Sunday, April 22, 2012

तेरी ओर जाने वाली हवा से

सुन, तुझे उड़ना तो आ गया
लेकिन उड़ान संभल कर भरना
पहाड़ों की तरफ से होकर जाओ
तो थोड़ा ठहरना, रुकना फिर चलना
इस मौसम में बेलगाम परिंदे हैं
और मुझे तेरी उड़ान से मोहब्बत है
तेरी दो प्यारी-सी आँखे इतनी उंचाई से
जब जब ज़मीन पर मुझे ढूँढती हैं
मैं ख़ामोश सा लफ्ज़ों में गुम हो जाता हूं
लफ्ज़ इकट्ठे आ जाते हैं, बारिश जैसे
यादें, बातें, मुस्कान, रोना-हंसना, सबकुछ
इतनी ज़्यादा बारिश की कभी आदत ना थी
मैं एक एक बूंद को छूने वाला
कैसे समेट लूं इस लफ्ज़ों के तूफान को
अपने अनकहे शब्दों की चादर में
अब तो चादर भी भीग गई है
कल रात आँखें ज़्यादा गीली हो गई थी ना
बड़ों के लिए सब आसान होता है
मैने सुना है
देखा नहीं किसी ने अब तक
आसमान जैसे बड़े की मुश्किल आसानी को
कहां समेटे आँखों का पानी
कैसे रोके चादर को भीगने से
और कहां थाम ले लफ्ज़ों के तूफान
तुझे उड़ना तो आ गया हवा
तू ही ले जा सब कुछ
उस ओर
उसी की ओर.....
गगन    

Tuesday, February 14, 2012

कुछ दिन पहले

फिर से बारिश की एक बू्ंद
गुलाब की पत्ती से
घास की नोक तक
गिरते गिरते बची
और
खुशबू ने फिर
हवाओं से कर दिया
प्यार का इज़हार.....

Friday, February 10, 2012

शहर

वो
मर गए और किसी को खबर ना हुई
लोग शोरो गुल में खामोश थे
डिस्क मे म्यूज़िक तेज़ था.....

Tuesday, February 7, 2012

एक बार फिर

कोरे काग़ज़ वाले ख़त अब कहाँ मिलते हैं
बिना कलम और स्याही के जो लिखते थे हम तुम
ऐसे अक्षर शब्दकोष में कहां दिखते हैं
शब्दों की मंडी है, कीमतें बढी हुई हैं
बिन बारिश मुसकाएं, फूल वो कहां खिलते हैं