रात अपनी है
नींद अपनी है
ख़्वाब अपने हैं
बात अपनी है
अपने हैं जज़्बात
ख्यालात अपने हैं
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है
आस अपनी है
प्यास अपनी है
अपना है सारा समंदर
अपनी है हर लहर
उजालों से पहले की
उजास अपनी है
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है
दिल अपना है
दिमाग अपना है
शरारत अपनी है
समझ अपनी है
अपनी है हर सोच
अपना हर सपना है
फिर भी क्यों लगे ऐसे
जैसे कुछ अधूरा सा है
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