Wednesday, November 11, 2015

हरियाणा का 50वां वर्ष : सवाल संस्कृति का है!

बात अप्रैल 2008 की है... पंजाब के शाही शहर पटियाला से एक क्षेत्रीय चैनल में अपनी पारी खत्म करने के बाद मैने दिल्ली में उस वक्त के राष्ट्रीय चैनलों में से एक में एंट्री की थी। कार्यालय बाहरी दिल्ली में था तो इसीलिए रहने का इंतज़ाम भी वहीं आस पास करने की कोशिश हुई...। डीडीए फ्लैट्स में अपने लिए एक अदद रिहाइश की तलाश करते करते मुझे प्रॉपर्टी डीलर के ज़रिए एक फ्लैट में कमरा और रसोई का सेट मिला। पहली मुलाकात में फ्लैट की मालकिन आंटी का पहला सवाल था, "बेटा! कहां से हो?'' 'जी.. हरियाणा से' मैने जवाब दिया। 'जाट हो?' ये अगला सवाल था। पहली बार मुझे एहसास हुआ कि हरियाणा से बाहर हरियाणवी होने का एकमात्र मतलब बहुत से लोगों के लिए जाट होना हो सकता है। पर यहां मैं ये भी स्पष्ट कर दूं कि उन आंटी के सवाल में किसी जाति-पाति को लेकर संशय नहीं था। हां जाट होने से उनका आशय था हरेक हरियाणवी... जी हां... ये आपको अजीब लग सकता है पर ऐसे बहुत से लोग हैं जो हरियाणा को सिर्फ जाट प्रदेश मानते हैं.... और यहां जाट होने का मतलब जाति पाति नहीं बल्कि अक्खड़... अनपढ... और गंवार होना है... ऐसा होना है जो समाज और संस्कृति से दूर दूर तक वास्ता नहीं रखता.... ये सब कुछ ऐसा था जो दिल्ली के तथाकथित सभ्य समाज को स्वीकार्य नहीं था.../ आज भी नहीं है। इस घटना को 7 साल से ज़्यादा होने को आए... ना तो मैं अपने ज़हन से उन सवालों को मिटा पाया हूं और ना ही अब तक भी दिल्ली या बाकी शहरों के ज़्यादातर शहरों के लोगों को इस बात का अहसास हुआ है कि हरियाणा से आने वाला हर शख्स वो जाट नहीं होता, जैसा वो सोचते या समझते आएं है...। हरियाणा एक ऐसा राज्य है जहां हर जाति धर्म भाषा के लोग उसी तरह से रहते हैं जैसा बाकी के राज्यों में...। ये दीगर बात है कि लोक संस्कृति के मामले में बेहद संपन्न राज्य हरियाणा आज भी अपनी वो 
पहचान कायम नहीं कर पाया जो उसे लेकर लोगों के ज़हन में एक नज़रिया विकसित करती। और इसके पीछे सिर्फ एक वो लाईन बहुत बड़ी भूमिका निभाती है जिसे हरियाणा के संदर्भ में अक्सर ही कह दिया जाता है कि यहां कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर है... और आप शायद सहमत हो या ना हों... इस सब में हमारे उन तमाम राजनेताओं का बढ़ चढ़ कर योगदान रहा जिन्होंने ना तो प्रदेश के कलाकारों को उस स्तर तक प्रोत्साहित करने की कोशिश की, कि वो देश के सामने एक आईकॉन बनते, और ना ही इस बात की तरफ़ कभी ध्यान दिया गया कि प्रदेश की लोक संस्कृति दुनिया में एक बेहतरीन पहचान कायम करने का आधार बन सकती है। लोक कला और कलाकारों का इस्तेमाल सिर्फ एक काम के लिए हुआ... राजनीतिक रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए.... बेशक अब से पहले की सरकारों ने कई अकादमी औऱ कई संस्थान ऐसे खोले जिनके नाम में कला, संस्कृति या साहित्य जैसे शब्द दिखाई देते थे। पर हकीकत क्या है... आज भी हरियाणा में आम जन मानस के ज़हन में कलाकारों के लिए एक ही परिभाषा है... गाने-बजाने वाले...। जब हमारे अपने लोग, अपनी मिट्टी के नायक को सम्मान नहीं दे पाए तो फिर बाहर के राज्यों में हम सम्मान की तवक्को भी कैसे करें..। जब अप्रैल 2008 में ये दिल्ली का वाकया हुआ... उसके कुछ दिन बाद प्रवीन और सुषमा (दोनों मेरे मित्र और टीम रत्नावली के सशक्त वॉलिन्टियर्स) दिल्ली आए... हम तीनों काफी देर तक इस बारे में विचार करते रहे कि कैसे ये पहचान बदली जाए। ये जो अजीब सा लबादा है इसे उतार कर कैसे दुनिया को ये बताएं कि देखिए बाकी चाहे जो भी हो... पर आप ये भी याद रखें कि बॉलीवुड के कई बड़े नाम मरहूम सुनील दत्त साहब, सतीश कौशिक, यशपाल शर्मा, मल्लिका शेरावत, शास्त्रीय संगीत की दुनिया से पंडित जसराज भी हरियाणा से ही हैं...। ये सब सिर्फ एक संकीर्ण क्षेत्रवाद की सोच नहीं थी... बल्कि हमें कहीं ना कहीं इस बात को लेकर मलाल था कि हमारी पहचान सिर्फ एक परसेप्शन पर आधारित हो गई है...। हम तीनों ने एक साथ ये सोचा कि अब अपना योगदान उस दिशा में देना है जिससे हरियाणा को संस्कृति के क्षेत्र में ग्लोबल हरियाणा के तौर पर पहचान मिले...। उस वक्त में जो हमने सोचा वो बात अनूप लाठर सर के साथ भी हुई.. जिन्होंने हमेशा एक विश्वास किया कि उनके बच्चे कुछ अच्छा करेंगे बढिया करेंगे...। हमने सर के आशीर्वाद से जो एक सार्थक कोशिश अंजाम दी वो थी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा समारोह और राज्य स्तरीय हरियाणा दिवस समारोह में छात्र छात्राओं को इवेंट मैनेजमेंट में अधिकतम एक्सपोज़र। क्योंकि जब जब ऐसे आयोजन होते हैं तो आप अंदाज़ा नहीं लगा पाते कि मंच के सामने बैठे दर्शकों में कौन कौन शामिल है... बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो यायावर प्रवृत्ति का होने की वजह से घूमते हैं और देखने और समझने की कोशिश करते हैं कि हरियाणा की युवा पीढी क्या कर और सोच रही है.... ऐसे में इन सांस्कृतिक आयोजनों में मंच संचालन में अगर द्विअर्थी संवाद/ चुटकुले/ फूहड़ शब्दावली परोसी जाएगी तो सामने बैठा मेहमान दर्शक तो कहेगा ही कि कल्चर नहीं एग्रीकल्चर है। इस बात को अच्छे से उन तमाम युवा दोस्तों ने समझा जो रत्नावली परिवार में हमारे साथ जुड़े। मंच से शालीनता परोसी गई तो आनंद लेने वाला दर्शक अपने आप से शालीन हो गया... अच्छे कहे गए शेर-ओ- शायरी पर तालियां बजी, सीटियां या हो हल्ला नहीं...। ये उत्साह मिला तो सिलसिला चल निकला... पहले प्रवीण और फिर राहुल ने इस ज़िम्मेदारी को बेहतरी से निभाया... बाकी तमाम प्यारे प्यारे दोस्तों का नाम लिखना चाहता हूं पर मैं जानता हूं वो खुद ब खुद समझ जाएंगे... हर कोई जिसने मेहनत की ऑन स्टेज या ऑफ स्टेज... वो किसी से छुपा नहीं है...। इन आयोजनों से एक लगाव इसलिए था कि मैं खुद भी अपने कॉलेज के दिनों में अलग अलग विधाओं में प्रतिभागिता करता रहा था। हम जब कॉलेज में इन आयोजनों के लिए तैयारी करते तो सब भूल जाते पढना लिखना, घर-बार, वक्त बेवक्त, बस एक ही राग... तैयारी.... चाहे थियेटर की विधा हो, गायन हो या फिर नृत्य... हर विधा में जुटे कलाकार एक अदद बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए जान लगा देते... मैं मानता हूं कि हरियाणा के तमाम कॉलेजों में ऐसे ही तैयारियां होती हैं... और फिर सब होने पर यूथ फेस्टिवल या हरियाणा दिवस पर जब ऑवर ऑल ट्रॉफी पर कब्ज़ा होता तो पिछले तमाम दिनों की थकावट दूर हो जाती...। ये सारी बातें यहां इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि ये सब कभी समझा नहीं गया... सरकारों की तरफ से तो कभी भी नहीं...। नतीजा ये है कि अपने अपने कॉलेज के दिनों में अपनी अपनी कला के क्षेत्र में महारथी रहे नाम अब तक सिर्फ एक ही हालत में हैं... या तो वो हर साल इंतज़ार करते हैं कि उन्हें कोई कॉलेज या स्कूल अपने फंक्शन में छात्र छात्राओं को तैयारी करवाने के लिए बुला ले... या कुछ एक को अगर कॉलेज या स्कूलों में नौकरी भी दी गई तो कुछ ऐसे जैसे कोई बहुत बड़ा ऐहसान किया जा रहा हो... बेहतरीन कलाकारों को 5 हज़ार रुपए प्रतिमाह की नौकरी का ऑफर कॉलेज/स्कूल वाले बड़े एहसान से देते हैं। जबकि अपने वक्त में इन्हीं कॉलेज और स्कूलों को ओवर ऑल चैम्पियन बनाने के लिए तमाम कलाकार अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं... आप बहुत कम ऐसे लोगों से मिलेंगे जो कला के इन आयोजनों में भी बेहतरीन रहे हों और पढाई में भी... उसकी एक वजह ये है कि लगातार आयोजनों में हिस्सा लेने वाले ये कलाकार आम छात्रों के मुकाबले 4-5 महीने कम पढ पाते हैं...। हालांकि उस वक्त में अगर कोई पढने की बात कहे तो अजीब लगता है... क्योंकि उस वक्त एक जुनून होता है... जो बाकी सब बातों पर परदा डाल देता है.. उस वक्त में सबसे बड़ी कामयाबी होती है वो पुरुस्कार जो मुकाबलों में जीते जाते हैं... वो लम्हे जो कॉलेज या यूनिवर्सिटी के अधिकारियों के साथ जीत की पार्टी में चाय की एक प्याली के वक्त आप बिताते हैं...। एक और बात भी है... ये जितने भी कलाकार दोस्तों के बारे में मैं लिख रहा हूं.... वो तब के हैं जब चैनलों पर युवा टेलेंट के एक्सपोज़र नाम की चिड़िया ने हरियाणा की उड़ान नहीं भरी थी... और इसका नुक्सान ये है कि अच्छे से अच्छे कलाकार गुमनामियों में कहीं खो से गए... या कुछ ने दाल-रोटी चलाने के लिए कुछ और पेशा अपना लिया.... इनमें से कुछ एक ऐसा शायद ना करते अगर फिल्म थ्री इडियट्स उस वक्त आई होती... खैर.... ऐसा नहीं है और तस्वीर जुदा है... हरियाणा की मूलभूत परिस्थितियों को समझने के लिए ये सब जान लेना ज़रूरी है... शायद तभी आपको समझ आएगा कि हम कल्चर के नाम पर एग्रीकल्चर ही क्यूं रह गए...। हरियाणा में ये सिर्फ युवा कलाकारों की नियति नहीं बल्कि उन कलाकारों के साथ भी तकरीबन ऐसा ही है जो लोक कला के क्षेत्र से जुड़े हैं...। जींद के ताऊ गजे सिंह... 68 साल से ज़्यादा उम्र का ये कलाकार जो वाद्य यंत्र बजाता है उसे बांसळी कहते हैं...  खोखले बांस का एक छोटा सा टुकड़ा... इस यंत्र को बजाने वाले गजे सिंह अपनी इस विधा के अकेले परफेक्ट नायक हैं... पर अंतत: अगर कोई ये पूछे कि कितने लोग गजे सिंह से परिचित हैं तो जवाब है हरियाणा से बाहर बहुत कम.... विदेशों की तो बात ही छोड़िए... विदेश का मामला मैने इसलिए उठाया क्योंकि पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पत्रकारिता की पढाई करते वक्त मैं एक युवा कलाकार से मिला... उनका नाम है लवली... वाद्य यंत्र है अल्गोज़ा... जिसका प्रदर्शन वो देश के साथ साथ विदेश में भी कर चुके हैं....। मेरे ज़हन में सवाल है कि अगर लवली ऐसा कर सकते हैं तो गजे सिंह क्यूं नहीं...। ये कैनवास बहुत बड़ा है... जिसके बारे में अगर सोचेंगे तो परत दर परत बहुत कुछ खुलता चला जाएगा....। प्रकाश सर हरियाणा में हरियाणवी डान्स सिखाने वाले बेहतरीन कलाकारों में से एक हैं... पर बात अगर ये करें कि प्रकाश सर को क्या बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं ने अपनी टीम का हिस्सा बनाया तो जवाब है नहीं...। क्या हम अपने कलाकारों को यहीं खत्म करते जा रहे हैं... क्या हमारी लोक संस्कृति यूं ही धूल धूसरित हो जाएगी...। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के यूथ एंड कल्चरल अफेयर्स कार्यक्रम के निदेशक रहते अनूप लाठर सर ने जो कोशिशें की... उनके ज़रिए हरियाणा की अगली पीढी अपनी इस विरासत से रूबरू तो हुई... पर कब तक और किस हद तक... जो बातें मैने ऊपर लिखी... वो जब जीवन में घटती हैं तो फिर तमाम संस्कृति-प्रेम कहीं विलुप्त सा हो जाता है... और सारी कहानी दो जून की रोटी के जुगाड़ तक सिमट जाती है। एक पहाड़ी राज्य है उत्तराखंड... गढवाली और कुमाउंनी 
वहां बोली जाने वाली भाषाएं हैं... अब से कुछ वक्त पहले ये दोनों बोलियां थी... लोकसभा में सांसद रहते श्री सतपाल जी महाराज ने कोशिश की और दोनों बोलियां भाषाएं बन गई....। ये बात यहां इसलिए लिखी क्योंकि हरियाणा की बोली हरियाणवी को आज इस सम्मान की ज़रूरत है। सवाल पर इस बात को लेकर है कि ये 
कोशिश करेगा कौन। प्रदेश के कॉलेजों में हरियाणवी पढाई जा रही है... महाराजा हर्षवर्धन के काल में लिखे गए ग्रंथ में हरियाणव नाम की लिपी का ज़िक्र है... लोक नाट्य सांग की अनेकों अनेक रचनाएं और हर मौके के लिए गाए जाने वाले लोक गीतों का अगर संकलन कर लिया जाए तो तमाम ऐसे दस्तावेज़ तैयार हैं जो हरियाणवी को भाषा का दर्जा दिला सकते हैं। हरियाणा एक हरियाणवी एक का नारा मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दिया है। बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। और इसी से अगर हरियाणा की लोक संस्कृति के पुनरुत्थान को जोड़ दिया जाए तो शायद कहीं कोई गलती नहीं है। और ये वक्त की ज़रूरत है... ज़रा सोचिए हमारे हरियाणा का लोक नाट्य सांग... लेखन शैली और प्रस्तुतिकरण में अंग्रेज़ी के मशहूर लेखकों के लिखे नाटकों से किस मायने में कम है.... सांग में रागनी गायन और कहानी के मुताबिक अदाकारी का मेल होता है... तो अंग्रेज़ी के उस वक्त के लिखे नाटकों में भी यही शैली अपनाई गई है... मंच की अगर बात करें तो रंगमंच के मूल मंच जिसमें चारों ओर दर्शक बैठते हैं... उसकी अभिकल्पना सांग में आज भी है...। बॉलीवुड में हरियाणा का परिवेश नज़र आ रहा है... हरियाणवी में डायलॉग्स बुलवाने की कोशिशें की जा रही हैं... हरियाणवी करेक्टर्स को बड़े परदे पर उतारा जा रहा है। इस सबके बीच हरियाणवी एक भाषा के तौर पर अगर स्थापित हो जाए तो हमारी लोक संस्कृति के संरक्षण और पुनरुत्थान में ये कितना बड़ा कदम होगा इसका अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है। बोली-भाषा स्थापित होगी तो लोक कलाकारों को और बेहतर पहचान मिलेगी। हरियाणा की पहचान का एक नया पहलू स्थापित होगा। देश के साथ साथ विदेश में हमारे कलाकारों को मंच मिलेगा। और कलाकार सिर्फ एक अकेला शख्स नहीं होता... उसके साथ जुड़ा होता है उसका परिवार... उसका समुदाय... जो भी सरकार कलाकारों के हित में कोई बड़ा कदम उठाएगी... उसे इन सबकी दुआएं मिलेंगी...। बहुत सी योजनाओं के लिए सरकार अलग से बजट बना देती है। देश की राजधानी में अलग अलग राज्यों की अपनी अकादमियां हैं... पंजाबी, हिंदी, ऊर्दू की साहित्य अकादमी तो हैं ही, मैथिली और भोजपुरी से जुड़ी बड़ी संस्थाएं भी कार्यरत हैं... तो फिर दिल्ली के सबसे नज़दीकी राज्य हरियाणा की ऐसी पहचान क्यों नहीं...। जिस राज्य पंजाब से अलग होकर हरियाणा बना है, लोक संस्कृति के मामले में हरियाणा उसी पंजाब से किसी मामले में कम नहीं... पर पंजाब के कलाकारों और पंजाब की संस्कृति को जो मंच मिला वो हरियाणा को नहीं... क्या हम अपनी संस्कृति और इससे जुड़े लोगों को आम जनता के जीवन में सिर्फ गाने बजाने की संकुचित परिभाषा से निकालकर एक सम्मानजनक स्तर दे सकते हैं। क्या हम ऐसी कोशिश कर सकते हैं जो पूरे देश और दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाए... मौजूदा सरकार से बहुत सी अपेक्षाएं हैं... वो भी इसलिए क्योंकि इस सरकार ने हरियाणा एक हरियाणवी एक की बात कहकर एक सार्थक पहल की है... क्या ये अपेक्षाएं पूरी होंगी...। इंतज़ार हरियाणा के हज़ारों हज़ार युवा कलाकारों के साथ साथ संस्कृति के उन ध्वजवाहकों को भी है जिन्होंने खुद को समर्पित कर दिया इस मिट्टी की खुशबू को बचाए रखने के लिए।                       

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