Monday, October 8, 2018

मासूम

37वां साल
बहुत कुछ सिखा देती है
जिन्दगी इतने सफर में
पर वो मासूम अभी भी
बच्ची सी है
मेरे दिल के घर में
कई ऐसे रिश्ते
कई ऐसे बंधन
मैं मन से जुड़ी थी
वो खोजते थे बस तन
समझ ही ना पाई
ये क्या हो रहा है
जिस जिस पे भरोसा था
सब खो रहा है
कैसे इस मोड़ पे
ले आई है ज़िन्दगी
ना शैतानियों का मन है
ना होती है बंदगी
किस से कहूँ
हाल ए दिल मैं सुनाऊं
कभी समझ ना पाई
किसे अपना बनाऊं
मैं पंछी सा आज़ाद
जीना चाहती हूँ
डर है किसी
जाल में फंस ना जाऊं
वो कब आएगा
जो मन को भी थामे
सिर्फ तन ना देखे
रूह को पहचाने
मेरी प्यास ऐसी
तलब बन गई है
अजब एक ज़िद
खुद से ही ठन गई है
कोई दे जो दस्तक
मेरे प्यारे दिल पे
चाहती हूँ आए
कहे कुछ वो मिल के
पर खुद ही मैं दरवाज़े
बंद कर रही हूँ
समझ नहीं आता
जी रहीं हूँ हर पल
या पल पल मर रही हूँ
मेरा हाथ थामो
मुझे ले ही जाओ
उस देस जहाँ से
सब देख पाओ
है तुम पर यकीं
कि शिकायत ना होगी
अमानत समझना
खयानत ना होगी

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