Sunday, October 28, 2018

गीत

चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे
है हवाओं में खुशबू तेरे प्यार की
धड़कनें क्यों न दिल की मचलती रहें

1)
लहरें सागर से करने लगी मसखरी
किश्ती मांझी को रस्ता बताने लगी
बेल पेड़ों से जाकर लिपटने लगी
पत्तियां शाख से क्यों बिछड़ती रहें
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे

2)
शब्दों से दूर होने लगी लेखनी
स्याही काग़ज़ पे फ़ीकी पड़ने लगी
आँखों ने आंसुओं को न रस्ता दिया
पलकों पे दावानल क्यों दहकती रहे
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे

3)
मेहंदी फीकी पड़ी, प्यार गहरा गया
उम्र बढती गई, हुस्न शरमा गया
वो तसव्वुर में मिलने को आते रहे
ख्वाबों से क्यों ना ये दिल बहलने लगे
चाँद आवारगी कर रहा आज कल
चाँदनी क्यों शराफत में जलती रहे

गगन

Wednesday, October 17, 2018

ज़िन्दगी

कट जाए अगर तो फिर ग़म क्या है
तू उलझ गई ये शिकायत है ज़िन्दगी
वो मिले तो आधी अधूरी चाहत जैसे
ये किस दौर की मोहब्बत है ज़िन्दगी
उसे दिल में उतरना अच्छे से आता है
ये तो कोई और ही दस्तक है ज़िन्दगी
हवा है खुशबू है बहार है मौसम भी है
मेरे लिए ही क्यों पतझड़ है ज़िन्दगी
बादल उसकी आँखों से बरसते हैं गगन
उसके लिए अधूरी सी हसरत है ज़िन्दगी

गगन

Monday, October 8, 2018

वो

खिड़की से तो चाँद निकलता कभी सुना था मैने ये
उसने झांका सूरज नज़रें नीची करके भाग गया
इक मुस्कान किसी की कैसे ले आती बहार यहाँ
उसके आंसू के कतरे से शहर समंदर पार गया
किसकी बोली कोयल को भी मीठी भाषा सिखलाए
उसकी चुप्पी से जीवन में तेज़ कोई तूफान गया
बहार की आमद होती जब भी उसका आना होता था
उसके जाने से पतझड़ का मौसम लगे पहाड़ हुआ
गगन भी चुप है, धरती चुप है, हवा ना कोई शोर करे
एक उसी की कमी से जग लगता जैसे शमशान हुआ

मैं

आंसू आग तूफान या धुआँ हूँ मैं
मुझमे उतर के देख तू क्या हूं मैं
तू जो सोचता रहा तेरा वहम था
मुझसे मिलके जान ले क्या हूं मैं
ख्वाब तेरे आसमां के पार जाते
ज़मीं पे हकीक़त की इंतेहा हूं मैं
ईमान की ज़मीं सादगी का करम
ऐसे मुल्क से गुज़रती हवा हूँ मैं
जो मौसम मोहब्बत जवाँ करे है
उसी रुत कोई गुल खिला हूँ मैं
उससे क्या मेरी हदें पूछते हो
गगन क्या जाने कि क्या हूँ मैं


वक्त

होंगी जागीरें या रहेगा फकीर
कैसे बोलेगी ये हाथों की लकीर
ऐसे लोगों को सब करें हैं सलाम
जो संवारें हैं बिगड़ी सी लकीर
सिर्फ किस्मत पे भरोसा ना कर
ज़ोर ए मेहनत से बदल दे तकदीर
जिन्हें होना था राजा, बन को गए
उस विधाता की कैसे पलटी लकीर
ज़िक्र ना इल्म का जिनके हाथ में था
देव की वाणी को दे गए वो नज़ीर
हाथ हाथों में उसने थाम लिया
फिर दिलों की मिल गयी थी लकीर
उठ गगन दिल में हौसला तो कर
देख वो कैसे बदलेगा तस्वीर

कुछ ना कुछ तो कहती हैं

अलसाई सी उसकी आँखें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
इंतज़ार में कट गई रातें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
उसकी आँखों में दुनिया के
धर्म ग्रन्थ सब पढ डाले
प्रार्थना और अरदास दुआएं
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
नफरत के नश्तर ने बींधा
वादी का बचपन सारा
बम गोली में तोतली बोली
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
खून पसीने से सींची पर
फसल खुदकुशी की काटी
खेतों में जलती वो चिताएं
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
सावन बरसेगा अब के तो
उम्मीदों की बारिश सा
आसमां को तकती निगाहें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
सबके सपने करूंगा पूरे
मंज़िल ग़र मिल जाएगी
पढी लिखी सबकी आशाएँ
कुछ ना कुछ तो कहती हैं

गगन

मासूम

37वां साल
बहुत कुछ सिखा देती है
जिन्दगी इतने सफर में
पर वो मासूम अभी भी
बच्ची सी है
मेरे दिल के घर में
कई ऐसे रिश्ते
कई ऐसे बंधन
मैं मन से जुड़ी थी
वो खोजते थे बस तन
समझ ही ना पाई
ये क्या हो रहा है
जिस जिस पे भरोसा था
सब खो रहा है
कैसे इस मोड़ पे
ले आई है ज़िन्दगी
ना शैतानियों का मन है
ना होती है बंदगी
किस से कहूँ
हाल ए दिल मैं सुनाऊं
कभी समझ ना पाई
किसे अपना बनाऊं
मैं पंछी सा आज़ाद
जीना चाहती हूँ
डर है किसी
जाल में फंस ना जाऊं
वो कब आएगा
जो मन को भी थामे
सिर्फ तन ना देखे
रूह को पहचाने
मेरी प्यास ऐसी
तलब बन गई है
अजब एक ज़िद
खुद से ही ठन गई है
कोई दे जो दस्तक
मेरे प्यारे दिल पे
चाहती हूँ आए
कहे कुछ वो मिल के
पर खुद ही मैं दरवाज़े
बंद कर रही हूँ
समझ नहीं आता
जी रहीं हूँ हर पल
या पल पल मर रही हूँ
मेरा हाथ थामो
मुझे ले ही जाओ
उस देस जहाँ से
सब देख पाओ
है तुम पर यकीं
कि शिकायत ना होगी
अमानत समझना
खयानत ना होगी

अधूरापन

रात अपनी है
नींद अपनी है
ख़्वाब अपने हैं
बात अपनी है
अपने हैं जज़्बात
ख्यालात अपने हैं
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है

आस अपनी है
प्यास अपनी है
अपना है सारा समंदर
अपनी है हर लहर
उजालों से पहले की
उजास अपनी है
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है

दिल अपना है
दिमाग अपना है
शरारत अपनी है
समझ अपनी है
अपनी है हर सोच
अपना हर सपना है
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है

कवि कर्म

काग़ज़ की तलवारों से लोहा जब काटा जाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

कुछ निर्बुद्धा जडबुद्धि जबसे राजा के चाटुकार हुए
कविताओं के मंच तभी से बिकते जैसे व्यापार हुए
कड़वे सच का शब्द घोल, कानों की मैल पिघलाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

सोने और चाँदी की कलमें, सत्ता के मसनद लील गए
कितने जो तलवे चाट मरे, कई कल्पनाओं के शील गए
काठ कलम से धरती का सच तख्ती पे लिक्खा जाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

खेतों में लटकती लाशों की, जिन्हें ना दिखती मजबूरी है
दिल्ली के उस सिंहासन की, गांव से बढ रही दूरी है
वोट की फसल काटने राजा, खलिहानों में जब आएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

धरती गगन मिल कर जागें, नव युग का सब आह्वान करें
वो झूठ के किले में बैठे जो, उन्हें सारा सत्य बयान करें
अपने अंतर्मन के सच को, जब हर कोई समझ में लाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा