Friday, December 18, 2015

9 साल... यादें !

उन सभी शिक्षकों को मनम करते हुए जिनके सिखाए की वजह से यहां तक आया...

18 दिसंबर 2006... पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में हुई कैंपस प्लेसमैंट के बाद दिल्ली में ज़ी मीडिया के दफ्तर में बतौर ट्रेनी मेरा पहला दिन... 9 साल बीत चुके हैं... पीछे मुड़कर देखूं तो बहुत सी यादें... बहुत सी बातें हैं...। कितने लोग, कितने चेहरे, कितने दोस्त, कितने सहयोगी... इस लाईन ने बहुत कुछ दिया है...। 12वीं के बाद बंसीलाल सरकार के राज के आखिरी जेबीटी बैच (साल 2000) का डिप्लोमा होल्डर होने के बावजूद ग्रेजुएशन (मैथ्स) करते करते ये फैसला करना कि अब पत्रकारिता में ही करियर बनाना है...  इसकी वजह सिर्फ एक थी... इस फील्ड का ऐसा आकर्षण जो आपको किसी ढर्रे में नहीं बांधता... रोज़ाना कुछ नया करने की, सीखने की इस क्षेत्र की चुनौती...। बाकी के तमाम क्षेत्रों में 9 से 5 बजे तक की बंधी बंधाई नौकरी हो सकती है... मीडिया में नहीं...। यही आकर्षण और यही दीवानगी इस फील्ड से आज भी जोड़े हुए हैं...। बहरहाल... खट्टी-मीठी यादों का अब तक का कारवां किस मंज़िल पर ले जाएगा... पता नहीं... रोज़ाना एक नई सच्ची कहानी को सुनते, देखते, लिखते, पढते... खुद भी रोज़ाना की ज़िंदगी एक नई कहानी सी लगती है... कौन सा पेज ब्लैंक होगा... और किस पेज पर कहानी का क्लाईमैक्स है... पता नहीं.... बस कोशिश है लिखने की... बातें करने की... जो सवाल ज़हन में आते हैं उनके जवाब ढूंढने की... दोस्त खूब सारे बने हैं... उनसे दोस्ती बनी रहे... कहीं भी रहूं... ये जुड़ाव जो अपने आप में महसूस होता है... कायम रहे... इसी दुआ के साथ... 

'अपनी यादों में समेट लो गगन, रेत की मानिंद फिसलता जा रहा हूं'

बहुत बहुत शुक्रिया उन सभी का जो इस सफर के हमराही बने, हमसाया बने...

गगन    

Wednesday, December 16, 2015

सवाल संस्कृति का है...

2001 के बाद से पढाई के दिनों में और उसके बाद भी कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पहले एक प्रतिभागी और फिर प्रबंधन टीम रत्नावली के सदस्य के तौर पर एक अलग सी दुनिया को मैने नज़दीक से देखा और कई बातों को महसूस किया...एक बात आज आप सबसे शेयर करना चाहता हूं...। अक्सर हम लोग देखते थे कि यूनिवर्सिटी में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों में ज़बरदस्त भीड़ दर्शकों की होती... इस भीड़ में कला के कितने पारखी थे, कितने कद्रदान ये तो पता नहीं पर मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों पर दर्शकों की प्रतिक्रिया बड़ी अलग सी होती...। तालियां बजाने वाले कम... चीखने चिल्लाने वाले... हूटिंग वाले ज़्यादा। मंच से बार बार अपील की जाती... दर्शकों से सभ्य व्यवहार की... पर वो कम ही देखने को मिलता... हां ! एक बात तो थी कि दर्शकों के जमघट में बदलते वक्त के साथ बदलाव तो आ रहा था... पर कम...। इन बातों को 14 साल हो चुके हैं... अब जब मैं एक बार फिर से इस पूरी तस्वीर को सामने रखकर ये सोचता हूं कि ऐसा क्यों था... तो एक बहुत सीधी सी बात समझ में आती है... आदत। आदत चीखने चिल्लाने की नहीं... बल्कि आदत सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लगातार ना देख पाने की....। असल में हमारे हरियाणा के दर्शकों को लोक संस्कृति आधारित कार्यक्रम ज़्यादा देखने को मिलते ही नहीं...। मुझे पढ़ाई के सिलसिले में ही कुछ वक्त पंजाब में रहने का मौका भी मिला। थियेटर के दोस्तों के साथ रहकर पंजाबी रंगमंच में कुछ एक भूमिकाएं अदा करके काफी कुछ सीखने और देखने को मिला। मैं गुरुचरण भाई के साथ नेति थियेटर ग्रुप में था... हम लोग अलग अलग गांवों कस्बों में नाटक करने जाते। वहां के लोग, जिनमें बड़े बुज़ुर्ग, महिलाएं बच्चे सभी नाटकों को देखने आते, देखकर उसके बाद नाटक के बारे में बात भी करते...। एक अलग तरह का माहौल वहां देखने को मिला। कुछ ऐसा ही रुझान वहां लोगों के दिलों में पंजाबी गायकों के लिए भी है। यू ट्यूब पर आपको अलग अलग पंजाबी गायकों के अखाड़े के वीडियो देखने को मिल जाएंगे। कुल मिलाकर बात ये कि अपनी संस्कृति और कला के लिए प्यार और कलाकारों के लिए सम्मान कोई एक आध दिन में पैदा नहीं होता। ये माहौल तैयार किया जाता है धीरे-धीरे। अफसोस ये देखकर होता है कि हमारे अपने प्रदेश हरियाणा में ऐसा माहौल नहीं बन पाया। बनाया जा सकता है... पहले बड़े बड़े मेलों के ज़रिए.... फिर धीरे धीरे गांवों में भी....। इस की ज़रूरत है। इससे दो मकसद एक साथ हल होंगे। एक तो हमारे जो लोक कलाकार हैं उन्हें एक पहचान मिलेगी। और दूसरा जो दर्शक हैं वो भी जब अपनी लोक कलाओं को लगातार देखेंगे और समझेंगे तो एक सम्मान उनके दिल में पैदा होगा। एक बेहतर दर्शक संस्कृति भी बनेगी... हम ऐसा कर सकते हैं..। हैं ना...

Saturday, December 12, 2015

कुछ कुछ...

रात अजब सा रंग तन्हाई का है
ये आलम मेरे दोस्त जुदाई का है
कायनात का मुजरिम मैं कैसे बना
मेरे सामने सवाल ये खुदाई का है

Tuesday, December 8, 2015

सबको सन्मति दे भगवान !


दिल्ली में प्रदूषण का स्तर जब अति की अति को पार करने लगा तो सरकार ने एक फैसला किया... गाड़ियों के नंबर के हिसाब से सड़क पर चलने की इजाज़त देने का... प्रतिक्रिया हर स्तर पर हुई... कहीं विरोध के रूप में... कहीं स्वीकार करके... कहीं चर्चाओं में तो कहीं चुटकुलों में... क्या हम हर चीज़ को राजनीति के चश्मे से देखने के आदी हो गए हैं... असल में हमारे देश में कुछ कुर्सियों के साथ एक-दो टैग लगे हुए हैं... वीआईपी... वीवीआईपी... वीवीवीआईपी... इन टैग वाली कुर्सियों पर बैठने वाले लोग कितने ही मुद्दों को ना तो उस तरीके से महसूस कर पाते हैं जैसा आम लोगों को होता है ना ही इन लोगों पर उस तरह से मुद्दों का असर होता है जैसा आम जनता पर होता है.... फिर बात चाहे महंगाई की हो... भ्रष्टाचार की हो... या ऐसे ही किसी दूसरे मुद्दे की... दिल्ली में बढते प्रदूषण की मार को राज्य सरकार ने समझा और एक फैसला लेने की कोशिश की है... ऐसे फैसले पूरे देश में लिए जाने चाहिएं... पर इनके साथ ही एक चीज़ को सुधारने की ज़रूरत है... सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था....। दिल्ली में इसकी हालत ज़्यादा बेहतर नहीं... खास कर तब जब सुबह और शाम का अति व्यस्त समय होता है... मेट्रो हो... बसें हों... ऑटो हों... सभी या तो खचाखच भरे... या फिर रेट कुछ ऐसे कि आप हायर करने से पहले सोचें... इसे आम आदमी की जद में लाना भी ज़रूरी है... केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी खुद जाम में दो घंटे के लिए फंसे तो साथ ही संकल्प लिया कि दिल्ली को जाम से मुक्त करेंगे... असल में वीआईपी टैग्स अगर कुछ एक दिन के लिए खत्म हो जाएं तो लगता है कि देश की काफी सारी समस्याएं भी खत्म हो जाएंगी... क्योंकि सो कॉल्ड वीआईपीज़ को एहसास हो जाएगा कि इस देश में बिना वीआई वाला शख्स सिर्फ 'पी' बनकर कैसे रह रहा है... हर चीज़ को राजनीति नहीं... अपनी अगली पीढी के लिहाज़ से भी देखिए... उसे आप किस माहौल में जीने देंगें.... साफ सुथरे या मास्क से ढके चेहरों वाले... और अगर राजनीति का ज़्यादा ही बुखार है तो फिर पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर हुए सम्मेलन में भी कोई सियासी दांव पेच ढूंढ लेना... वैसे याद दिला दूं कि भारत की ओर से पीएम मोदी और कैबिनेट मंत्री भी इस सम्मेलन में गए थे... सब बातों में सियासत नहीं कुछ एक में सहमति का रास्ता भी देखिए... क्योंकि सहमति से सन्मति और सन्मति से सुंदर समाज बनता है...

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान