Friday, December 18, 2015

9 साल... यादें !

उन सभी शिक्षकों को मनम करते हुए जिनके सिखाए की वजह से यहां तक आया...

18 दिसंबर 2006... पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में हुई कैंपस प्लेसमैंट के बाद दिल्ली में ज़ी मीडिया के दफ्तर में बतौर ट्रेनी मेरा पहला दिन... 9 साल बीत चुके हैं... पीछे मुड़कर देखूं तो बहुत सी यादें... बहुत सी बातें हैं...। कितने लोग, कितने चेहरे, कितने दोस्त, कितने सहयोगी... इस लाईन ने बहुत कुछ दिया है...। 12वीं के बाद बंसीलाल सरकार के राज के आखिरी जेबीटी बैच (साल 2000) का डिप्लोमा होल्डर होने के बावजूद ग्रेजुएशन (मैथ्स) करते करते ये फैसला करना कि अब पत्रकारिता में ही करियर बनाना है...  इसकी वजह सिर्फ एक थी... इस फील्ड का ऐसा आकर्षण जो आपको किसी ढर्रे में नहीं बांधता... रोज़ाना कुछ नया करने की, सीखने की इस क्षेत्र की चुनौती...। बाकी के तमाम क्षेत्रों में 9 से 5 बजे तक की बंधी बंधाई नौकरी हो सकती है... मीडिया में नहीं...। यही आकर्षण और यही दीवानगी इस फील्ड से आज भी जोड़े हुए हैं...। बहरहाल... खट्टी-मीठी यादों का अब तक का कारवां किस मंज़िल पर ले जाएगा... पता नहीं... रोज़ाना एक नई सच्ची कहानी को सुनते, देखते, लिखते, पढते... खुद भी रोज़ाना की ज़िंदगी एक नई कहानी सी लगती है... कौन सा पेज ब्लैंक होगा... और किस पेज पर कहानी का क्लाईमैक्स है... पता नहीं.... बस कोशिश है लिखने की... बातें करने की... जो सवाल ज़हन में आते हैं उनके जवाब ढूंढने की... दोस्त खूब सारे बने हैं... उनसे दोस्ती बनी रहे... कहीं भी रहूं... ये जुड़ाव जो अपने आप में महसूस होता है... कायम रहे... इसी दुआ के साथ... 

'अपनी यादों में समेट लो गगन, रेत की मानिंद फिसलता जा रहा हूं'

बहुत बहुत शुक्रिया उन सभी का जो इस सफर के हमराही बने, हमसाया बने...

गगन    

Wednesday, December 16, 2015

सवाल संस्कृति का है...

2001 के बाद से पढाई के दिनों में और उसके बाद भी कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पहले एक प्रतिभागी और फिर प्रबंधन टीम रत्नावली के सदस्य के तौर पर एक अलग सी दुनिया को मैने नज़दीक से देखा और कई बातों को महसूस किया...एक बात आज आप सबसे शेयर करना चाहता हूं...। अक्सर हम लोग देखते थे कि यूनिवर्सिटी में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों में ज़बरदस्त भीड़ दर्शकों की होती... इस भीड़ में कला के कितने पारखी थे, कितने कद्रदान ये तो पता नहीं पर मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों पर दर्शकों की प्रतिक्रिया बड़ी अलग सी होती...। तालियां बजाने वाले कम... चीखने चिल्लाने वाले... हूटिंग वाले ज़्यादा। मंच से बार बार अपील की जाती... दर्शकों से सभ्य व्यवहार की... पर वो कम ही देखने को मिलता... हां ! एक बात तो थी कि दर्शकों के जमघट में बदलते वक्त के साथ बदलाव तो आ रहा था... पर कम...। इन बातों को 14 साल हो चुके हैं... अब जब मैं एक बार फिर से इस पूरी तस्वीर को सामने रखकर ये सोचता हूं कि ऐसा क्यों था... तो एक बहुत सीधी सी बात समझ में आती है... आदत। आदत चीखने चिल्लाने की नहीं... बल्कि आदत सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लगातार ना देख पाने की....। असल में हमारे हरियाणा के दर्शकों को लोक संस्कृति आधारित कार्यक्रम ज़्यादा देखने को मिलते ही नहीं...। मुझे पढ़ाई के सिलसिले में ही कुछ वक्त पंजाब में रहने का मौका भी मिला। थियेटर के दोस्तों के साथ रहकर पंजाबी रंगमंच में कुछ एक भूमिकाएं अदा करके काफी कुछ सीखने और देखने को मिला। मैं गुरुचरण भाई के साथ नेति थियेटर ग्रुप में था... हम लोग अलग अलग गांवों कस्बों में नाटक करने जाते। वहां के लोग, जिनमें बड़े बुज़ुर्ग, महिलाएं बच्चे सभी नाटकों को देखने आते, देखकर उसके बाद नाटक के बारे में बात भी करते...। एक अलग तरह का माहौल वहां देखने को मिला। कुछ ऐसा ही रुझान वहां लोगों के दिलों में पंजाबी गायकों के लिए भी है। यू ट्यूब पर आपको अलग अलग पंजाबी गायकों के अखाड़े के वीडियो देखने को मिल जाएंगे। कुल मिलाकर बात ये कि अपनी संस्कृति और कला के लिए प्यार और कलाकारों के लिए सम्मान कोई एक आध दिन में पैदा नहीं होता। ये माहौल तैयार किया जाता है धीरे-धीरे। अफसोस ये देखकर होता है कि हमारे अपने प्रदेश हरियाणा में ऐसा माहौल नहीं बन पाया। बनाया जा सकता है... पहले बड़े बड़े मेलों के ज़रिए.... फिर धीरे धीरे गांवों में भी....। इस की ज़रूरत है। इससे दो मकसद एक साथ हल होंगे। एक तो हमारे जो लोक कलाकार हैं उन्हें एक पहचान मिलेगी। और दूसरा जो दर्शक हैं वो भी जब अपनी लोक कलाओं को लगातार देखेंगे और समझेंगे तो एक सम्मान उनके दिल में पैदा होगा। एक बेहतर दर्शक संस्कृति भी बनेगी... हम ऐसा कर सकते हैं..। हैं ना...

Saturday, December 12, 2015

कुछ कुछ...

रात अजब सा रंग तन्हाई का है
ये आलम मेरे दोस्त जुदाई का है
कायनात का मुजरिम मैं कैसे बना
मेरे सामने सवाल ये खुदाई का है

Tuesday, December 8, 2015

सबको सन्मति दे भगवान !


दिल्ली में प्रदूषण का स्तर जब अति की अति को पार करने लगा तो सरकार ने एक फैसला किया... गाड़ियों के नंबर के हिसाब से सड़क पर चलने की इजाज़त देने का... प्रतिक्रिया हर स्तर पर हुई... कहीं विरोध के रूप में... कहीं स्वीकार करके... कहीं चर्चाओं में तो कहीं चुटकुलों में... क्या हम हर चीज़ को राजनीति के चश्मे से देखने के आदी हो गए हैं... असल में हमारे देश में कुछ कुर्सियों के साथ एक-दो टैग लगे हुए हैं... वीआईपी... वीवीआईपी... वीवीवीआईपी... इन टैग वाली कुर्सियों पर बैठने वाले लोग कितने ही मुद्दों को ना तो उस तरीके से महसूस कर पाते हैं जैसा आम लोगों को होता है ना ही इन लोगों पर उस तरह से मुद्दों का असर होता है जैसा आम जनता पर होता है.... फिर बात चाहे महंगाई की हो... भ्रष्टाचार की हो... या ऐसे ही किसी दूसरे मुद्दे की... दिल्ली में बढते प्रदूषण की मार को राज्य सरकार ने समझा और एक फैसला लेने की कोशिश की है... ऐसे फैसले पूरे देश में लिए जाने चाहिएं... पर इनके साथ ही एक चीज़ को सुधारने की ज़रूरत है... सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था....। दिल्ली में इसकी हालत ज़्यादा बेहतर नहीं... खास कर तब जब सुबह और शाम का अति व्यस्त समय होता है... मेट्रो हो... बसें हों... ऑटो हों... सभी या तो खचाखच भरे... या फिर रेट कुछ ऐसे कि आप हायर करने से पहले सोचें... इसे आम आदमी की जद में लाना भी ज़रूरी है... केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी खुद जाम में दो घंटे के लिए फंसे तो साथ ही संकल्प लिया कि दिल्ली को जाम से मुक्त करेंगे... असल में वीआईपी टैग्स अगर कुछ एक दिन के लिए खत्म हो जाएं तो लगता है कि देश की काफी सारी समस्याएं भी खत्म हो जाएंगी... क्योंकि सो कॉल्ड वीआईपीज़ को एहसास हो जाएगा कि इस देश में बिना वीआई वाला शख्स सिर्फ 'पी' बनकर कैसे रह रहा है... हर चीज़ को राजनीति नहीं... अपनी अगली पीढी के लिहाज़ से भी देखिए... उसे आप किस माहौल में जीने देंगें.... साफ सुथरे या मास्क से ढके चेहरों वाले... और अगर राजनीति का ज़्यादा ही बुखार है तो फिर पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर हुए सम्मेलन में भी कोई सियासी दांव पेच ढूंढ लेना... वैसे याद दिला दूं कि भारत की ओर से पीएम मोदी और कैबिनेट मंत्री भी इस सम्मेलन में गए थे... सब बातों में सियासत नहीं कुछ एक में सहमति का रास्ता भी देखिए... क्योंकि सहमति से सन्मति और सन्मति से सुंदर समाज बनता है...

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान 

Saturday, November 28, 2015

...इतना डरते हैं तो.....

पिछले कुछ वक्त से देश में एक अलग तरीके की बहस चल रही है... ये बहस ना तो महंगाई और गरीबी के आंकड़ों पर है.. ना ही मुद्दा भ्रष्टाचार का है... ना बात देश के पढे लिखे नौजवानों के भविष्य की है... बात सिर्फ एक है कि आप डरते हैं या निडर हैं.... क्या अपने डर और निडरता की परिभाषा सिर्फ इतनी ही है कि कोई आकर हमे मार जाएगा ये हमारा डर है और हम किसी से भी नहीं डरते.... किसी के बाप में दम नहीं कि हमें कुछ कहे ये निडरता है... बात आगे बढी तो तमाम परिभाषाएं तय कर दी गई.... जो डरते हैं उन्हें कहां जाना चाहिए ये भी तथाकथित निडर लोगों ने बता दिया और जो नहीं डरते उन साधारण से दो आंख, दो कान, एक नाक वाले मनुष्यों की तुलना खूंखारतम माने जाने वाले, तीखे दांतों वाले, और एक पूंछ वाले शेर से भी कर दी गई... बिना ये सोचे समझे कि जंगली दुनिया से वैज्ञानिक युग तक आने में कितनी ही इंसानी पीढियों का श्रम लगा है... एक झटके में इन्सान को जानवर के टाईटल्स देकर महिमा मंडित किया जा रहा है... दौर ही ऐसा है कि डरने की बात और देश की असहिष्णुता (असहनशीलता) की बात वो लोग कर रहे हैं जिनके चारों तरफ किसी भी सार्वजनिक जगह पर 8-10 हट्टे कट्टे बाउंसर्स का ग्रुप होता है और निडरता और देश के सहिष्णु (सहनशील) होने की बात वो कर रहे हैं जिन्होंने शब्दों की मर्यादा की तमाम सीमाएं लांघ दी...  पूरी तस्वीर एक साथ रख कर देखें तो लगता है एक पागल ने आप के उपर पत्थर फैंका और आपने हाथों में पत्थर उठाकर उस पागल की ओर निशाना तान दिया और दूर कहीं बैठा एक शख्स ये सब देखकर सिर्फ ये ही सोचता है कि देखो कैसे पागल हैं... एक दूसरे पर पत्थर फैंक रहे हैं... हुज़ूर अगर डर और निडरता की असल तस्वीर देखनी है तो उस मुफलिस की आंखों में झांक कर देखिएगा जिसका सबसे बड़ा डर है कि आज की शाम वो अपने परिवार को दो रोटी खिला सकेगा या नहीं... और निडरता भी उसी शख्स की आंखों में ही नज़र आएगी जो अपने परिवार के लिए रोज़ी रोटी का जुगाड़ करने के बाद उसके पास उनकी हिफाज़त के लिए बैठता है... गली के कुत्तों से... कि कहीं कोई उसकी रोटी छीनकर ना ले जाए... बात छोटी लग सकती है... लेकिन सच यही है... असल में हमने अपनी सहूलतों के हिसाब से परिभाषाएं गढ़ ली हैं तमाम विषयों की... सच को ना हम स्वीकार पा रहे हैं और ना ही नकारते हैं... एक बड़ा सच ये है कि समाज में अपराध हर दौर में हुए हैं... अपराध का ग्राफ कम या ज़्यादा हुआ इससे आम आदमी को फर्क नहीं पड़ता उसे इस बात से फर्क पड़ता है जब वो रोज़ाना ब्लात्कार, चोरी अपहरण की वारदातों के बारे में सुनता और पढता है... ये एक ऐसा सच है जिसे स्वीकार करने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए... वहीं ये भी एक सच है कि गाहे-बगाहे ऊल-जुलूल बयान देकर अजीब सी बहस शुरु करने से खास कर बड़े चेहरों को बचना चाहिए... ये देश सब का है... सभी इससे प्यार करते हैं... किसी के लिए मादरे वतन है तो किसी की मातृभूमि... शब्दों का फर्क ना तो इस देश के लिए दिलों के प्यार को खत्म कर सकता है और ना ही इस देश की भौगोलिक स्थिति को बदलता है... संकीर्णता के दायरे से सभी को निकलना ही होगा... अगर देश को विस्तार की ओर ले जाना है... 

आखिर में डरने वालों और निडर लोगों के लिए 

लोग हर मोड़ पर रुक - रुक के संभलते क्यों है 
इतना डरते है तो फिर घर से निकलते क्यों है 

मैं ना जुगनू हूँ दिया हूँ ना  कोई तारा हूँ 
रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं 

'राहत इंदौरी'
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एक राह के हैं मीत, मीत एक प्यार के
एक बाग के हैं फूल, फूल एक हार के
देखती है यह जमीन, आसमान देखता
आसमान देखता......
कर्म हैं बंटे हुए पर एक मूल मर्म है
राष्ट्र भक्ति ही हमारा एक मात्र धर्म है...
कोटिकंठ साधकों का... एक राष्ट्र देवता...
'भारत विकास परिषद्'
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आइए

नफरत नहीं, प्यार फैलाएं... सदभाव जगाएं

Monday, November 23, 2015

पंजाब : बठिंडा में SADBHAVNA या SAD's Bhavna

सदभावना से जुड़े कितने ही ऐसे किस्से हैं... कहानियां हैं... प्रेरक प्रसंग हैं जो आपको पढने या सुनने को मिल जाएंगे...। दो आपसे साझे करता हूं...
1.
एक सच्ची घटना जो श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के जीवन काल से जुड़ी है उसमें भाई कन्हैया जी का ज़िक्र है... भाई कन्हैया जी जिन की गुरु महाराज के कुछ दरबारियों ने शिकायत की कि वो दुश्मन के ज़ख्मी सैनिकों को भी पानी पिलाता है... गुरु महाराज ने भाई कन्हैया को बुलाया, पूछा... भाई कन्हैया ने नम्रता से उत्तर दिया.. गुरु महाराज ! मुझे तो सब जगह आपका ही नूर नज़र आता है... कौन अपना और कौन दुश्मन... ये पता ही नहीं चलता... गुरु महाराज ने भाई कन्हैया को मल्हम दिया और कहा भाई कन्हैया अब से सिर्फ पानी मत पिलाना... मल्हम भी लगाना...। ये भाई कन्हैया की सदभावना की पराकाष्ठा थी...
2. 
एक कहानी जो कई बार किताबों में पढी है... एक साधु महाराज नदी के किनारे बैठे थे... एक बिच्छू को पानी में डूबने से बचाने की कोशिश कर रहे थे... बिच्छू बार-बार डंक मारता... साधू महाराज बार बार बचाते...। एक राहगीर ने पूछा.. महाराज आप क्यूं बार बार बिच्छू से डंक खा रहे हैं...। साधु ने बहुत खूबसूरत जवाब दिया... बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना... मेरा स्वभाव है बचाना...। वो अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं अपना स्वभाव भला कैसे छोड़ दूं...। ये सदभावना है।

अब बात पंजाब की... बठिंडा में 23 नवंबर को एक बड़े ग्राउंड में आयोजित सदभावना रैली में शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के तमाम बड़े चेहरे मंच पर थे और मंच के सामने थे बड़ी तादाद में लोग (जो खुद आए.. या बुलाए गए... या लाए गए...)। रैली में सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा, बीबी जागीर कौर, केंद्रीय राज्यमंत्री विजय सांपला, डीएसजीएमसी के प्रधान मनजीत सिंह जीके, अकाली दल से राज्यसभा सांसद बलविंदर सिंह भूंदड़, केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल, पंजाब बीजेपी अध्यक्ष कमल शर्मा, राज्य के उपमुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और आखिर में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने अपने विचार लोगों के सामने रखे। ये तमाम वक्ता अपनी अपनी पार्टियों के चेहरे हैं... राजनीति के माहिर हैं... पर क्या सदभावना रैली के मंच से वो संदेश दिया जा सका जो शीर्षक के तौर पर सामने रखा गया था... घूम फिर कर तकरीबन तमाम नेताओं के संबोधन में ज़्यादातर ज़ोर विरोधियों को कोसने और पंजाब के लोगों को आने वाले वक्त में सावधान रहने की चेतावनी देने पर था... हैरानी तब हुई जब राज्य के उप मुख्यमंत्री ने अपनी तकरीर खत्म होने के बाद एक बार फिर वापिस आकर एक नया स्लोगन दिया पंजाब में 2017 में किसकी सरकार.... शिरोमणि अकाली दल बीजेपी की...। सदभावना के नाम पर हुई रैली से दिया गया ये संदेश किस तरह की सदभावना पंजाब के आवाम में लाएगा... इस पर विचार किए जाने की ज़रूरत है। पंजाब जिस दौर से गुज़र रहा है उस पर चिंता होना स्वभाविक है। पर अगर इस तरह के शक्ति प्रदर्शन या आपस में इल्ज़ामबाज़ी के दौर की बजाय अगर तमाम राजनेता आपस में मिलकर पंजाब की बेहतरी की अपील लोगों से करें... (जो फिल्हाल तो next to impossible जैसा है) तो क्या ज़्यादा बेहतर ना होगा...  पर शायद राजनेताओं में, पार्टियों में और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में ये विचार शायद ना ही आ पाए...। पंजाब को क्या चाहिए... क्या ये तमाम पार्टियों (शिअद, बीजेपी, कांग्रेस, एएपी और बाकी) के नेता तब समझेंगे जब जनता 2017 में समझाएगी... कृप्या खुद संभलिए और पंजाब को संभालिए... कड़वाहट की राजनीति से हटकर विकासपरक राजनीति की बात कीजिए...

@kanwargagan
      


      

Thursday, November 19, 2015

शिवम : एक साल पहले...


अक्तूबर 2014 में हरियाणा में चुनावी सीज़न पूरे ज़ोरों पर था... वोटों की फसल काटने की तैयारी में तमाम दलों ने आस्तीने चढाई हुई थी... ZPHH की तरफ से मुझे अपने सहयोगी और दोस्त रोहित खन्ना के साथ तकरीबन 11-12 लोगों की एक टीम लेकर हरियाणा के 5 अलग अलग शहरों में ग्राउंड इवेंट के ज़रिए लोगों का मूड जानने की ज़िम्मेदारी मिली थी... सिरसा... करनाल... रेवाड़ी होते हुए हम लोग हिसार पहुंचे...। शिवम से मैं हिसार में ढंग से पहली बार मिला...। इससे पहले फोन पर कुछ एक प्रोग्राम्स को लेकर बात होती रहती थी...कई एक बार लाईव चैट भी बुलेटिन्स के दौरान हुई... पर स्क्रीन की दुनिया से बाहर रियल लाईफ में आमने सामने मुलाकात का ये पहला मौका था...। पहली मुलाकात में ही जिस बात ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वो थी शिवम की सरलता.. उस पहली मुलाकात में सहकर्मी से दोस्त बन गया था शिवम.... एक बात का यकीन तो हमेशा से था कि शिवम ऐसा शख्स है जो किसी भी वक्त किसी काम को मना नहीं करेगा... पत्रकारिता में  फील्ड में काम करने वाले लोगों के लिए वैसे तो वक्त की कोई सीमा नहीं होती... पर इस असीमितता को भी शिवम ने बौना साबित कर दिया था... आप किसी भी वक्त कॉल करके कह रहे हैं... शिवम यार ये काम करना है... देख ले... हो जाएगा... हमेशा यही जवाब मिला... कोई शिकवा नहीं... एक्सक्यूज़ नहीं... यही वजह थी कि शिवम लगातार तेज़ी से आगे बढता नज़र आ रहा था... बरवाला में रामपाल का मामला भड़का तो कुलवीर और रोहित के साथ शिवम भी मोर्चे पर डटा... हमारी कई दिन की मेहनत पर आखिरी स्टैंप.. ब्रेकिंग के ज़रिए शिवम ने लगाई... रामपाल गिरफ्तार हो गया... बाद में देर रात ई मेल भी किया... फाइनल इनपुट... बाइ शिवम... और ये फाइनल इनपुट ही बन गया... मुझे अब भी याद है.. रामपाल मामले में लगातार डिस्कशन और बुलेटिन्स के बाद मैं देर रात ही घर आया था...सुबह उठा तो आदतन सबसे पहले फोन चैक किया... RIP... RIP... कई मैसेज थे... व्हाट्सएप  चैक किया तो यकीन नहीं हुआ... Shivam sannu chhadd gaya.... नवल सर का मैसेज था... कब कहां कैसे... कितने सारे सवाल थे... एक रात का फासला क्या इतना बड़ा हो सकता है कि एक दोस्त हमेशा के लिए जुदा हो जाए... समझ नहीं आ रहा था कि कैसे... नवल सर को फोन किया... सर की आवाज़ भर्राई हुई थी... सिर्फ इतना ही समझ आया कि कैथल के पास एक्सीडेंट हुआ... कैथल के पास... मेरे शहर के पास... ऐसे कैसे... बहुत से सवाल थे जो ज़हन में थे... कैथल में पत्रकार दोस्त जोगिंदर कुंडू से बात हुई.... वो सिविल अस्पताल में थे... घर पर फोन मिलाया... बड़े भाई से बात हुई... उन्हें वही सब बताया जो मुझे पता था... शिवम के साथ जुड़ी तमाम बाते ज़हन में घूम रही थी... आज भी वैसे ही याद हैं... अपने तकरीबन 9 साल के करियर में बहुत सी हस्तियों का अंतिम संस्कार हमने अपने दर्शकों को दिखाया... पर शिवम... मुझे बार बार कमांड मिल रही थी कि मैं कुछ बोलूं... कुछ कहूं.... पर अंदर बहुत कुछ टूट चुका था... उस दिन मैने एक ही दुआ ऑन स्क्रीन की थी.. कि इस तरह से किसी ओर को कभी भी दुबारा किसी अपने की मौत पर कुछ कहना ना पड़े... मेरे पास शब्द नहीं थे... सिर्फ भावनाएं थी... शिवम के साथ जुड़ी यादें थी.... उसकी मुस्कुराहट थी... हादसे के कुछ दिन बाद घर जाना हुआ तो एक ही बात ज़हन में थी... एक बार शिवम के घर जाना है... बड़े भईया और मैं हम दोनों गए... वहां जाकर मुझे पहली बार ये पता लगा कि शिवम इंजीनियरिंग स्टूडेंट था... एक बेहतरीन कलाकार था... अपने आस पड़ोस में सबका चहेता था... चंडीगढ़ में शिवम के घर से मैं और भईया वापिस आ गए... एक साल बीत गया है... पर उस घर और शिवम के चाहने वाले तमाम लोगों के ज़हन में उसके जाने से पैदा हुई खला अभी भी जस की तस है.. शायद कभी कम भी ना होगी... उसकी यादें... बातें... अंदाज़... हमेशा साथ रहेंगे... वो जहां भी है... मुस्कुराता रहे... RIP शिवम !      

Monday, November 16, 2015

दोस्त पेरिस ! टेंशन मत लो...

दुनिया भर में पेरिस में हुए आतंकी हमले में मृत लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रही है... आतंकी संगठन आईएसआईएस के खिलाफ कई मुल्कों ने एक साथ मिलकर आतंक को जवाब देने की बात कही है... पेरिस में राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद आने वाले 3 महीनों के लिए आपात काल की घोषणा कर सकते हैं... इन तमाम खबरों के बीच पाकिस्तान में मीडिया में एक अलग विषय पर भी बहस जारी है... तहरीक ए तालिबान के नेता इमरान खान की दूसरी शादी के 8 महीने बाद तलाक की वजूहात क्या रही... दरअसल इमरान की दूसरी बीवी रहम खान ने कुछ एक बातचीत के दौरान इमरान खान के रवैये को लेकर बयान दिए... जिससे सारा मामला गरमा गया...  खैर दुनिया में तो काफी कुछ हो रहा है... पर आज कुछ और बात करते हैं... आपको पता है हम हिन्दुस्तानी दुनिया से आगे कैसे निकल जाते हैं... एक जुमले के सहारे... नहीं नहीं यहां मैं चुनावी या राजनीतिक जुमलों की नहीं बल्कि ऐसे जुमलों की बात कर रहा हूं जो कितनी भी मुश्किलों में होने के बावजूद भी आपके लिए उम्मीद की किरण बन जाते हैं... मसलन... टेंशन मत ले यार ! ये एक ऐसा तकिया कलाम बना है... जिसे जब जहां चाहे जो चाहे इस्तेमाल कर सकता है और आपको एक संबल मिल जाता  है....। फिर बात चाहे घर का बजट गड़बड़ाने पर मियां बीवी की बातचीत की हो... या स्कूल या कॉलेज एग्ज़ाम में कम नंबर आने पर मां बाप के गुस्से के सामने पेश होने वाले बच्चों की...  ऑफिस में गुस्से में बैठे बॉस का सामना करना हो या ज़रूरी काम से जा रहे दोस्त की आपकी गलती से मिस हुई ट्रेन पर उसे समझाना हो... हर जगह बस एक ही बात आपको ज़्यादा तो नहीं पर कुछ एक हद तक कूल कर ही देती है... टेंशन मत ले यार ! हालांकि ये देखने वाली बात है कि जो शख्स आपको इस लाईन के ज़रिए समझाने की कोशिश कर रहा है... वो खुद कितना सक्षम है.... जैसे मान लीजिए घर में बीवी से किसी बात को लेकर तकरार हो गई... और आपका बच्चा आपके पास आकर कहे... ओह पापा... टेंशन मत लो... सोचिए, वो बेचारा तो खुद मां के हाथों दिन में कितनी बार पिटा होगा... पता नहीं...पर हां आपको कुछ देर के लिए एहसास करवा देगा... कि आपकी टेंशन खत्म... किसी गुस्से वाले अधिकारी के सामने जाने से पहले अगर आपका मातहत ही आपको कहे... सर जी टैंशन मत लो... कोई बात नहीं... या ज़िंदगी में हम खुद भी कितनी बार इस बात को कहते रहे हैं... कितनी ही बार पेपर्स में नंबर कम आए तो... शुरु में तो बेशक खूब डांट खाई पर बाद में मम्मी-पापा को यही कहा... अरे कोई बात नहीं.... टेंशन मत लो... (वो अलग बात है कि साल दर साल ना तो हमारा प्रदर्शन मां बाप की उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरा, और ना ही उन्होंने टेंशन लेना बंद किया)... पर जुमला यही है... टेंशन मत लो... इस जुमले में आखिर ऐसा है क्या कि पहाड़ सी मुसीबत भी कभी कभी तो राई का दाना लगने लगती है... कभी सोचा आपने... एक मशहूर लेखिका हैं रॉन्डा बायरन... उन्होंने मानवीय स्वभाव और उसके प्रभाव पर एक बहुत अच्छी किताब लिखी Secret... इस किताब में रॉन्डा लिखती हैं कि हम में से हर कोई एक दोहरे ट्रांसमीटर की तरह काम करता है... यानि तरंगे पकड़ता भी है और छोड़ता भी है... ये तरंगे... हमारे विचार हैं... यानि जैसा आप सोचेंगे वैसा ही आप बाहर के वातावरण में छोड़ेंगे... पर आगे वो लिखती हैं कि जैसा आप वातावरण में छोड़ेंगे वही घूम कर आपके पास आएगा.... जैसे अगर आप सकारात्मक और नकारात्मक दोनों सोच के लोगों से अगर मिले हों तो आपको पहली ही मुलाकात में इस बात का एहसास हो जाएगा... कुछ लोगों के पास बैठने से ही आपको कोफ़्त होने लगती है... जबकि कुछ लोगों की कम्पनी आपको बेहद पसंद आती है... ये उन लोगों की तरंगों का असर है... और साथ ही अगर मैं ये कहूं कि आपकी तरंगों का असर भी ऐसा ही होता है... तो गलत नहीं है... धार्मिक स्थलों पर शांति और जेल में या ऐसी ही दूसरी अपराध वाली जगहों पर अशांति होने की वजह वहां की ये तरंगे ही होती हैं... हमारी सोच हमारे आस पास का माहौल बनाती है... हमारी सोच हमारा व्यक्तित्व बनाती है... जैसा सोचते जाएंगे... वैसे आप बनते जाएंगे... और उसी तरीके से आपको समाज में स्वीकारा जाएगा... ये बात आज इसीलिए क्योंकि दुनिया भर में जिस आतंक से लड़ने की बात की जा रही है... उसके खिलाफ जंग भी एक विचार से ही शुरु होगी... एक ऐसा विचार जो मानवता के हित में होगा.. जो पूरी दुनिया के लिए होगा... जो इंसानियत से प्यार करने वाले हर शख्स के लिए होगा... और ऐसा विचार सिर्फ सरकारों के प्रतिनिधि या ऐसे ही कुछ गिने चुने लोग बना लें और काम हो जाए... ऐसा मुमकिन नहीं है... दुनिया का हर वो शख्स जो इंसानियत से मोहब्बत करता है उसे सोचना होगा आतंक के खिलाफ... वो तरंगे जो आपकी सोच से पैदा होंगी वो रास्ता तैयार करेंगी आतंक से जीत का... करगिल का युद्ध आप में से ज़्यादातर को याद होगा... हमारे सैनिक तराई में थे... दुश्मन ऊंची चोटियों पर... लड़ाई हुई तो पूरा देश एक हो गया... देश में देशभक्ति की भावना का ज्वार था... हर जगह सैनिकों के साथ आम नागरिक खड़े हो रहे थे... सभी ने एक ही सोच रखी... दुश्मन को धूल चटाओ... और नतीजा... हमारे वीर योद्धाओं ने जीत हासिल की... सोच... दुनिया में बदलाव ला सकती है... और इसीलिए आज ज़रूरत है कि हम इसी सोच के साथ पेरिस में दुख में डूबे अपने दोस्तों को कहें... टेंशन मत लो... हम हैं.. तुम्हारे साथ..। आइए आतंक की सोच और उसकी तस्वीर को खत्म करें।            

गगन दीप चौहान
@kanwargagan

Saturday, November 14, 2015

Selfie का आइडिया Click करता है...

शुक्रवार की देर रात.... हरियाणा के जींद के गांव बीबीपुर से तकरीबन साढे 12-13 हज़ार किलोमीटर दूर वेम्बले स्टेडियम में बड़ी तादाद में दर्शक मौजूद थे... ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून अंग्रेज़ियत के स्टाईल में 'अच्चे दिन ज़रूर आयगा' कहकर अपना भाषण खत्म कर चुके थे। भारतीय पीएम मोदी का भाषण अपने चरम पर था... एक घंटे के भाषण के बाद यकायक पीएम ने ज़िक्र हरियाणा का किया... एक छोटे से गांव का सरपंच... बेटी के साथ सेल्फी लेने की शुरुआत की... सेल्फी विद डॉटर से...। ये शख्स है गांव बीबीपुर के सरपंच सुनील जागलान...। सुनील से मुझे तब मिलने का मौका मिला था जब हरियाणा में चुनाव का दौर था... और मौजूदा कैबिनेट मंत्री ओ पी धनखड़ के उस वक्त के बिहार से बहु लाने के बयान पर चर्चा हो रही थी। सुनील उसी चर्चा में शामिल होने के लिए नोएडा स्टूडियो आए... चर्चा को नाम दिया गया था मोलकी... ये शब्द हरियाणा के ज़्यादातर हिस्सों में खरीदी हुई बहुओं के लिए इस्तेमाल होता है... चर्चा खत्म हो गई... सुनील से उसके बाद कुछ देर कुछ एक चीज़ों पर बात हुई...। मोलकी की समस्या पर जो चर्चा शुरु हुई थी... उसके पीछे एक बड़ी वजह हरियाणा में गिरता लिंगानुपात था...। जुलाई 2014 में इस चर्चा से एक बात तय हो गई थी कि अब कुछ करना होगा...। इसी सोच के साथ सुनील जागलान ने जो कदम उठाया वो अपने आप में पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया। सेल्फी विद डॉटर उस गांव से शुरु हुआ जहां कितनी ही महिलाएं इससे पहले सेल्फी के बारे में शायद ही जानती हों... पर सुनील जागलान जैसे युवा नेतृत्व की ये काबिलियत है कि एक गांव लगातार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना रहा है... मैं उस दिन के बाद सुनील से मिला नहीं हूं... पर हां लगातार इस गांव से जुड़ी तमाम खबरें हम तक आती रही हैं... सेल्फी विद डॉटर तो एक अलग तरह का एक्सपेरिमेंट है... एक ऐसा आइडिया जो क्लिक करता है... मार्केटिंग के दौर में जो क्लिक करता है वो चलता नहीं बल्कि दौड़ता है... पर सिर्फ यहीं तक नहीं है...सुनील ने एक्सपेरिमेंट की एक सीरीज़ शुरु की है... गांव की गलियों और सड़कों का नाम बेटियों के नाम पर रखा गया है... घरों के बाहर नेमप्लेट पर बेटियों का नाम लिखा गया है.... यानि कुल मिलाकर अगर कहूं तो जैसा ताजा तस्वीरों में नज़र आया बीबीपुर वाकई एक आदर्श के तौर पर सामने आ रहा है...। पर सवाल अलग है... अकेला बीबीपुर ही क्यूं... बाकी के गांवों का क्या होगा... 6800 से ज़्यादा गांव हरियाणा में हैं... क्या सारे गांवों में लिंगानुपात को लेकर हालात सही हैं... गांवों में ही क्यों शहरों में भी क्या हालात सुधर गए हैं... रिपोर्ट्स बताती हैं कि ज़्यादा मुश्किल शहरों में है क्योंकि पढाई के साथ साथ ऐसे कई रास्ते पता लग चुके हैं जिनसे पढे लिखे परिवार जब तक नवजात बच्ची का मुंह ना देखना चाहें उसे कोख में मारते रहें....। कानून का काम जो है वो करता रहेगा... एनडीपीएस एक्ट लागू हो चुका है... गिरफ्तारियां हुई हैं... दोषी डॉक्टरों के करियर पर तलवार लटकी हैं... प्रचार प्रसार के ज़रिए.. इश्तिहार के ज़रिए जागरुक किए जाने के तमाम साधन अपनाए जा रहे हैं... यहां तक कि पूरे देश के लिए बेटी बचाओ बेटी पढाओ योजना की शुरुआत पीएम हरियाणा से करते हैं.... पर इस सबसे क्या... अगर हम अपनी सोच ही नहीं बदल पाए... सोच और विचार के दो स्तर होते हैं.... एक आधुनिक है नई पीढी... और एक पुरातन है... हमारे बुज़ुर्ग... किसी समाज के विकास की जब बात आती है तो सिर्फ एक के आगे बढने से कुछ नहीं होगा... वक्त गवाह है कि दरख्त वो ही मज़बूत रहता है जिसकी जड़ें गहराई पकड़ती हैं.... सुनील अपनी उम्र के बाकी युवाओं के लिए एक बेहतरीन उदाहरण हैं... मुझे याद है जब मैं कैथल मे कॉलेज की पढाई कर रहा था... दर्शन सिंह उस वक्त में सर्व सम्मति से गांव मालखेड़ी के सरपंच बने थे... उस वक्त में सोशल नेटवर्किंग साईट्स और स्मार्ट फोन का इतना ज़्यादा प्रचलन नहीं था... पर हां मुझे अच्छे से याद है कि एक युवा सरपंच और सार्थक दिशा में लिए गए फैसलों की वजह से दर्शन सिंह उस वक्त भी सुर्खियों में रहते थे...। खैर बेटियों को असुरक्षित मानने वाले लोगों के अपने तर्क हैं... पहला तो लगातार बढते अपराध... पहला नहीं बल्कि मैं अगर ये कहूं कि अकेला ये एक ऐसा फैक्ट है जिसने दुनिया भर के तमाम मां बाप को बेटियों की सुरक्षा को लेकर आशंकित कर दिया है तो गलत नहीं है... मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं और मेरी बहुत सी सहकर्मी युवा हैं... देश के अलग अलग राज्यों से हैं... पर सब के लिए एक चीज़ कॉमन है... अगर ड्यूटी का वक्त थोड़ा सा आगे पीछे है तो ज़्यादातर अपने घर पर एक बार फोन करके अपने सही सलामत होने की खबर ज़रूर देती हैं... यानि देश की राजधानी के साथ लगते क्षेत्र में अपने दम पर रह रही बेटियों को लेकर भी मां बाप की फिक्र अभी खत्म नहीं हुई... ये एक जुड़ाव भी है जो हम शुरु से ही महसूस करते हैं अपने परिवार और घर के साथ... पर सिर्फ इतना नहीं रोज़ाना अखबारों में छपती तमाम तरह के अपराधों की घटनाओं ने मुश्किल को और बढा दिया है...। ऐसे में मां बाप के डर की आशंका जायज़ है...। पर ज़रा रुकिए और फिर सोचिए... क्या हमारी बेटियां सिर्फ इसीलिए दुनिया में नहीं आएंगी क्योंकि हमारे ज़हन में उपजा डर उन्हें आने नहीं देना चाहता... कमज़ोर हमारी बेटियां हैं या हम हैं.. जो इस बात के लिए उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाए कि बिटिया तुम अपनी रक्षा करने में सक्षम हो... जो उन्हें सेल्फ डिफेंस की परिभाषा नहीं समझा पाए... जो उन्हें नन्हीं परी और राजकुमारी तो बनाते रहे पर उस नन्हीं परी में दुर्गा की शक्ति का अवतरण नहीं करा पाए... और सिर्फ एक ही बात से उन्हें डराते रहे कि ये समाज क्या कहेगा... अगर तुम ऐसा करोगी... अगर तुम वैसा करोगी... खुद एक पुरुष होने के बावजूद मैं इस बात को अच्छे से स्वीकार करता हूं कि बेटियां हर मायनों में बेटों से बढकर होती हैं... मानसिक.. शारीरिक.. और आत्मिक स्तर पर भी मज़बूत होती हैं बेटियां...। एक बात याद आ गई... कॉलेज के दिनों में को-एजुकेशन होने के बावजूद हमारे कॉलेज में लड़के लड़कियों के साथ मिलने बैठने बात करने का माहौल नहीं था। सिर्फ वो लोग जो एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेते वो ज़रूर आपस में बातचीत कर लेते थे। मैं रंगमंच से जुड़ा हुआ था.. कॉलेज का पहले साल से ही थियेटर करने का मौका मिलता रहा और फाइनल इयर तक आते आते एक ऐसा थियेटर ग्रुप हमने कॉलेज में बना लिया था जिसमें लड़के भी थे लड़कियां भी... हम लोग साथ बैठते... बातें करते...। बात ये है कि एक सही सोच.. सही नज़रिया हमें बेटों में विकसित करना होगा... बेटियां सुरक्षित हैं... रक्षित हैं.. अगर बेटों की सोच हम सही कर पाए...। हमें अपने बेटों को ये सिखाने की ज़रूरत है कि लड़कियां भी तुम्हारी ही तरह इसी धरती पर आई हैं... उनसे वैसा ही व्यवहार करो जैसा एक सभ्य समाज में तुम खुद के लिए चाहते हो... हरियाणा में एक अजीब सी बात.. जो कई बार चुभती है... वो ये कि कुछ एक लड़के, लड़कियों को देखते ही ऐसा रिएक्ट करेंगे जैसे वो लड़के नहीं बल्कि जंगल से लाए गए चिम्पांजी हैं और वो लड़कियां नहीं बल्कि आसमान से उतरी परियों की कहानियों की नायिकाएं हैं... अजीब से चिल्लाएंगे.. चीखेंगे... और सच बताऊं तो इन चीखने चिल्लाने वालों में इतना दम नहीं होता कि कहीं भी अपना परिचय तक भी ढंग से दे दें... ये भी उसी खेत की पौध जैसे होते हैं जहां इनके दिमाग में सिर्फ एग्रीकल्चर भर दिया जाता है... एक पुरुष प्रधान समाज का वंशज होने के नाते...। ये तमाम संस्कार, लिहाज, तहज़ीब, सलीका परिवार से आता है। परिवार में अपनी ही बहन से ढंग से बात ना कर पाने वाला बाहर आकर दूसरों की बहन बेटियों से भी सही बर्ताव कर ही नहीं सकता। ये सच है... पर क्या ये सब ऐसे ही रहेगा... नज़रिया और सोच तो बदलनी होगी ना... हम लोगों की मुश्किल ये है कि हम जिस चीज़ के लिए अभी तैयार नहीं हो पाए थे वो तेज़ी से हुई है... वो है फ्लो ऑफ इन्फॉर्मेशन... जिस पर कोई स्कैनर नहीं है... सब कुछ एक तेज़ बहाव जैसा आ रहा है.... और हम सिर्फ उसमें बहे जा रहे हैं... हमारे युवा भी... जिन्हें स्कूल के बाद और कॉलेज की शुरुआती पढाई के बीच ये सब तो पता लग गया कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में लाईफ स्टाईल क्या है... पर वो अपने आप को ज़हनियत के तौर पर उतना मज़बूत नहीं कर पाए जहां से वो लड़कियों को लेकर अपनी सोच को एक सही दिशा में रख सकें... एक लड़की एक लड़के की सबसे अच्छी दोस्त होती है... ये बात 16 आने सच है सही है... पर दोस्ती के इस भाव को समझने की ज़रूरत सबको है... उन तमाम लड़कों को भी जो सिर्फ गर्लफ्रैंड शब्द के सीमित मायनों तक उलझे हुए हैं... और उन माता पिता को भी जिनके लिए लाडले और लाडली में कोई फर्क ना होते हुए भी बेटियां सेफ नहीं हैं... भावनाओं और विचारों का आदान प्रदान दोस्ती होता है... ये समझ विकसित करें और जो शुरुआत सुनील जागलान ने सेल्फी विद डॉटर के ज़रिए की है उसे अपने युवा साथियों से मैं उम्मीद करूंगा कि सेल्फी विद फ्रैंड के तौर पर सार्थक तरीके से आगे लेकर जाएं... अगर हम लड़के और लड़कियों की दोस्ती को सिर्फ दोनों के बिगड़ने का ही नाम दे रहे हैं तो इन्फॉर्मेशन का जो फ्लो, अनचाही सूचना का जो बहाव आ रहा है वो खतरनाक होगा.. समाज के लिए, संस्कृति के लिए, सभ्यता के लिए... सोच को विकसित करें... और विचारों का दायरा बढाएं.... बुज़ुर्गों से अपेक्षा है कि युवाओं को समझें... और युवाओं से अपेक्षा है कि उम्मीदों पर खरे उतरें...। एक बात याद रखें कि पूरा दिन कहीं भी रहकर शाम को घर आएं तो नज़र झुकानी ना पड़े...। मेरे डैडी ने एक अच्छी बात जो हमारे परिवार में हमें सिखाई वो ये कि जब बाप का जूता बेटे के पांव में आ जाए तो दोनों दोस्त हो जाते हैं... अपने डैडी से हमारी ये दोस्ती हमेशा कायम है... कुल मिलाकर ये कि बदलाव की शुरुआत हो सकती है शुचितापूर्ण आचरण और विचार के साथ... और इस शुरुआत का जुड़ाव दोनों चीज़ों से है युवाओं की ऊर्जा और बड़ी उम्र का तज़ुर्बा... आइए दोनों के बीच अलगाव ना हो और दोनों का मेल हो ऐसा प्रयास करें ताकि अतीत को सम्मान, वर्तमान को समाधान और भविष्य को दिशा निर्देश मिले... ऐसा होगा ज़रूर ये तय है...।               

गगन दीप चौहान

Wednesday, November 11, 2015

हरियाणा का 50वां वर्ष : सवाल संस्कृति का है!

बात अप्रैल 2008 की है... पंजाब के शाही शहर पटियाला से एक क्षेत्रीय चैनल में अपनी पारी खत्म करने के बाद मैने दिल्ली में उस वक्त के राष्ट्रीय चैनलों में से एक में एंट्री की थी। कार्यालय बाहरी दिल्ली में था तो इसीलिए रहने का इंतज़ाम भी वहीं आस पास करने की कोशिश हुई...। डीडीए फ्लैट्स में अपने लिए एक अदद रिहाइश की तलाश करते करते मुझे प्रॉपर्टी डीलर के ज़रिए एक फ्लैट में कमरा और रसोई का सेट मिला। पहली मुलाकात में फ्लैट की मालकिन आंटी का पहला सवाल था, "बेटा! कहां से हो?'' 'जी.. हरियाणा से' मैने जवाब दिया। 'जाट हो?' ये अगला सवाल था। पहली बार मुझे एहसास हुआ कि हरियाणा से बाहर हरियाणवी होने का एकमात्र मतलब बहुत से लोगों के लिए जाट होना हो सकता है। पर यहां मैं ये भी स्पष्ट कर दूं कि उन आंटी के सवाल में किसी जाति-पाति को लेकर संशय नहीं था। हां जाट होने से उनका आशय था हरेक हरियाणवी... जी हां... ये आपको अजीब लग सकता है पर ऐसे बहुत से लोग हैं जो हरियाणा को सिर्फ जाट प्रदेश मानते हैं.... और यहां जाट होने का मतलब जाति पाति नहीं बल्कि अक्खड़... अनपढ... और गंवार होना है... ऐसा होना है जो समाज और संस्कृति से दूर दूर तक वास्ता नहीं रखता.... ये सब कुछ ऐसा था जो दिल्ली के तथाकथित सभ्य समाज को स्वीकार्य नहीं था.../ आज भी नहीं है। इस घटना को 7 साल से ज़्यादा होने को आए... ना तो मैं अपने ज़हन से उन सवालों को मिटा पाया हूं और ना ही अब तक भी दिल्ली या बाकी शहरों के ज़्यादातर शहरों के लोगों को इस बात का अहसास हुआ है कि हरियाणा से आने वाला हर शख्स वो जाट नहीं होता, जैसा वो सोचते या समझते आएं है...। हरियाणा एक ऐसा राज्य है जहां हर जाति धर्म भाषा के लोग उसी तरह से रहते हैं जैसा बाकी के राज्यों में...। ये दीगर बात है कि लोक संस्कृति के मामले में बेहद संपन्न राज्य हरियाणा आज भी अपनी वो 
पहचान कायम नहीं कर पाया जो उसे लेकर लोगों के ज़हन में एक नज़रिया विकसित करती। और इसके पीछे सिर्फ एक वो लाईन बहुत बड़ी भूमिका निभाती है जिसे हरियाणा के संदर्भ में अक्सर ही कह दिया जाता है कि यहां कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर है... और आप शायद सहमत हो या ना हों... इस सब में हमारे उन तमाम राजनेताओं का बढ़ चढ़ कर योगदान रहा जिन्होंने ना तो प्रदेश के कलाकारों को उस स्तर तक प्रोत्साहित करने की कोशिश की, कि वो देश के सामने एक आईकॉन बनते, और ना ही इस बात की तरफ़ कभी ध्यान दिया गया कि प्रदेश की लोक संस्कृति दुनिया में एक बेहतरीन पहचान कायम करने का आधार बन सकती है। लोक कला और कलाकारों का इस्तेमाल सिर्फ एक काम के लिए हुआ... राजनीतिक रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए.... बेशक अब से पहले की सरकारों ने कई अकादमी औऱ कई संस्थान ऐसे खोले जिनके नाम में कला, संस्कृति या साहित्य जैसे शब्द दिखाई देते थे। पर हकीकत क्या है... आज भी हरियाणा में आम जन मानस के ज़हन में कलाकारों के लिए एक ही परिभाषा है... गाने-बजाने वाले...। जब हमारे अपने लोग, अपनी मिट्टी के नायक को सम्मान नहीं दे पाए तो फिर बाहर के राज्यों में हम सम्मान की तवक्को भी कैसे करें..। जब अप्रैल 2008 में ये दिल्ली का वाकया हुआ... उसके कुछ दिन बाद प्रवीन और सुषमा (दोनों मेरे मित्र और टीम रत्नावली के सशक्त वॉलिन्टियर्स) दिल्ली आए... हम तीनों काफी देर तक इस बारे में विचार करते रहे कि कैसे ये पहचान बदली जाए। ये जो अजीब सा लबादा है इसे उतार कर कैसे दुनिया को ये बताएं कि देखिए बाकी चाहे जो भी हो... पर आप ये भी याद रखें कि बॉलीवुड के कई बड़े नाम मरहूम सुनील दत्त साहब, सतीश कौशिक, यशपाल शर्मा, मल्लिका शेरावत, शास्त्रीय संगीत की दुनिया से पंडित जसराज भी हरियाणा से ही हैं...। ये सब सिर्फ एक संकीर्ण क्षेत्रवाद की सोच नहीं थी... बल्कि हमें कहीं ना कहीं इस बात को लेकर मलाल था कि हमारी पहचान सिर्फ एक परसेप्शन पर आधारित हो गई है...। हम तीनों ने एक साथ ये सोचा कि अब अपना योगदान उस दिशा में देना है जिससे हरियाणा को संस्कृति के क्षेत्र में ग्लोबल हरियाणा के तौर पर पहचान मिले...। उस वक्त में जो हमने सोचा वो बात अनूप लाठर सर के साथ भी हुई.. जिन्होंने हमेशा एक विश्वास किया कि उनके बच्चे कुछ अच्छा करेंगे बढिया करेंगे...। हमने सर के आशीर्वाद से जो एक सार्थक कोशिश अंजाम दी वो थी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा समारोह और राज्य स्तरीय हरियाणा दिवस समारोह में छात्र छात्राओं को इवेंट मैनेजमेंट में अधिकतम एक्सपोज़र। क्योंकि जब जब ऐसे आयोजन होते हैं तो आप अंदाज़ा नहीं लगा पाते कि मंच के सामने बैठे दर्शकों में कौन कौन शामिल है... बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो यायावर प्रवृत्ति का होने की वजह से घूमते हैं और देखने और समझने की कोशिश करते हैं कि हरियाणा की युवा पीढी क्या कर और सोच रही है.... ऐसे में इन सांस्कृतिक आयोजनों में मंच संचालन में अगर द्विअर्थी संवाद/ चुटकुले/ फूहड़ शब्दावली परोसी जाएगी तो सामने बैठा मेहमान दर्शक तो कहेगा ही कि कल्चर नहीं एग्रीकल्चर है। इस बात को अच्छे से उन तमाम युवा दोस्तों ने समझा जो रत्नावली परिवार में हमारे साथ जुड़े। मंच से शालीनता परोसी गई तो आनंद लेने वाला दर्शक अपने आप से शालीन हो गया... अच्छे कहे गए शेर-ओ- शायरी पर तालियां बजी, सीटियां या हो हल्ला नहीं...। ये उत्साह मिला तो सिलसिला चल निकला... पहले प्रवीण और फिर राहुल ने इस ज़िम्मेदारी को बेहतरी से निभाया... बाकी तमाम प्यारे प्यारे दोस्तों का नाम लिखना चाहता हूं पर मैं जानता हूं वो खुद ब खुद समझ जाएंगे... हर कोई जिसने मेहनत की ऑन स्टेज या ऑफ स्टेज... वो किसी से छुपा नहीं है...। इन आयोजनों से एक लगाव इसलिए था कि मैं खुद भी अपने कॉलेज के दिनों में अलग अलग विधाओं में प्रतिभागिता करता रहा था। हम जब कॉलेज में इन आयोजनों के लिए तैयारी करते तो सब भूल जाते पढना लिखना, घर-बार, वक्त बेवक्त, बस एक ही राग... तैयारी.... चाहे थियेटर की विधा हो, गायन हो या फिर नृत्य... हर विधा में जुटे कलाकार एक अदद बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए जान लगा देते... मैं मानता हूं कि हरियाणा के तमाम कॉलेजों में ऐसे ही तैयारियां होती हैं... और फिर सब होने पर यूथ फेस्टिवल या हरियाणा दिवस पर जब ऑवर ऑल ट्रॉफी पर कब्ज़ा होता तो पिछले तमाम दिनों की थकावट दूर हो जाती...। ये सारी बातें यहां इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि ये सब कभी समझा नहीं गया... सरकारों की तरफ से तो कभी भी नहीं...। नतीजा ये है कि अपने अपने कॉलेज के दिनों में अपनी अपनी कला के क्षेत्र में महारथी रहे नाम अब तक सिर्फ एक ही हालत में हैं... या तो वो हर साल इंतज़ार करते हैं कि उन्हें कोई कॉलेज या स्कूल अपने फंक्शन में छात्र छात्राओं को तैयारी करवाने के लिए बुला ले... या कुछ एक को अगर कॉलेज या स्कूलों में नौकरी भी दी गई तो कुछ ऐसे जैसे कोई बहुत बड़ा ऐहसान किया जा रहा हो... बेहतरीन कलाकारों को 5 हज़ार रुपए प्रतिमाह की नौकरी का ऑफर कॉलेज/स्कूल वाले बड़े एहसान से देते हैं। जबकि अपने वक्त में इन्हीं कॉलेज और स्कूलों को ओवर ऑल चैम्पियन बनाने के लिए तमाम कलाकार अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं... आप बहुत कम ऐसे लोगों से मिलेंगे जो कला के इन आयोजनों में भी बेहतरीन रहे हों और पढाई में भी... उसकी एक वजह ये है कि लगातार आयोजनों में हिस्सा लेने वाले ये कलाकार आम छात्रों के मुकाबले 4-5 महीने कम पढ पाते हैं...। हालांकि उस वक्त में अगर कोई पढने की बात कहे तो अजीब लगता है... क्योंकि उस वक्त एक जुनून होता है... जो बाकी सब बातों पर परदा डाल देता है.. उस वक्त में सबसे बड़ी कामयाबी होती है वो पुरुस्कार जो मुकाबलों में जीते जाते हैं... वो लम्हे जो कॉलेज या यूनिवर्सिटी के अधिकारियों के साथ जीत की पार्टी में चाय की एक प्याली के वक्त आप बिताते हैं...। एक और बात भी है... ये जितने भी कलाकार दोस्तों के बारे में मैं लिख रहा हूं.... वो तब के हैं जब चैनलों पर युवा टेलेंट के एक्सपोज़र नाम की चिड़िया ने हरियाणा की उड़ान नहीं भरी थी... और इसका नुक्सान ये है कि अच्छे से अच्छे कलाकार गुमनामियों में कहीं खो से गए... या कुछ ने दाल-रोटी चलाने के लिए कुछ और पेशा अपना लिया.... इनमें से कुछ एक ऐसा शायद ना करते अगर फिल्म थ्री इडियट्स उस वक्त आई होती... खैर.... ऐसा नहीं है और तस्वीर जुदा है... हरियाणा की मूलभूत परिस्थितियों को समझने के लिए ये सब जान लेना ज़रूरी है... शायद तभी आपको समझ आएगा कि हम कल्चर के नाम पर एग्रीकल्चर ही क्यूं रह गए...। हरियाणा में ये सिर्फ युवा कलाकारों की नियति नहीं बल्कि उन कलाकारों के साथ भी तकरीबन ऐसा ही है जो लोक कला के क्षेत्र से जुड़े हैं...। जींद के ताऊ गजे सिंह... 68 साल से ज़्यादा उम्र का ये कलाकार जो वाद्य यंत्र बजाता है उसे बांसळी कहते हैं...  खोखले बांस का एक छोटा सा टुकड़ा... इस यंत्र को बजाने वाले गजे सिंह अपनी इस विधा के अकेले परफेक्ट नायक हैं... पर अंतत: अगर कोई ये पूछे कि कितने लोग गजे सिंह से परिचित हैं तो जवाब है हरियाणा से बाहर बहुत कम.... विदेशों की तो बात ही छोड़िए... विदेश का मामला मैने इसलिए उठाया क्योंकि पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पत्रकारिता की पढाई करते वक्त मैं एक युवा कलाकार से मिला... उनका नाम है लवली... वाद्य यंत्र है अल्गोज़ा... जिसका प्रदर्शन वो देश के साथ साथ विदेश में भी कर चुके हैं....। मेरे ज़हन में सवाल है कि अगर लवली ऐसा कर सकते हैं तो गजे सिंह क्यूं नहीं...। ये कैनवास बहुत बड़ा है... जिसके बारे में अगर सोचेंगे तो परत दर परत बहुत कुछ खुलता चला जाएगा....। प्रकाश सर हरियाणा में हरियाणवी डान्स सिखाने वाले बेहतरीन कलाकारों में से एक हैं... पर बात अगर ये करें कि प्रकाश सर को क्या बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं ने अपनी टीम का हिस्सा बनाया तो जवाब है नहीं...। क्या हम अपने कलाकारों को यहीं खत्म करते जा रहे हैं... क्या हमारी लोक संस्कृति यूं ही धूल धूसरित हो जाएगी...। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के यूथ एंड कल्चरल अफेयर्स कार्यक्रम के निदेशक रहते अनूप लाठर सर ने जो कोशिशें की... उनके ज़रिए हरियाणा की अगली पीढी अपनी इस विरासत से रूबरू तो हुई... पर कब तक और किस हद तक... जो बातें मैने ऊपर लिखी... वो जब जीवन में घटती हैं तो फिर तमाम संस्कृति-प्रेम कहीं विलुप्त सा हो जाता है... और सारी कहानी दो जून की रोटी के जुगाड़ तक सिमट जाती है। एक पहाड़ी राज्य है उत्तराखंड... गढवाली और कुमाउंनी 
वहां बोली जाने वाली भाषाएं हैं... अब से कुछ वक्त पहले ये दोनों बोलियां थी... लोकसभा में सांसद रहते श्री सतपाल जी महाराज ने कोशिश की और दोनों बोलियां भाषाएं बन गई....। ये बात यहां इसलिए लिखी क्योंकि हरियाणा की बोली हरियाणवी को आज इस सम्मान की ज़रूरत है। सवाल पर इस बात को लेकर है कि ये 
कोशिश करेगा कौन। प्रदेश के कॉलेजों में हरियाणवी पढाई जा रही है... महाराजा हर्षवर्धन के काल में लिखे गए ग्रंथ में हरियाणव नाम की लिपी का ज़िक्र है... लोक नाट्य सांग की अनेकों अनेक रचनाएं और हर मौके के लिए गाए जाने वाले लोक गीतों का अगर संकलन कर लिया जाए तो तमाम ऐसे दस्तावेज़ तैयार हैं जो हरियाणवी को भाषा का दर्जा दिला सकते हैं। हरियाणा एक हरियाणवी एक का नारा मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दिया है। बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। और इसी से अगर हरियाणा की लोक संस्कृति के पुनरुत्थान को जोड़ दिया जाए तो शायद कहीं कोई गलती नहीं है। और ये वक्त की ज़रूरत है... ज़रा सोचिए हमारे हरियाणा का लोक नाट्य सांग... लेखन शैली और प्रस्तुतिकरण में अंग्रेज़ी के मशहूर लेखकों के लिखे नाटकों से किस मायने में कम है.... सांग में रागनी गायन और कहानी के मुताबिक अदाकारी का मेल होता है... तो अंग्रेज़ी के उस वक्त के लिखे नाटकों में भी यही शैली अपनाई गई है... मंच की अगर बात करें तो रंगमंच के मूल मंच जिसमें चारों ओर दर्शक बैठते हैं... उसकी अभिकल्पना सांग में आज भी है...। बॉलीवुड में हरियाणा का परिवेश नज़र आ रहा है... हरियाणवी में डायलॉग्स बुलवाने की कोशिशें की जा रही हैं... हरियाणवी करेक्टर्स को बड़े परदे पर उतारा जा रहा है। इस सबके बीच हरियाणवी एक भाषा के तौर पर अगर स्थापित हो जाए तो हमारी लोक संस्कृति के संरक्षण और पुनरुत्थान में ये कितना बड़ा कदम होगा इसका अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है। बोली-भाषा स्थापित होगी तो लोक कलाकारों को और बेहतर पहचान मिलेगी। हरियाणा की पहचान का एक नया पहलू स्थापित होगा। देश के साथ साथ विदेश में हमारे कलाकारों को मंच मिलेगा। और कलाकार सिर्फ एक अकेला शख्स नहीं होता... उसके साथ जुड़ा होता है उसका परिवार... उसका समुदाय... जो भी सरकार कलाकारों के हित में कोई बड़ा कदम उठाएगी... उसे इन सबकी दुआएं मिलेंगी...। बहुत सी योजनाओं के लिए सरकार अलग से बजट बना देती है। देश की राजधानी में अलग अलग राज्यों की अपनी अकादमियां हैं... पंजाबी, हिंदी, ऊर्दू की साहित्य अकादमी तो हैं ही, मैथिली और भोजपुरी से जुड़ी बड़ी संस्थाएं भी कार्यरत हैं... तो फिर दिल्ली के सबसे नज़दीकी राज्य हरियाणा की ऐसी पहचान क्यों नहीं...। जिस राज्य पंजाब से अलग होकर हरियाणा बना है, लोक संस्कृति के मामले में हरियाणा उसी पंजाब से किसी मामले में कम नहीं... पर पंजाब के कलाकारों और पंजाब की संस्कृति को जो मंच मिला वो हरियाणा को नहीं... क्या हम अपनी संस्कृति और इससे जुड़े लोगों को आम जनता के जीवन में सिर्फ गाने बजाने की संकुचित परिभाषा से निकालकर एक सम्मानजनक स्तर दे सकते हैं। क्या हम ऐसी कोशिश कर सकते हैं जो पूरे देश और दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाए... मौजूदा सरकार से बहुत सी अपेक्षाएं हैं... वो भी इसलिए क्योंकि इस सरकार ने हरियाणा एक हरियाणवी एक की बात कहकर एक सार्थक पहल की है... क्या ये अपेक्षाएं पूरी होंगी...। इंतज़ार हरियाणा के हज़ारों हज़ार युवा कलाकारों के साथ साथ संस्कृति के उन ध्वजवाहकों को भी है जिन्होंने खुद को समर्पित कर दिया इस मिट्टी की खुशबू को बचाए रखने के लिए।                       

Sunday, November 8, 2015

जो जीता, वो सिकंदर ! जो हारा, वो......

इससे पहले कि बिहार के चुनाव के संदर्भ में इस पंक्ति को दोहराएं आपसे निजी ज़िंदगी के कुछ पल साझा करना चाहता हूं... जिन पलों में इस लाईन की अहमियत हमने समझी थी... अपने कॉलेज के दिनों में कई भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का मौका मुझे मिला... और इन्हीं मुकाबलों के दौरान दूसरे कॉलेज के साथी मिले जिनमें से कई अच्छे दोस्त बन गए... एक फैक्टर हम सभी में कॉमन था कि हम सभी कहीं ना कहीं, किसी ना किसी तरीके से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग की साहित्यिक कार्यशालाओं में प्रतिभागी रह चुके थे... चाहे विनीत हो... सौरभ हो... या फिर मैं खुद...। बात मुकाबलों की आती तो आपस में ही एक दूसरे से गलाकाट प्रतियोगिता करते...। फिर जीत तो एक को ही मिलनी थी... जो जीत जाता वो दूसरों को दोस्ती में समझाता... अरे कोई बात नहीं मैं जीता या तू बात तो एक ही है... तब हम सब एक ही बात कहते... देख जो जीता वो सिकंदर... जो हारा वो बंदर.... यानि वक्त और आवाम सिर्फ जीते हुए शख्स के चेहरे ही याद रखता है... मुझे याद है कि गवर्नमेंट कॉलेज हिसार में 23 जनवरी को होने वाली भाषण प्रतियोगिता में विनीत फर्स्ट आया था और मैं सेकिंड... बाद में जब हम दोनों बात कर रहे थे तो मुकाबले की तैयारियों के ज़िक्र में विनीत ने बताया कि यार मैने तो अजय देवगन वाली भगत सिंह की फिल्म देखी थी और सुबह यहां आ कर उसी फिल्म को रि प्रोड्यूस कर दिया भाषण की तरह... मैं हैरान था कि मैं नाहक ही किताबों से पढकर तैयारी करता रहा... आइए अब बिहार चलते हैं... बिहार के चुनाव नतीजों ने छुट्टी के दिन बीजेपी और सहयोगियों को कार्यालय में जहां खामोशी से बैठ ये सोचने के लिए मजबूर किया है कि आखिर कमी कहां रह गई तो वहीं लालू-नितीश की जोड़ी से जुड़े लोग जश्न में मशगूल हैं... तमाम टीवी चैनलों पर आपने तस्वीरें देखी होंगी... नितीश लालू के मिलन की... इन तस्वीरों को एक मिनट के लिए अगर रोक लें और फिर गौर करें लालू और नितीश कुमार की बॉडी लैंग्वेज पर तो आपको एक फर्क नज़र आएगा... लालू जहां पूरी तरह उत्साह में लबरेज़ हैं वहीं नितीश खामोश और कुछ सोच में डूबे हुए... चुनाव प्रचार के बाद की थकावट नितीश के हावभाव की वजह हो सकती है पर राज्य के सीएम का ओहदा जिस शख्स को मिलने जा रहा हो उसे परेशानी क्या.... परेशानी है... परेशानी सहयोगी हैं... जिनके साथ आने वाले 5 साल तक बिहार पर राज करना है.. नितीश जिस सोच के साथ इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में उतरें और साथ ही अगर ये भी जोड़ लें कि मुलायम सिंह यादव महागठबंधन से जिस सोच को लेकर दूर हुए वो एक सी हैं... 2019 के लोकसभा चुनाव में तीसरे मोर्चे का पीएम कैंडिडेट... राजनीति की बिसात पर दूर की गोटी खेलने वाले नेताओं की कोशिश कुछ ऐसी ही थी कि देश के बड़े राज्य बिहार में जीत के ज़रिए पूरे देश में खुद को एक बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर लिया जाए.... ऐसा ना होता देख ही मुलायम सिंह महागठबंधन से दूर हुए... अब लालू और नितीश की जोड़ी की सरकार बनने जा रही है तो नितीश के माथे पर फिक्र की लकीर की वजह भी लालू ही हैं.... लालू यादव का अक्स और उन पर लगे भ्रष्टाचार के तमाम आरोप... जिनकी वजह से लालू इस बार विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ पाए... और लालू का विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल को तौर पर उभर कर सामने आए राजद का सुप्रीमो होने के नाते किंग मेकर होना नितीश को कहीं ना कहीं ये सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि 2019 के चुनाव में जिस मौजूदा प्रधानमंत्री का मुकाबला उन्हें करना है उसके लिए एक बेहद शानदार अक्स उन्हें कायम करना होगा.... जो बेदाग़ हो... जिस पर भ्रष्टाचार का कोई इल्ज़ाम ना हो... पर लालू के सहयोगी के तौर पर क्या वो ऐसा कर पाएंगे... ये सवाल कायम है... वहीं बीजेपी के लिए ये चुनाव नतीजे संभलने का मौका हैं.... विकास का नारा लेकर बिहार गई बीजेपी करोड़ों के पैकेज की घोषणा के बाद भी कहां चूकी... क्या बीजेपी के अंदर ऑल इज़ वैल है... क्या संघ की भूमिका को स्वीकारने या नकारने या उसे लेकर तटस्थ रहने में बीजेपी को कोई राह नज़र आती है.... कुछ मित्रों का मानना है कि संघ भी अंदरखाते नहीं चाहता था कि बीजेपी चुनाव जीते.... क्योंकि ये एक जीत अमित शाह के कद को संघ के मुकाबले काफी बड़ा कर देती और संघ की भूमिका कहीं ना कहीं कमतर हो जाती... इसीलिए चुनाव के शुरुआत के वक्त में ही संघ की तरफ से आरक्षण की मांग पर एक ऐसा बयान दिया गया जिसने आरक्षण व्यवस्था पर बहुत ज़्यादा निर्भर बिहार के लिए कई सवाल खड़े कर दिए.... रही सही कसर देश भर में बीजेपी नेताओं के बीफ और बाकी के मसलों पर दिए बयानों ने पूरी कर दी... सवाल इस बात को लेकर भी हैं कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की मैनेजमैंट आखिर फेल क्यूं हुई... क्या पार्टी के कार्यकर्ता और नेता बीजेपी अध्यक्ष को पूरी तरह स्वीकार पाए हैं.... एक बात ये भी है कि बीजेपी, बीजेपी होने से पहले संघ का राजनीतिक विंग है... क्या ये बात अब भी उतनी ही तर्कसंगत है.... एक और बड़ा सवाल ये भी है कि आखिर अब बिहार की तस्वीर क्या होगी... क्या ये सरकार भी यूपी में पहले की 6-6 महीने वाले मुख्यमंत्रियों की सरकार की तरह काम करेगी.... लोकतंत्र में ताकत वोट की होती है... बिहार के मतदाता ने जो जनादेश इस बार दिया है उसे देखकर सैद्धांतिक तौर पर उसकी अहमियत समझ नहीं आती पर हां ये ज़रूर है कि पूरा चुनाव बाहरी बनाम बिहारी तक सिमट गया... ज़्यादातर वोट एंटी बीजेपी या कहें एंटी मोदी गया... जिसकी वजह दाल भी रही... जिसने बीजेपी की दाल नहीं गलने दी... बीजेपी ऐसे हालात में अब क्या करेगी.... शत्रुघन सिन्हा ने नतीजों की शाम जो बयान दिया उसकी एक लाईन पूरे सिस्टम को बयान कर रही है कि ''कैप्टन को ताली भी मिलती है और गाली भी...'' क्या इन चुनावों का सटीक विश्लेषण कर बीजेपी अपने आप को सही रूप में एक बार फिर सामने ला पाएगी और बिहार की नई सरकार क्या 5 पूरे साल या 2 ढाई अधूरे साल के बाद एक बार फिर जनता की अदालत में जाएगी... देखना दिलचस्प होगा... बहरहाल आगे-आगे देखिए होता है क्या....

गगन दीप चौहान              

Saturday, November 7, 2015

मौजूदा पंजाब : संवाद और विवाद

1699 में श्री आनंदपुर साहिब की पवित्र धरती से खालसा के रूप में दुनिया के सामने आया सिख धर्म... अपने 300 साल से ज़्यादा वक्त के इतिहास में कई तरह के उतार चढाव से गुज़रा है... वहीं दूसरी तरफ दुनिया के राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा जिस व्यवस्था को अपनाया गया, वो है लोकतंत्र। अब इन दोनों बातों को एक साथ रख कर देखा जाए तो दुनिया का सबसे आधुनिक धर्म... सबसे सशक्त राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र को अपने अंदर लागू करता रहा है। छठे सिख गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के मीरी पीरी के सिद्धांत के ज़रिए राजनीति और धर्म में संतुलन बना रहे और राजनीतिक ताकतों का प्रभाव धर्म पर ना हो... इस कोशिश को अंजाम देने की प्रक्रिया सिख धर्म के अंदर वर्णित है...। इतिहास गवाह है कि जब जब सिख धर्म ने किसी भी तरह के मुश्किल दौर का सामना किया तो पंथ को मानने वाले तमाम लोगों ने एक साथ मिल बैठ कर विचार किया और इस विचार चर्चा को ही नाम दिया गया सरबत खालसा... सरबत यानि सबकी राय...। पंजाब में बीते कुछ वक्त में जिस तरीके से श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के तमाम मामले सामने आए हैं उसने सामाजिक समरसता को लेकर कई तरह की आशंकाएं शुरु कर दी हैं। जिस तरह का घटनाक्रम पंजाब के साथ साथ पूरी दुनिया में रहने वाले सिखों ने बीते दिनों देखा है उससे कई तरह के सवाल उनके ज़हन में खड़े हुए हैं। जिस तरीके से श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से पहले माफीनामा जारी हुआ और फिर उसे वापिस ले लिया गया उसने भी सिख समुदाय में कई संशय पैदा किए। ऐसे में पूरी दुनिया के सिखों की बात को सुनने की ज़िम्मेदारी निभाने का दावा सरबत खालसा के ज़रिए किया जा रहा है। वहीं राज्य सरकार को आशंका है कि पूरे देश में जिस तरीके से सामाजिक सदभाव को तोड़ने वाली घटनाएं हुई हैं ऐसे में सरबत खालसा के आयोजन की आड़ में पंजाब का माहौल बिगाड़ने की भी कोई छुपी हुई कोशिश ना हो... तर्क सरबत खालसा बुलाए जाने के अधिकार को लेकर भी दिए जा रहे हैं और सवाल पांच तख्तों के जत्थेदार साहिबान और पंज प्यारों से जुड़े प्रतिनिधियों को लेकर भी उठ रहे हैं... इन तमाम सवालों की तह तक जाने की कोशिश शनिवार को मुद्दे की बात में ज़ी मीडिया ने की... सवाल एक ही था सरबत खालसा पर विवाद क्यों ? शिरोमणि अकाली दल, यूनाइटेड अकाली दल, एसजीपीसी के प्रतिनिधि के तौर पर क्रमश: स. अमरीक सिंह, स. गुरनाम सिंह सिद्धू, स. निर्मल सिंह जौड़ा चर्चा में शामिल हुए तो बुद्धिजीवी और वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर स. अमरजीत सिंह ने अपनी राय रखी। कुल मिलाकर इन तमाम मेहमानों की बातचीत के आधार पर जो अब तक की कार्रवाई का निचोड़ मैं निकाल पाया उससे ये ही समझ आया कि मामला सिर्फ इतना नहीं है कि श्री गुरुग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की घटनाओं के बाद के हालात पर आपस में चर्चा के लिए ही सरबत खालसा बुलाया जा रहा हो... मामला एक बड़े स्तर पर समझने की ज़रूरत है। 2017 के विधानसभा चुनाव एकदम नज़दीक हैं क्योंकि अगर साल 2016 को आखिरी साल के तौर पर देखा जाए, जैसा कि साल 2017 में 9 मार्च तक ही मौजूदा सरकार का कार्यकाल आधिकारिक तौर रहेगा, इसीलिए अब 2015 की समाप्ति और फिर 2016 सरकार के कार्यकाल की तेज़ी का आखिरी साल है। ऐसे में जो कुछ पंजाब में मौजूदा वक्त में चल रहा है वह दु:खद है... सिख धर्म के आदि गुरु के रूप में पूजनीय श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं...। इन घटनाओं से हर कोई व्यथित है जैसा शनिवार की चर्चा में सभी ने ज़ाहिर भी किया... युनाइटेड अकाली दल के प्रतिनिधि ने भी और शिरोमणी अकाली दल के नेताओं ने भी और एसजीपीसी के प्रतिनिधि ने भी... तो फिर इस पर आपस में बैठकर विचार चर्चा क्यों नहीं... वो भी तब जब ये चर्चा सरबत खालसा के नाम पर हो रही है जिसमें सिख धर्म को मानने वाले सभी लोग शामिल हो सकते हैं...। एक पेंच तो ये है कि सभी दल इसमें शामिल नहीं है.... शिरोमणि अकाली दल के प्रतिनिधि का कहना था कि मर्यादा और परंपरा का पालन इस सरबत खालसा के आयोजन में नहीं किया गया और सिर्फ कुछ एक दल ही मीटिंग कर रहे हैं.... शिरोमणी अकाली दल के नेता का दावा था कि अगर एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त साहिब की मंज़ूरी और पांचों तख्त साहिबान के जत्थेदार की मौजूदगी में सरबत खालसा बुलाया जाता तो उन्हें कोई एतराज़ नहीं था... वहीं युनाईटेड अकाली दल का दावा था कि एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त साहिब तो बाकायदा उनकी मंज़ूरी के लिए चिट्ठी लिखी गई है... शिरोमणि अकाली दल का एक तर्क ये भी था कि क्योंकि तख्त साहिबान के जत्थेदार साहिबान की कार्यशैली को भी इस सरबत खालसा में मुद्दा बनाए जाने की बात है तो इस लिए भी वो इस आयोजन के पक्ष में नहीं है... आशंका ये ज़ाहिर की गई कि इस आयोजन की आड़ में कहीं पंजाब का माहौल ना खराब हो जाए... वहीं यूनाइटेड अकाली दल के प्रतिनिधि का कहना था कि क्योंकि पंजाब की मौजूदा सरकार लोगों के हित में फैसले लेने में नाकाम रही है और इसीलिए वो डर रही है इस आयोजन से... जिसमें जब तमाम मुद्दों पर चर्चा होगी तो सवाल ये भी उठेगा कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन के बावजूद गुरु की नाम लेवा संगत पर पुलिस ने सख्त कार्रवाई क्यों की ? सवाल उस हालात को लेकर भी उठाए गए जिसमें इतिहास में पंजाब के अंदर ही हुई कार्रवाई में राजनेताओं की खामोशी  संदेह के घेरे में थी... पर क्योंकि चर्चा का विषय इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान परिस्थिति है तो ये विषय दिग्भ्रमित करने वाला हो जाता... खैर, पूरे हालात में एसजीपीसी प्रतिनिधि से जैसे जवाब की आस समाज और सिख समुदाय को है, वैसा नज़र नहीं आया। एसजीपीसी आयोजन का विरोध इस तर्क के साथ तो करती रही कि श्री अकाल तख्त साहिब से मंज़ूरी नहीं ली गई, पर एक तटस्थ संस्था के तौर पर जबकि सिख समुदाय के सामने कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं... ऐसे में सिखों की प्रतिनिधि संस्था के तौर पर खुद एसजीपीसी ने सरबत खालसा बुलाकर एक ही मंच पर तमाम विचारकों को इकट्ठा होने का मौका क्यों नहीं दिया गया... ये वो सवाल था जिसका सीधा जवाब एसजीपीसी प्रतिनिधि निर्मल सिंह नहीं दे पाए... इसके पीछे एक वजह उनकी राजनीतिक मजबूरी यानि शिरोमणि अकाली दल के बाहुल्य वाली एसजीपीसी की एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी का सदस्य होना हो सकता है... पर मेरा निजी तौर पर मानना ये है कि जब आपको सिख धर्म की प्रतिनिधि संस्था का सदस्य सिख समुदाय ने चुन लिया तब आपको राजनीतिक विचारधारा नहीं बल्कि सिख धर्म की भलाई से जुड़े कदम उठाने में अहम भूमिका निभानी चाहिए... दुख की बात ये कि ऐसा नहीं है... अगर कहा जाता है कि बहुत कुछ गलत हो रहा है... तो जब तक आपस की बातचीत के ज़रिए कोई हल निकालने की ज़िम्मेदार और सजग कोशिश सिख धर्म की सर्वोच्च संस्था एसजीपीसी नहीं करेगी तब तक एक आम साधारण सिख को ये सवाल लगातार परेशान करता रहेगा कि वो क्या करे.... सिख होने के नाते पंथ के सरबत खालसा में शामिल हो और गुरमता बनाने में अपनी भूमिका निभाए ... या श्री अकाल तख्त साहिब के प्रति श्रद्धा पूर्वक सीस झुका कर अपनी आस्था को डांवाडोल होने से रोके... अमरजीत सिंह के शब्दों में कहूं तो.. "बीमारी तो सब जान रहे हैं... पर मुश्किल ये कि इलाज हर कोई अपने तरीके से करना चाहता है.... गोली हर कोई अपने पन्ने वाली देना चाहता है...."। धर्म संवाद की राह है, विवाद की नहीं... ये बात हर शख्स को आज समझनी होगी शायद तभी गुरु साहिबान के दिखाए रास्ते पर दृढता से चलने में समूची कौम कामयाब हो पाएगी... 

गगन दीप चौहान


(नोट : ये लेख पंजाब में मौजूदा हालात पर विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों से हुई बातचीत पर आधारित है। कृप्या किसी भी विचार को अन्यथा ना लिया जाए)

 
  

Friday, November 6, 2015

एक बार फिर से...

एक अजब सी दुनिया में हूं जिसका ओर छोर नहीं...

कहने को उगता है सूरज, पर होती कोई भोर नहीं.... 

धागा बांधे खींच रहा है, कोई अपनी ओर मुझे

रिश्ता है ये ना टूटेगा, पतंग की कच्ची डोर नहीं...

कोई कहेगा कोई सुनेगा, वक्त की सभी दलीलों को...

समझेगा पर वो ही जिसपर, किसी का कोई ज़ोर नहीं...

आज कहो फिर कैसे तुमने, कलम उठाई बात कही...

शब्दों की दुनिया का गगन, कभी थमता कोई दौर नहींगगन

मसान : ज़िंदगी का अंत, पर एक अच्छे सिनेमा की शुरुआत का भरोसा

मसान : पहली बार जब सुना कि इस टाइटल से फिल्म है... और कई फेस्टिवल्स में भी जा चुकी है... तो लगा कि मसान यानि शमशान के इलाके में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी का ताना बाना होगा... और फिल्म.... डॉक्यू़ड्रामा जैसी कुछ होगी.... हम कुछ चीज़े सोच लेते हैं ना.... बस वही सोच थी... देखकर काफी कुछ समझ में आया... लीक से हटकर एक ऐसी कहानी जिसे बेहद शानदार अंदाज़ में बुना गया है... आपने अब तक की फिल्मों में हीरो हीरोइन का मिलना दोनो का साथ जीना साथ मरना देखा होगा पर मसान अलग है.... शमशान घाट के कैनवास से उठा एक लड़का फिल्म में अपनी प्रेमिका के साथ पहली मुलाकात में ही एक अलग छाप छोड़ता है... "कोई लड़की 5 रुपए की नमकीन के लिए इतना हल्ला भी तो नहीं करती..."  डायलॉग्स में दम है... अदाकारी की बात करें तो संजय मिश्रा बाकी के कलाकारों से काफी आगे खड़े हैं.... हालांकि कहीं कोई कमतर नहीं है... पर संजय बेहतरीन हैं... एक और नज़रिया इस फिल्म को लेकर है... ये फिल्म एक अंगूठी का सफर लगती है... एक उच्च मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की को बचपन में ही जन्म दिन पर दी गई अंगूठी हाथ की उंगली में फंस जाती है.... वहीं अंगूठी क्लाइमेक्स में एक हीरो के हाथों हीरोइन के दाह संस्कार का बैकग्राउंड बनकर उभरती है... फिर वही अंगूठी उसी हीरो की ज़िंदगी से तमाम पुरानी यादों को पीछे छोड़ आगे बढने की कोशिश और फिर वही अंगूठी मुसीबत में फंसे एक पिता के लिए उम्मीद की किरण... काफी कुछ ऐसा है जो याद रहेगा... तू किसी रेल सी गुज़रती है.... ये मैने साल 2001 में हांसी में एक स्टूडेंट के तौर पर कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग की पहली साहित्यिक कार्यशाला अटेंड करते हुए सुनी थी.... फिल्म में गीत शुरु हुआ तो दिल को एक सुकून वाली खुशी मिली कि चलो बॉलीवुड में फिर से सार्थक गीतों का चलन शुरु होता नज़र आता है... फिल्म के बाकी गीत भी अच्छे हैं... छूने वाले हैं... फालतू नहीं हैं.... अच्छा सिनेमा देखना चाहते हैं तो मसान देखिए... कुछ कह देने की चाह या सोच या फिक्र को दिल में पाले रखना और फिर उसे कहकर एक राहत महसूस करना, इस बात का सिनेमाई चित्रण है मसान। परफेक्ट वन।    

Tuesday, November 3, 2015

राजनीति, सम्मान और तितली !


एक तरफ देश के राजनीतिक रूप से सक्रिय बड़े राज्यों में से एक बिहार में चुनाव की पूरी प्रक्रिया और दूसरी तरफ एक सिलसिला पढे लिखे अदीबों की सम्मान वापसी का। देश की आज़ादी के तकरीबन 70 साल होने को हैं.... इस दौर की ये दो तस्वीरें अलग हैं... जुदा हैं... पर दोनों में कितने ही सवाल हैं जो एक जैसे हैं.... बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरीके से भाषा के तमाम बंध और छंद राजनीति के राग पर दम तोड़ गए और अमर्यादा की तान पर जिस तरीके से देश के नीति नियन्ताओं ने हुंकार भरी उसने एक बड़े तबके के ज़हन में ये सवाल तो उठाया ही होगा कि क्या हमें अब भी ऐसी राजनीति की ज़रूरत है... या ऐसी राजनीति और कितने सालों तक की जाएगी... जहां किसी क्षेत्र विशेष के विकास पर खुली चर्चा की बजाए एक दूसरे की छीछालेदर के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.... अकेला बिहार ही क्यों... देश के ज़्यादातर राज्यों में राजनेताओं की भावभंगिमाओं का एक सा ही रूप दिखाई देता है... ये हैरान करने वाली बात है कि 67 साल से ज़्यादा लंबे दौर में ना तो राजनेताओं के तौर तरीके बदले और ना ही आम मतदाता के.... ऐसा लगता है मानों राजनीतिक मंच पर आने से पहले ये नेता एक दूसरे को व्हाट्सएप पर मैसेज देकर आ रहे हों कि आज देखना मैं तुम पर क्या जोक सुनाऊंगा और देखना फिर लोग कैसे पागल बनकर तालियां बजाऐंगे... और मेरे देश का बेचारा मतदाता... जो घर से दाल भात भी ढंग से खाकर नहीं आया होगा.... पर हां अपने मनभावन नेता की हर बात पर पूरा ज़ोर लगाकर नारे भी लगाएगा और तालियां भी पीटेगा... एक मंच पर जहां नेताओं की राजलीला है तो सामने खड़ी जनता भी कभी कभी.... कभी कभी नहीं... बल्कि अक्सर ही ठगी सी नज़र आती है.... नेताओं का स्तर क्या रह गया है... अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कितने ही राज्यों के बड़े बड़े नेताओं के भाषण तो आपको समझ ही नहीं आएंगे... कि जनाब आखिर कहना क्या चाहते हैं.... औऱ क्षेत्रीय दलों के बड़े चेहरे तो उस पृष्ठभूमि से आ रहे हैं जहां पढे लिखे होने के बावजूद भी वो सलीके से अपनी बात कहने की बजाए ठेठ गंवई अंदाज़ में सब कुछ उगल रहे हैं.... और इस सबके बीच एक और सीरीज़ है... सम्मान वापसी की... शुरु के कुछ एक मामलों को गंभीरता से ले लिया गया तो ये भी एक हैशटैग और ट्विटर ट्रैंडिंग बन गया.... किसी देश के कलमकार की मौत दुख का विषय है... पर उस मौत के मर्सिए अपने अंदाज़ में लिख कर खुद को सुर्खियों में लाने की कोशिश क्यों.... सम्मान वापसी करके मेरे देश के अदीब क्या कहना चाहते हैं... क्या ये कोई समझ पाया... नहीं... क्योंकि अब सिर्फ सम्मान वापसी और तीन चार ताज़ा घटनाओं के साथ सब सीमाएं बंध गई हैं.... क्या वाकई देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है... ये भी सवाल ज़रूरी है... फिर तो क्या सोशल नेटवर्किंग साईट्स और ब्लॉगिंग भी बंद हो जाएगी... क्या व्हाट्सएप पर बने ग्रुप भी खाली करा दिए जाएंगे... ये सवाल आपको बचकाने लग सकते हैं... पर दोस्तों अगर ऐसा नहीं है तो क्या ये सम्मान वापसी की होड़ शुरु करने की बजाए.... इन तमाम माध्यमों से आम लोगों तक अपनी बात मेरे देश के सम्मानित अदीब अपनी कलम के ज़रिए नहीं पहुंचा सकते थे.... या ये मान लिया जाए कि सम्मान वापसी क्योंकि सरल और सुप्रसिद्ध रास्ता नज़र आता है इसीलिए अपना लिया जाए भेड़चाल जैसा.... ऊपर से रही सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी है... 5-6 को बिठाओ, आपस में लड़वाओ, और फिर रेटिंग चेक कर लो.... चल जाए तो फिर से दोहरा दो.... राजलीला और अक्षर के क्षर होने के एकालाप के बीच हिंदी सिनेमा में तितली कुछ कहने की कोशिश में है... हर फैमिली फैमिली नहीं होती.... एक ऐसे परिवार की कहानी नज़र आती है जो है तो आम सा ही एक परिवार... पर ये परिवार देश सा लगता है.... प्रोमो देखे हैं फिल्म के... और पूरे देश की तस्वीर में अगर तितली को फिट कर दिया जाए तो ऐसा लगता है मानों देश में राजनीतिक गठबंधन के दौर की अंदरूनी तस्वीर को एक परिवार के ज़रिए किरदारों ने जीवंत कर दिया हो... जहां सब साथ साथ चल भी रहे हैं और मौका मिलते ही एक दूसरे को गिराने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते.... खास बात ये कि तितली में कई चेहरे आपको नए से लगेंगे... मन है जल्दी देखूं... और फिर आप से साझा करूं क्या देखा.... तब तक आप भारत दक्षिण अफ्रीका के बीच टैस्ट और बिहार के राजनीतिक क्रिकेट कप के विजेता का इंतज़ार कीजिए...

Tuesday, August 11, 2015

तो क्या

...

क़तरे से समंदर जो ना हो सके तो क्या
खुद के साथ खुदा को ना भिगो सके तो क्या
कुछ दूर तक तो साथ रहे, गुफ्तगू हुई..
कंधे पे सर रख कर जो ना रो सके तो क्या...
दुश्मनी तो उससे दोस्ती से बढकर थी...
बेवफाई में मशहूर ना हो सके तो क्या

गगन

वो

जाग कर भी ना जाने क्यूं वो सोया हुआ सा है..
सब कुछ हासिल है पर वो कुछ खोया हुआ सा है...
मुझसे बात करे तो तब, जब लफ्ज़ उसका साथ दें...
दूर होकर उसने भी आंखों को भिगोया हुआ सा है....
सच कहने की हिम्मत वो कभी कर ही नहीं सका...
झूठ उस शख्स की नस नस में पिरोया हुआ सा है...
मुझे धोखा दे कर, कैसे वो भरोसे की तवक्को करे है...
दूसरों के लिए गड्ढे खोदने वाला खुद उसमें गिरे है...


"गगन"

Monday, February 2, 2015

विद्या पढाई की कसम....


बिस्तर झाड़ते हुए अचानक ही बिटिया की प्ले स्कूल की नोटबुक पलंग से नीचे गिर गई। अपने नन्हे से हाथों में बड़ी सी नोटबुक को उठाकर छोटी सी मैम ने आदेश दिया जल्दी से मत्था टेको, सॉरी बोलो, नहीं तो आपको विद्या पढाई नहीं आएगी.... उसकी बात सुनकर हंसी भी आई.. और बचपन के वो दिन भी याद आए जब पार्क में अलग से हरे पौधे की पत्तियों को विद्या पढाई का स्रोत मानकर किताबों में कापियों में रखा करते थे। मुझे नहीं पता कि आप में से कितनों ने उस हरे पौधे को देखा होगा। पर अब जब पढाई के रस्मो रिवाज़ से नाता टूटे एक लंबा वक्त हो गया है तकरीबन 8 साल हो गए हैं.... क्या करूं..... क्या बेटी को बता दूं कि विद्या पढाई जैसी कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जो किताबों को मत्था टेककर ही आए या फिर किताबों में हरी पत्तियां रखने से.... या फिर उसके मासूम बचपन को अपनी दुनिया में खुश रहने दूं और उसके मासूम आदेशों को मानकर उसकी नोटबुक को मत्था टेक ही लूं।