कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
कि कई मामलों की जांच,
कमीशन वाली सियासत में ना उलझती
तो इंसाफ़ हो भी सकता था
फरेबी कार्रवाइयों पर करोड़ों खर्चने वाला देश
बेअदबी और कत्ले-आम के मनहूस दाग
अपने माथे से धो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई जांच कोई गवाही कोई सुनवाई भी नहीं
सियासत ने कोई गुत्थी कभी सुलझाई ही नहीं
ना सरेआम नस्लकुशी करने वालों को सज़ा होती है
बेअदबी के दोषियों पे राजनीति ना एक रज़ा होती है
अदालतों में आस की डोर सांसों के साथ टूट जाती है
न्याय की देवी आंखों पे पट्टी बाँध भीतर भीतर रोती है
चंद सफेदपोशों ने हर मुद्दे को मज़ाक बना डाला है
कुरसी वालों ने वोट वालों संग किया गड़बड़झाला है
अब उम्मीद रक्खें भी तो किस से करें
उन्होंने शाही अंदाज़ से सब कत्ल कर डाला है
फिर कुछ वक्त के बाद वायदे दोहराए जाएंगे
कसमे वादे कर इंसाफ के सब्ज़बाग दिखाए जाएंगे
फिर शातिर सियासत शह और मात पहले तय कर लेगी
धर्म और जात के नाम पे लोग फिर अपनी जान गवाएंगे
और वो चलेगा कमिश्न या जांच टीम वाली फिर चाल नई
मैं जानता हूँ मेरे कपतान मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
Tuesday, August 28, 2018
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
Thursday, August 23, 2018
वंशानुगत बीमारी
बंधन आज भी
वैसे ही हैं
जो तब थे
जब सफेद बाल भी
स्याह थे
विद्रोह तब भी थे
आज भी जारी हैं
भूखे रहना
तब भी प्रदर्शन था
आज भी
दर्द भरे गीत
तब भी अपनापन जताते थे
आज भी बजते हैं
एमपी3 में
लगातार
कंकरीट के जंगलों में
हवा तब भी ख़ामोश थी
आज भी मौसम
दम घोटे हुए है
सिसकियां आज भी
सिर्फ तकिये को सुनाती हैं
अपनी आवाज़
लाल आंखों की कहानी
बहाने बना रही है
हर सुबह के बाद
अपनों के साथ
जंग जीतने का विश्वास
आज भी कायम
दिल का तेज़ धड़कना
आज भी बदस्तूर जारी है
यह इश्क़ की
वंशानुगत बिमारी है
-गगन
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