Tuesday, October 17, 2017

गौरी...

कलम
खुद नहीं चलती
उसे हाथ चलाते हैं...
शब्द खुद से उभरते नहीं,
उन्हें सोच जन्म देती है...
सवाल सिर्फ प्रश्न चिह्न नहीं होते...
वो सच दिखाता आईना होते हैं
आईने पत्थरों से टूट जाते हैं
सवाल रबड़ से मिटाए जा सकते हैं
हाथ कट सकते हैं
इस वक्त की ब्लू व्हेल का निशान लेकर
कलम तोड़ी जा सकती है
जुल्म से.... ज़बर से...
पर
सोच का क्या करोगे ???????
- 'गगन'

काम हुआ है

ओ राजा! तेरे राज में चर्चा आम हुआ है 
काम हुआ है काम हुआ है काम हुआ है

तेरे अपने, अपनों के अपने, काटें मलाई
जनता सोए फुटपाथ पे लेकर फटी रजाई 
इंसानों का जीवन जैसे श्वान हुआ है 
इसे कहते हो काम हुआ है काम हुआ है

पूछें सवाल तो दरबारों से बाहर निकालें 
दरबारी कवि बने सवाल सब पूछने वाले 
चाटुकारिता रीति का पुनरुत्थान हुआ है 
इसे कहते हो काम हुआ है काम हुआ है

संस्कृति समाज की बंद दरो दीवार में रह गई
गंगा जमुनी तहजीब की धारा कहाँ को बह गई
उसका हर बंदा आज रहीम और राम हुआ है 
इसे कहते हो काम हुआ है काम हुआ है

घर की मुर्गी दाल बराबर तुमने है करदी
बाहर से दाल मंगा, कीमत मुर्गी सी करदी
अपने खानसामाओं को तो नुकसान हुआ है 
इसे कहते हो काम हुआ है काम हुआ है

याद रखो गर जनता कभी ये शपथ उठाए
तुम जैसे दंभी को जब ये सुपथ दिखाए
इतिहास में आम लोगों ने जब संग्राम किया है 
फिर सब कहते हैं काम हुआ है काम हुआ है

अब भी वक्त है संभल जाओ ये स्थिति संभालो
जन सेवक हो राजा का गुरूर ना मन में पालो
कुछ करने से हर मुश्किल का समाधान हुआ है 
कहें धरती-गगन फिर काम हुआ है काम हुआ है

गगन

Wednesday, October 4, 2017

हैप्पी बर्थडे डियर बापू!

3 अक्तूबर 2017
आज ये विश इसलिए क्योंकि कल तो आप बहुत मसरूफ थे। पहले तो वही सुबह-सुबह आपकी समाधि को पानी से धोकर भंग किया होगा रामू ने, रामू नहीं तो रहीमू ने, खैर छोड़ो, आप को तो वैसे भी फर्क नहीं पड़ता। आपके लिए तो सारे के सारे कुमति हैं, इसलिए तो आप ईश्वर- अल्लाह से सबके लिए सन्मति मांगते चले गए। ये दीगर बात है कि दोनों को सन्मति ना आप के रहते आई ना आप के जाने के बाद। झगड़ा उन्हीं के लिए जिनसे आप सन्मति मांग रहे थे। खैर! कल फिर से आपकी समाधि भंग हुई उसके लिए माफ़ी। माफ़ी उन लोगों से भी जिन्हें पीने के लिए साफ पानी भी नसीब नहीं, जो एक बाल्टी पानी हासिल करने को इतने बेचैन हो जाते हैं कि आपके दिखाए अहिंसा के रास्ते का साइनबोर्ड ही उखाड़ देते हैं। समाधि भंग होने पर गुस्सा तो आपको भी आता होगा बापू! है ना। वैसे भी अपने यहाँ तो ट्रेंड है ना सिर्फ 2 अक्तूबर को आपको याद करने का, बाकी सारा साल आपकी शिक्षाओं का कत्ल कर तिजोरी आबाद करने का। तो कल भी तो ऐसा ही हुआ होगा। है कि नहीं? सुबह-सुबह भीड़ आई होगी हर साल जैसे। उनके हाथों से गिरती गुलाब की पत्तियों से चोट तो बहुत लगती होगी। है ना बापू! तो वो गाना गाया करो, "मेरे कातिल हैं मेरी लाश पे रोने वाले"। इस बार तो वैसे आपकी मार्केटिंग और ब्रांडिंग बहुत शानदार थी। पत्रकारों वाला सवाल करूँ, "आप को कैसा लग रहा है?"। अरे नाराज़ मत हों। मैं तो बस बता रहा था कि आप जैसा अब वो "यंग इंडिया" या "हरिजन" छापने का टाइम नहीं। अभी तो बस दो सवाल, एक ! आपको कैसा लग रहा है? दूसरा! जी, कैसा माहौल है? साॅरी बापू ना हम आप जितना लिखते हैं, ना भगत सिंह भाई जितना पढ़ते है। ये और बात है कि दोनों पर दावेदारी पूरी दुनिया से ज़्यादा हम ही करते हैं। अमेरिका के मेयर बर्नी से भी ज्यादा। अब अगली 2 अक्तूबर तक फ्री हो ना बापू! कभी मिलना इस गोरे बर्नी से। दीवाना है बंदा आपका। चलो ! कल की बात पूरी करें । विज्ञान भवन गए थे कल? आपके नाम पर लोगों को साफ सफाई का पाठ पढ़ाया गया था ना। तो कल उसका नतीजा आया था। एक मजेदार बात बताऊँ, जो काम आपके झाड़ू हाथ में लेने से लोग खुद कर देते थे उसके लिए अब बकायदा बजट है बापू! 63 हज़ार करोड़ से शुरू हुआ था अब तो तकरीबन 2 लाख करोड़ जैसा कुछ है। ऐसा क्यों है बापू? क्या झाड़ू महंगी हो गई या उसको पकड़ने वाले हाथ तुम्हारी सोच के जैसा नहीं इसलिए? पर बापू वो बोलते हैं जो दिखता है वही बिकता है। अच्छा बापू एक बात और, कल तो आप वो सूबेदार साहब से भी नहीं मिल पाए होंगे। क्या बापू! तीन साल में पहली बार तो हमारे साहब ने आपसे मिलने का सोचा और आप विज्ञान भवन चले गये। ऐसे कौन करता है भाई? खैर कह तो रहे थे साहब। बोले सब कह के आया हूँ। हल ना निकला तो फिर जाऊँगा। चलो देखेंगे। वैसे ! देश बदल रहा है बापू! पर बदलाव की परिभाषा अलग है। ये ना तो तुम्हारे सपनों की धरती है ना भगत सिंह भाई की उम्मीदों का जहान। ये तो कुछ अजब गजब सा है! लंबी-लंबी छोड़ने वाले बौने लोगों की करतूतों का बयान। मेरा बयान बुरा लगा हो बापू तो माफ़ी।

Sunday, July 16, 2017

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है... कड़ियां

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि 'कड़ी निन्दा' कहने वाला कहते ही मर जाए
उसकी लाश पे कोइ कुछ लाख मदद धर जाए
पर ऐसा अक्सर होता नहीं है,
भाषण देने वाला रोता नहीं है।
ये 'कड़ी निन्दा' मानो मिसाइल बन गया है
ना चलती हैं तोप, ये ज़ुबां पे तन गया है
संस्कृति की बात करने वाले, संस्कृत को हैं भूले
"शठे शाठ्यम समाचरेत्" पर हम झुलाते हैं झूले
ये लफ्फाजी, ये खोखला बड़प्पन हमें कहाँ ले जाएगा
देशवासी यूँ ही बेमौत मरे, तो देश कहाँ चल पाएगा
अपने ही देश में घूमने को हम इजाज़त क्यों मांगे?
विदेशों में घूमने वाला बड़ी बड़ी डींग क्यों हांके?
कोई ये ना पूछेगा कि भीड़ खामोश क्यों थी?
कोई ये ना समझेगा सियासत मदहोश क्यों थी?
पर इस बात की बार बार तोहमत लगेगी
जो बोल सकते थे, क्या सहमत थे वे भी ?
कानों से सुनना और आंखों से बस देखना
कलम को कुंद और अक्ल को मंद बना देता है
तुम्हारा बोलना इसलिए ज़रूरी है दोस्त
कि खामोश रहना ज़ुबां को जंग लगा देता है
धरती का सूरज छिपे तो भी सुबह की आस होती है
आत्मा के अंधेरे में भटकती जिन्दगी अभिशाप होती है
मैं ये वो सब तमाम बातें जानता हूँ
अपने भीतर का तमस पहचानता हूँ
हर शब्द को सौ बार छानता हूँ मेरे दोस्त मगर फिर भी
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है!
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कभी-कभी पार्ट -3 इस बार आओ सोचें!
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि सारे राज-भोगी गर कर्मयोगी बन जाते
तो राम राज आ भी सकता था 
विश्व गुरू बन कर भारत
दुनिया को राह दिखा भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि दया, धर्म, प्यार और प्रेम की कोई बात ही नहीं
एंटी-रोमियो बन गए वो जिनकी कोई औकात ही नहीं
ना अक्ल, ना शक्ल, ना आचार है, ना विचार,
अजब अंदाज़ में वो सबको सिखाने चले हैं सदाचार
इज्जत की जीत के बाद अब दौर ए बदनामी आएगा ?
जहाँ हर रिश्ते को शक की नजर से देखा जाएगा !
और मेरे लिखे की हकीकत वो कहां समझ पाएगा।
मै जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
गगन
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कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि फेसबुक के लाइक्स और ट्विटर के ट्वीट 
वोटों में बदलते तो हम सौ हो भी सकते थे
हमारी गुगली सही डल जाती तो सबको धो भी सकते थे
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई सी एम, मिनिस्टर और सीपीएस तक नहीं
जबरन मिले विपक्ष के नेता पद की हमें ख्वाहिश थी नहीं
ना कोई चुनाव नज़दीक ना ही रैली कोई
भड़ास मन की खांसी मे निकालनी होगी
अब सोच समझ के हर जगह बोलना होगा
या फिर ईवीएम में कमी खंगालनी होगी
मैं जानता हूँ मेरे वालन्टियर्स मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
गगन दीप चौहान
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कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
कि ग़र सरकारी नौकरी मिल जाती 
तो ज़िंदगी में आराम हो भी सकता था
शाम को चाय पीकर बिस्कुट खाकर
दो घड़ी आराम से मैं सो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि कहीं कोई monday, Tuesday, Wednesday
Thursday और Friday की सूरत ही नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह से ज़िन्दगी जैसे
इसे Saturday और Sunday की ज़रूरत भी नहीं
ना कोई बोनस ना इन्क्रीमेन्ट ना प्रमोशन का कोई सुराग
भटक रही है आफिस में ज़िन्दगी मेरी
इक दिन रह जाऊंगा 
खोकर फाइलों के ढेर में कहीं  
मैं जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
गगन दीप चौहान