3 अक्तूबर 2017
आज ये विश इसलिए क्योंकि कल तो आप बहुत मसरूफ थे। पहले तो वही सुबह-सुबह आपकी समाधि को पानी से धोकर भंग किया होगा रामू ने, रामू नहीं तो रहीमू ने, खैर छोड़ो, आप को तो वैसे भी फर्क नहीं पड़ता। आपके लिए तो सारे के सारे कुमति हैं, इसलिए तो आप ईश्वर- अल्लाह से सबके लिए सन्मति मांगते चले गए। ये दीगर बात है कि दोनों को सन्मति ना आप के रहते आई ना आप के जाने के बाद। झगड़ा उन्हीं के लिए जिनसे आप सन्मति मांग रहे थे। खैर! कल फिर से आपकी समाधि भंग हुई उसके लिए माफ़ी। माफ़ी उन लोगों से भी जिन्हें पीने के लिए साफ पानी भी नसीब नहीं, जो एक बाल्टी पानी हासिल करने को इतने बेचैन हो जाते हैं कि आपके दिखाए अहिंसा के रास्ते का साइनबोर्ड ही उखाड़ देते हैं। समाधि भंग होने पर गुस्सा तो आपको भी आता होगा बापू! है ना। वैसे भी अपने यहाँ तो ट्रेंड है ना सिर्फ 2 अक्तूबर को आपको याद करने का, बाकी सारा साल आपकी शिक्षाओं का कत्ल कर तिजोरी आबाद करने का। तो कल भी तो ऐसा ही हुआ होगा। है कि नहीं? सुबह-सुबह भीड़ आई होगी हर साल जैसे। उनके हाथों से गिरती गुलाब की पत्तियों से चोट तो बहुत लगती होगी। है ना बापू! तो वो गाना गाया करो, "मेरे कातिल हैं मेरी लाश पे रोने वाले"। इस बार तो वैसे आपकी मार्केटिंग और ब्रांडिंग बहुत शानदार थी। पत्रकारों वाला सवाल करूँ, "आप को कैसा लग रहा है?"। अरे नाराज़ मत हों। मैं तो बस बता रहा था कि आप जैसा अब वो "यंग इंडिया" या "हरिजन" छापने का टाइम नहीं। अभी तो बस दो सवाल, एक ! आपको कैसा लग रहा है? दूसरा! जी, कैसा माहौल है? साॅरी बापू ना हम आप जितना लिखते हैं, ना भगत सिंह भाई जितना पढ़ते है। ये और बात है कि दोनों पर दावेदारी पूरी दुनिया से ज़्यादा हम ही करते हैं। अमेरिका के मेयर बर्नी से भी ज्यादा। अब अगली 2 अक्तूबर तक फ्री हो ना बापू! कभी मिलना इस गोरे बर्नी से। दीवाना है बंदा आपका। चलो ! कल की बात पूरी करें । विज्ञान भवन गए थे कल? आपके नाम पर लोगों को साफ सफाई का पाठ पढ़ाया गया था ना। तो कल उसका नतीजा आया था। एक मजेदार बात बताऊँ, जो काम आपके झाड़ू हाथ में लेने से लोग खुद कर देते थे उसके लिए अब बकायदा बजट है बापू! 63 हज़ार करोड़ से शुरू हुआ था अब तो तकरीबन 2 लाख करोड़ जैसा कुछ है। ऐसा क्यों है बापू? क्या झाड़ू महंगी हो गई या उसको पकड़ने वाले हाथ तुम्हारी सोच के जैसा नहीं इसलिए? पर बापू वो बोलते हैं जो दिखता है वही बिकता है। अच्छा बापू एक बात और, कल तो आप वो सूबेदार साहब से भी नहीं मिल पाए होंगे। क्या बापू! तीन साल में पहली बार तो हमारे साहब ने आपसे मिलने का सोचा और आप विज्ञान भवन चले गये। ऐसे कौन करता है भाई? खैर कह तो रहे थे साहब। बोले सब कह के आया हूँ। हल ना निकला तो फिर जाऊँगा। चलो देखेंगे। वैसे ! देश बदल रहा है बापू! पर बदलाव की परिभाषा अलग है। ये ना तो तुम्हारे सपनों की धरती है ना भगत सिंह भाई की उम्मीदों का जहान। ये तो कुछ अजब गजब सा है! लंबी-लंबी छोड़ने वाले बौने लोगों की करतूतों का बयान। मेरा बयान बुरा लगा हो बापू तो माफ़ी।
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