चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे
है हवाओं में खुशबू तेरे प्यार की
धड़कनें क्यों न दिल की मचलती रहें
1)
लहरें सागर से करने लगी मसखरी
किश्ती मांझी को रस्ता बताने लगी
बेल पेड़ों से जाकर लिपटने लगी
पत्तियां शाख से क्यों बिछड़ती रहें
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे
2)
शब्दों से दूर होने लगी लेखनी
स्याही काग़ज़ पे फ़ीकी पड़ने लगी
आँखों ने आंसुओं को न रस्ता दिया
पलकों पे दावानल क्यों दहकती रहे
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे
3)
मेहंदी फीकी पड़ी, प्यार गहरा गया
उम्र बढती गई, हुस्न शरमा गया
वो तसव्वुर में मिलने को आते रहे
ख्वाबों से क्यों ना ये दिल बहलने लगे
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे
गगन