Wednesday, December 16, 2015

सवाल संस्कृति का है...

2001 के बाद से पढाई के दिनों में और उसके बाद भी कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पहले एक प्रतिभागी और फिर प्रबंधन टीम रत्नावली के सदस्य के तौर पर एक अलग सी दुनिया को मैने नज़दीक से देखा और कई बातों को महसूस किया...एक बात आज आप सबसे शेयर करना चाहता हूं...। अक्सर हम लोग देखते थे कि यूनिवर्सिटी में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों में ज़बरदस्त भीड़ दर्शकों की होती... इस भीड़ में कला के कितने पारखी थे, कितने कद्रदान ये तो पता नहीं पर मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों पर दर्शकों की प्रतिक्रिया बड़ी अलग सी होती...। तालियां बजाने वाले कम... चीखने चिल्लाने वाले... हूटिंग वाले ज़्यादा। मंच से बार बार अपील की जाती... दर्शकों से सभ्य व्यवहार की... पर वो कम ही देखने को मिलता... हां ! एक बात तो थी कि दर्शकों के जमघट में बदलते वक्त के साथ बदलाव तो आ रहा था... पर कम...। इन बातों को 14 साल हो चुके हैं... अब जब मैं एक बार फिर से इस पूरी तस्वीर को सामने रखकर ये सोचता हूं कि ऐसा क्यों था... तो एक बहुत सीधी सी बात समझ में आती है... आदत। आदत चीखने चिल्लाने की नहीं... बल्कि आदत सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लगातार ना देख पाने की....। असल में हमारे हरियाणा के दर्शकों को लोक संस्कृति आधारित कार्यक्रम ज़्यादा देखने को मिलते ही नहीं...। मुझे पढ़ाई के सिलसिले में ही कुछ वक्त पंजाब में रहने का मौका भी मिला। थियेटर के दोस्तों के साथ रहकर पंजाबी रंगमंच में कुछ एक भूमिकाएं अदा करके काफी कुछ सीखने और देखने को मिला। मैं गुरुचरण भाई के साथ नेति थियेटर ग्रुप में था... हम लोग अलग अलग गांवों कस्बों में नाटक करने जाते। वहां के लोग, जिनमें बड़े बुज़ुर्ग, महिलाएं बच्चे सभी नाटकों को देखने आते, देखकर उसके बाद नाटक के बारे में बात भी करते...। एक अलग तरह का माहौल वहां देखने को मिला। कुछ ऐसा ही रुझान वहां लोगों के दिलों में पंजाबी गायकों के लिए भी है। यू ट्यूब पर आपको अलग अलग पंजाबी गायकों के अखाड़े के वीडियो देखने को मिल जाएंगे। कुल मिलाकर बात ये कि अपनी संस्कृति और कला के लिए प्यार और कलाकारों के लिए सम्मान कोई एक आध दिन में पैदा नहीं होता। ये माहौल तैयार किया जाता है धीरे-धीरे। अफसोस ये देखकर होता है कि हमारे अपने प्रदेश हरियाणा में ऐसा माहौल नहीं बन पाया। बनाया जा सकता है... पहले बड़े बड़े मेलों के ज़रिए.... फिर धीरे धीरे गांवों में भी....। इस की ज़रूरत है। इससे दो मकसद एक साथ हल होंगे। एक तो हमारे जो लोक कलाकार हैं उन्हें एक पहचान मिलेगी। और दूसरा जो दर्शक हैं वो भी जब अपनी लोक कलाओं को लगातार देखेंगे और समझेंगे तो एक सम्मान उनके दिल में पैदा होगा। एक बेहतर दर्शक संस्कृति भी बनेगी... हम ऐसा कर सकते हैं..। हैं ना...

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