Monday, October 8, 2018

कवि कर्म

काग़ज़ की तलवारों से लोहा जब काटा जाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

कुछ निर्बुद्धा जडबुद्धि जबसे राजा के चाटुकार हुए
कविताओं के मंच तभी से बिकते जैसे व्यापार हुए
कड़वे सच का शब्द घोल, कानों की मैल पिघलाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

सोने और चाँदी की कलमें, सत्ता के मसनद लील गए
कितने जो तलवे चाट मरे, कई कल्पनाओं के शील गए
काठ कलम से धरती का सच तख्ती पे लिक्खा जाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

खेतों में लटकती लाशों की, जिन्हें ना दिखती मजबूरी है
दिल्ली के उस सिंहासन की, गांव से बढ रही दूरी है
वोट की फसल काटने राजा, खलिहानों में जब आएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा

धरती गगन मिल कर जागें, नव युग का सब आह्वान करें
वो झूठ के किले में बैठे जो, उन्हें सारा सत्य बयान करें
अपने अंतर्मन के सच को, जब हर कोई समझ में लाएगा
कवि कर्म में दम कितना ये वक्त सबको बतलाएगा












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