खैर, रात को सोने से पहले हमने जब रेनकोट उतारे तो अंदर जैकेट पानी से भीग चुके थे। दरअसल, रात में बादल और ओस जो रेनकोट के अंदर चले गए तो बाहर ना आने और अंदर की गर्मी से दोनों पानी में बदल गए जिससे जैकेट पूरी तरह से भीग गया था। सोने से पहले हमने पेन किलर ली और फिर लंबी तान कर सो गए। सुबह आंख खुली तो एक ताज़गी का अहसास हुआ, जो मैदानी इलाकों में कभी महसूस नहीं हो सकती। हम चारों उठकर बाहर आए और दिन की रोशनी में चूड़धार मंदिर और आस पास का इलाका देखा। कुछ लोग दर्शन करके पहाड़ी रास्ते से वापिस जा रहे थे। चूड़धार में मंदिर थोड़ा उंचाई पर पहाड़ी शैली जिसे पगोडा शैली भी कहते हैं में बना है। मंदिर के क्षेत्रफल के मुकाबले उंचाई काफी ज़्यादा है। आस पास के क्षेत्र में गिनी-चुनी दुकानें हैं जहां मंदिर के पूजा पाठ से जुड़ा प्रसाद, चुन्नियां कैलेंडर वगैरह मिलते हैं। ऐसी ही एक दुकान पर हमने अपना सामान रखा और एक-एक चाय का कप पीकर फ्रैश होने के लिए पहाड़ का रुख किया। सुबह के करीब आठ बज चुके थे पर रात को ठंड से हुए एनकाउंटर के बाद सुबह को नहाने का सोचना भी हालात बिगाड़ने जैसा था। इसीलिए पंचस्नान करके और दुकानदार को वापिस आकर नाश्ता करने का कहकर हम सामने बने मंदिर की ओर चले गए। मंदिर के बाहर पुजारी जी बाल्टी में से ठंडे पानी का लोटा लेकर इच्छुक श्रद्धालुओं के सिर पर डाल कर उन्हें स्नान करवा रहे थे। हमें तो देखकर भी ठंड लगनी शुरु हो गई। वहीं मंदिर में मौजूद लोग जो आस-पास के अंचल से आए थे, अपनी मान्यताओं और मन्नतों के पूरा होने पर पूजा पाठ करवा रहे थे। अपनी बारी आने पर हम लोगों ने भी मंदिर में मत्था टेका और बाहर आ गए। मंदिर के अंदर लकड़ी की नक्काशी का बेहतरीन काम किया गया है जो अभी भी जारी है। काष्ठ और पत्थरों का ढांचा मंदिर की खूबसूरती तो बढाता ही है साथ ही आस पास की इमारतों से इसे अलग भी करता है। हमें हैरानी इस बात की थी कि यहां तक के सफर में हमारे साथ आया अनिल मंदिर में मत्था टेकने अंदर नहीं गया। अनिल, बीएससी कर रहा है, मंदिर में क्यों नहीं गया, ये सवाल पूछें या ना पूछें। खैर तमाम ख्यालों के बीच हम वापिस उसी दुकान पर आ गए जहां सामान रख कर गए थे। दुकान वाले भाई ने परांठे तैयार किए हुए थे। हमने परांठे के साथ मक्खन पूछा तो उसने घर का बना गाय के दूध का घी सबको परोस दिया। परांठे खाकर हमने पैसे चुकता किए तो सिर्फ परांठे और चाय के पैसे ही लिए, घी के नहीं, हमने देना चाहा तो कहने लगा, घी तो घर का है, आपने खाया, हमने खाया, एक ही बात है। एक और सैल्यूट पहाड़ के लोगों की सरल सोच को। मैदान में होते तो घी के लिए परांठे से ज़्यादा कीमत बिल में लग चुकी होती। खैर नाश्ता करने के बाद एक बार फिर हम चूड़धार से चल पड़े उस पहाड़ी की तरफ जो मंदिर से थोड़ी ही दूर है और जिसकी चोटी पर मौजूद है भगवान शिव का मंदिर। मंदिर से पीछे पानी की टंकी तक का रास्ता और वहां से फिर सामने की तरफ पहाड़ का रास्ता। हम एक बार फिर ट्रैक पर थे। ट्रैक जिसमे सारा रास्ता पत्थरों से भरा था। ऊपर चोटी तक पहुंचने के लिए हमें बड़ी बड़ी शिलाओं को पार करना था। इस के लिए हिम्मत चाहिए थी। खैर मंदिर तक आए और अगर ऊपर तक ना गए तो सफर अधूरा रह जाएगा। हिम्मत कर के और एक दूसरे को सहारा देते हम ऊपर तक पहुंच गए। इसी रास्ते में विनीत ने बताया कि अजीत मंदिर के अंदर इसलिए नहीं गया क्योंकि उसकी जाति वालों को शिर्गुल देवता के मंदिर में अंदर जाने की इजाज़त नहीं है। कानों में ये बात बम की तरह फूटी। पहाड़ों में जातीय व्यवस्था कई जगह अब भी हावी है, ये तो पता था, पर  इतनी ज़्यादा ये नहीं सोचा था। पर यहां तो कोई पूछ नहीं रहा था जाति के बारे में, तो वो जा सकता था। पर विनीत ने बताया कि अजीत खुद ही इस मान्यता को माने हुए है। उसे किसी ने रोका नहीं पर उसे पुरानी परंपराओं का पता है तो वो खुद ही नहीं गया औऱ अब वो ऊपर शिवजी के मंदिर में मत्था टेकेगा। ये सब हैरान करने वाला था। खैर हम पहाड़ की चोटी पर पहुंचे और विहंगम दृश्य देखा। वृहत हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पर खड़े होकर हम पहाड़ों की दूर तक फैली श्रृंखलाओं को हम देख सकते थे। जो हमे काफी छोटी लग रही थी। ऐन चोटी पर शिवजी की बड़ी मूर्ति है और इस मूर्ति के आधार में ही बना है छोटा सा कोठरी नुमा मंदिर।हमने कुछ पल मंदिर के सामने की खाली जगह पर बैठ आस पास के नज़ारों को नज़रों में कैद किया। फिर पंडित जी से नौहराधार के लिए सीधा रास्ता पूछा और चोटी के दूसरी तरफ उतरना शुरु किया। मंदिर के पीछे की तरफ उतरने वाला रास्ता नौहराधार को जाने वाले रास्ते में मिल जाता है। हालांकि ये उतराई भी क्योंकि पत्थरों के रास्ते के बीच है तो सावधानी बरतने की काफी ज़रूरत होती है। खैर इस रास्ते से हम नीचे उतरे और फिर चल पड़े नौहराधार की तरफ। मन में इस बात की खुशी थी कि चूड़धार का सफर तय कर लिया था। और वृहत हिमालय की सबसे ऊंची चोटी फतह कर चुके थे। तो वापसी की चाल में तेज़ी थी। इस बात का भी फर्क होता है अगर आपको पता हो कि आपको कितना सफर तय करना है। आते वक्त हमें पता ही नहीं था कि कितना और आगे जाना है। पर जाते वक्त ये अंदाज़ा था कि नौहराधार कितनी दूर है। तो कदम आगे बढ रहे थे। अचानक एक खेल सूझा और आकाशवाणी के पसंदीदा फिल्मी गीतों के प्रोग्राम की तर्ज पर हमने गाने गाने शुरु कर दिए। सफर का मज़ा भी दोगुना हो गया। साथ ही हम याद करते गए कि जाते वक्त हमने किस किस हालात का सामना किया और कैसे हम चूड़धार पहुंचे। सभी एक ही बात से सहमत थे कि ये भगवान शिव का ही आशीर्वाद था कि हम चूड़धार तक जा सके और दर्शन कर सके। वापसी में पहला पड़ाव तीसरी था जहां हमने कुछ फल लेकर खाए और कुछ नमकीन बिस्किट भी खरीदे। थोड़ा तेज़ी से चलते चलते, मस्ती करते, गाने गाते और एक दूसरे से पूछते,और भाईजी, ठीक-ठाक हम शाम की चाय के वक्त तक दूसरे पड़ाव पर पहुंच चुके थे। यहां हमने चाय पी, थोड़ा सा खाना खाया और फिर नौहराधार की राह पकड़ी। पहाड़ी जंगल का रास्ता पार करने के बाद चाबधार से आगे थोड़ा सा हमारा रूट डायवर्ट हो गया और हम कुछ ऐसे रास्ते से वापिस नौहराधार पहुंचे जहां पत्थरों के साथ साथ रेत भी था। वापसी में भी हमारी हिम्मत एक बारगी तो जवाब दे गई थी, पर इस बात की खुशी थी कि चूड़धार समिट करने में हम कामयाब रहे। पहाड़ से नीचे उतरकर वापिस मैने पीछे मुड़कर देखा और उस परमशक्ति का धन्यवद किया जिसने कुदरत की असीम खूबसूरती को हमारी यादों में संजोने में हम सभी का साथ दिया।
नौहराधार वापिस पहुंचकर एक मुश्किल ये सामने आई कि हमारे ड्राईवर का कोई अता-पता नहीं था। वो होटल से बाज़ार में गया था और फोन होटल के कमरे में छोड़ गया था। खैर काफी मशक्कत के बाद हमने उसे ढूंढ लिया और अनिल औऱ अजीत को उसी होटल में ठहराकर उनसे विदा ली और वापिस राजगढ आ गए। अगला दिन दोपहर तक हमने होटल में ही मस्ती और आराम किया और फिर सिरमौर को अल्विदा कहकर वापिस मैदान का रुख कर लिया। रास्ते भर सफर की तमाम यादों को लेकर बात होती रही। क्योंकि यादगार से ज़्यादा ये सफर एक नई ऊर्जा का संचार करने वाला था जो आने वाले वक्त तक हमारे साथ रहेगी।