Monday, October 8, 2018

कुछ ना कुछ तो कहती हैं

अलसाई सी उसकी आँखें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
इंतज़ार में कट गई रातें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
उसकी आँखों में दुनिया के
धर्म ग्रन्थ सब पढ डाले
प्रार्थना और अरदास दुआएं
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
नफरत के नश्तर ने बींधा
वादी का बचपन सारा
बम गोली में तोतली बोली
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
खून पसीने से सींची पर
फसल खुदकुशी की काटी
खेतों में जलती वो चिताएं
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
सावन बरसेगा अब के तो
उम्मीदों की बारिश सा
आसमां को तकती निगाहें
कुछ ना कुछ तो कहती हैं
सबके सपने करूंगा पूरे
मंज़िल ग़र मिल जाएगी
पढी लिखी सबकी आशाएँ
कुछ ना कुछ तो कहती हैं

गगन

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