गरम हवाओं के हाथ
पतझर में झर झर गिरे
सूखे पत्तों पर लिख भेजी
दास्तान ए जुदाई
आँखों से आँसू झरे
शब्दों में दर्द-ए-दिल
बादलों ने भी चीत्कार किया
पर
बूँदें नहीं आई
शायद कोई और गणित होगा
बारिश को बुलाने का
सुना था एक बार कभी
समंदर जैसा विशाल कोई
जब लहरें दिखाने लगे
बिरहा के सूरज की तपिश जब
सब्र के पानी को
धुआँ बनाने लगे
तब बदलता है मौसम
फिर चलती है पुरवाई
जब दिल में बहते हैं आंसू
बूँदें लगता है मानो
अब आई और अब आई
गगन