Thursday, February 22, 2024

इंतज़ार

दो प्याली
वहीं रक्खी हैं
उसी कोने वाली मेज पर
जहाँ की कुर्सियां
और दीवार भी
जानती हैं हमें
पहचानती हैं खुश्बू
मेरी और तुम्हारी
और महसूस करती हैं
हमारी तरंगों कीआवृत्ति
मैं पढ़ लेता हूँ
धुले हुए कप पर
निशान तुम्हारी उंगलियों के
आओगी इस बार
तो देखूंगा
क्या उसी अंदाज में
आज भी पकड़ती हो
एक प्याली चाय की

गगन