उन सभी शिक्षकों को मनम करते हुए जिनके सिखाए की वजह से यहां तक आया...
18 दिसंबर 2006... पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में हुई कैंपस प्लेसमैंट के बाद दिल्ली में ज़ी मीडिया के दफ्तर में बतौर ट्रेनी मेरा पहला दिन... 9 साल बीत चुके हैं... पीछे मुड़कर देखूं तो बहुत सी यादें... बहुत सी बातें हैं...। कितने लोग, कितने चेहरे, कितने दोस्त, कितने सहयोगी... इस लाईन ने बहुत कुछ दिया है...। 12वीं के बाद बंसीलाल सरकार के राज के आखिरी जेबीटी बैच (साल 2000) का डिप्लोमा होल्डर होने के बावजूद ग्रेजुएशन (मैथ्स) करते करते ये फैसला करना कि अब पत्रकारिता में ही करियर बनाना है... इसकी वजह सिर्फ एक थी... इस फील्ड का ऐसा आकर्षण जो आपको किसी ढर्रे में नहीं बांधता... रोज़ाना कुछ नया करने की, सीखने की इस क्षेत्र की चुनौती...। बाकी के तमाम क्षेत्रों में 9 से 5 बजे तक की बंधी बंधाई नौकरी हो सकती है... मीडिया में नहीं...। यही आकर्षण और यही दीवानगी इस फील्ड से आज भी जोड़े हुए हैं...। बहरहाल... खट्टी-मीठी यादों का अब तक का कारवां किस मंज़िल पर ले जाएगा... पता नहीं... रोज़ाना एक नई सच्ची कहानी को सुनते, देखते, लिखते, पढते... खुद भी रोज़ाना की ज़िंदगी एक नई कहानी सी लगती है... कौन सा पेज ब्लैंक होगा... और किस पेज पर कहानी का क्लाईमैक्स है... पता नहीं.... बस कोशिश है लिखने की... बातें करने की... जो सवाल ज़हन में आते हैं उनके जवाब ढूंढने की... दोस्त खूब सारे बने हैं... उनसे दोस्ती बनी रहे... कहीं भी रहूं... ये जुड़ाव जो अपने आप में महसूस होता है... कायम रहे... इसी दुआ के साथ...
'अपनी यादों में समेट लो गगन, रेत की मानिंद फिसलता जा रहा हूं'
बहुत बहुत शुक्रिया उन सभी का जो इस सफर के हमराही बने, हमसाया बने...
गगन
18 दिसंबर 2006... पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में हुई कैंपस प्लेसमैंट के बाद दिल्ली में ज़ी मीडिया के दफ्तर में बतौर ट्रेनी मेरा पहला दिन... 9 साल बीत चुके हैं... पीछे मुड़कर देखूं तो बहुत सी यादें... बहुत सी बातें हैं...। कितने लोग, कितने चेहरे, कितने दोस्त, कितने सहयोगी... इस लाईन ने बहुत कुछ दिया है...। 12वीं के बाद बंसीलाल सरकार के राज के आखिरी जेबीटी बैच (साल 2000) का डिप्लोमा होल्डर होने के बावजूद ग्रेजुएशन (मैथ्स) करते करते ये फैसला करना कि अब पत्रकारिता में ही करियर बनाना है... इसकी वजह सिर्फ एक थी... इस फील्ड का ऐसा आकर्षण जो आपको किसी ढर्रे में नहीं बांधता... रोज़ाना कुछ नया करने की, सीखने की इस क्षेत्र की चुनौती...। बाकी के तमाम क्षेत्रों में 9 से 5 बजे तक की बंधी बंधाई नौकरी हो सकती है... मीडिया में नहीं...। यही आकर्षण और यही दीवानगी इस फील्ड से आज भी जोड़े हुए हैं...। बहरहाल... खट्टी-मीठी यादों का अब तक का कारवां किस मंज़िल पर ले जाएगा... पता नहीं... रोज़ाना एक नई सच्ची कहानी को सुनते, देखते, लिखते, पढते... खुद भी रोज़ाना की ज़िंदगी एक नई कहानी सी लगती है... कौन सा पेज ब्लैंक होगा... और किस पेज पर कहानी का क्लाईमैक्स है... पता नहीं.... बस कोशिश है लिखने की... बातें करने की... जो सवाल ज़हन में आते हैं उनके जवाब ढूंढने की... दोस्त खूब सारे बने हैं... उनसे दोस्ती बनी रहे... कहीं भी रहूं... ये जुड़ाव जो अपने आप में महसूस होता है... कायम रहे... इसी दुआ के साथ...
'अपनी यादों में समेट लो गगन, रेत की मानिंद फिसलता जा रहा हूं'
बहुत बहुत शुक्रिया उन सभी का जो इस सफर के हमराही बने, हमसाया बने...
गगन
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