Saturday, November 7, 2015

मौजूदा पंजाब : संवाद और विवाद

1699 में श्री आनंदपुर साहिब की पवित्र धरती से खालसा के रूप में दुनिया के सामने आया सिख धर्म... अपने 300 साल से ज़्यादा वक्त के इतिहास में कई तरह के उतार चढाव से गुज़रा है... वहीं दूसरी तरफ दुनिया के राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा जिस व्यवस्था को अपनाया गया, वो है लोकतंत्र। अब इन दोनों बातों को एक साथ रख कर देखा जाए तो दुनिया का सबसे आधुनिक धर्म... सबसे सशक्त राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र को अपने अंदर लागू करता रहा है। छठे सिख गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के मीरी पीरी के सिद्धांत के ज़रिए राजनीति और धर्म में संतुलन बना रहे और राजनीतिक ताकतों का प्रभाव धर्म पर ना हो... इस कोशिश को अंजाम देने की प्रक्रिया सिख धर्म के अंदर वर्णित है...। इतिहास गवाह है कि जब जब सिख धर्म ने किसी भी तरह के मुश्किल दौर का सामना किया तो पंथ को मानने वाले तमाम लोगों ने एक साथ मिल बैठ कर विचार किया और इस विचार चर्चा को ही नाम दिया गया सरबत खालसा... सरबत यानि सबकी राय...। पंजाब में बीते कुछ वक्त में जिस तरीके से श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के तमाम मामले सामने आए हैं उसने सामाजिक समरसता को लेकर कई तरह की आशंकाएं शुरु कर दी हैं। जिस तरह का घटनाक्रम पंजाब के साथ साथ पूरी दुनिया में रहने वाले सिखों ने बीते दिनों देखा है उससे कई तरह के सवाल उनके ज़हन में खड़े हुए हैं। जिस तरीके से श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से पहले माफीनामा जारी हुआ और फिर उसे वापिस ले लिया गया उसने भी सिख समुदाय में कई संशय पैदा किए। ऐसे में पूरी दुनिया के सिखों की बात को सुनने की ज़िम्मेदारी निभाने का दावा सरबत खालसा के ज़रिए किया जा रहा है। वहीं राज्य सरकार को आशंका है कि पूरे देश में जिस तरीके से सामाजिक सदभाव को तोड़ने वाली घटनाएं हुई हैं ऐसे में सरबत खालसा के आयोजन की आड़ में पंजाब का माहौल बिगाड़ने की भी कोई छुपी हुई कोशिश ना हो... तर्क सरबत खालसा बुलाए जाने के अधिकार को लेकर भी दिए जा रहे हैं और सवाल पांच तख्तों के जत्थेदार साहिबान और पंज प्यारों से जुड़े प्रतिनिधियों को लेकर भी उठ रहे हैं... इन तमाम सवालों की तह तक जाने की कोशिश शनिवार को मुद्दे की बात में ज़ी मीडिया ने की... सवाल एक ही था सरबत खालसा पर विवाद क्यों ? शिरोमणि अकाली दल, यूनाइटेड अकाली दल, एसजीपीसी के प्रतिनिधि के तौर पर क्रमश: स. अमरीक सिंह, स. गुरनाम सिंह सिद्धू, स. निर्मल सिंह जौड़ा चर्चा में शामिल हुए तो बुद्धिजीवी और वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर स. अमरजीत सिंह ने अपनी राय रखी। कुल मिलाकर इन तमाम मेहमानों की बातचीत के आधार पर जो अब तक की कार्रवाई का निचोड़ मैं निकाल पाया उससे ये ही समझ आया कि मामला सिर्फ इतना नहीं है कि श्री गुरुग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की घटनाओं के बाद के हालात पर आपस में चर्चा के लिए ही सरबत खालसा बुलाया जा रहा हो... मामला एक बड़े स्तर पर समझने की ज़रूरत है। 2017 के विधानसभा चुनाव एकदम नज़दीक हैं क्योंकि अगर साल 2016 को आखिरी साल के तौर पर देखा जाए, जैसा कि साल 2017 में 9 मार्च तक ही मौजूदा सरकार का कार्यकाल आधिकारिक तौर रहेगा, इसीलिए अब 2015 की समाप्ति और फिर 2016 सरकार के कार्यकाल की तेज़ी का आखिरी साल है। ऐसे में जो कुछ पंजाब में मौजूदा वक्त में चल रहा है वह दु:खद है... सिख धर्म के आदि गुरु के रूप में पूजनीय श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं...। इन घटनाओं से हर कोई व्यथित है जैसा शनिवार की चर्चा में सभी ने ज़ाहिर भी किया... युनाइटेड अकाली दल के प्रतिनिधि ने भी और शिरोमणी अकाली दल के नेताओं ने भी और एसजीपीसी के प्रतिनिधि ने भी... तो फिर इस पर आपस में बैठकर विचार चर्चा क्यों नहीं... वो भी तब जब ये चर्चा सरबत खालसा के नाम पर हो रही है जिसमें सिख धर्म को मानने वाले सभी लोग शामिल हो सकते हैं...। एक पेंच तो ये है कि सभी दल इसमें शामिल नहीं है.... शिरोमणि अकाली दल के प्रतिनिधि का कहना था कि मर्यादा और परंपरा का पालन इस सरबत खालसा के आयोजन में नहीं किया गया और सिर्फ कुछ एक दल ही मीटिंग कर रहे हैं.... शिरोमणी अकाली दल के नेता का दावा था कि अगर एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त साहिब की मंज़ूरी और पांचों तख्त साहिबान के जत्थेदार की मौजूदगी में सरबत खालसा बुलाया जाता तो उन्हें कोई एतराज़ नहीं था... वहीं युनाईटेड अकाली दल का दावा था कि एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त साहिब तो बाकायदा उनकी मंज़ूरी के लिए चिट्ठी लिखी गई है... शिरोमणि अकाली दल का एक तर्क ये भी था कि क्योंकि तख्त साहिबान के जत्थेदार साहिबान की कार्यशैली को भी इस सरबत खालसा में मुद्दा बनाए जाने की बात है तो इस लिए भी वो इस आयोजन के पक्ष में नहीं है... आशंका ये ज़ाहिर की गई कि इस आयोजन की आड़ में कहीं पंजाब का माहौल ना खराब हो जाए... वहीं यूनाइटेड अकाली दल के प्रतिनिधि का कहना था कि क्योंकि पंजाब की मौजूदा सरकार लोगों के हित में फैसले लेने में नाकाम रही है और इसीलिए वो डर रही है इस आयोजन से... जिसमें जब तमाम मुद्दों पर चर्चा होगी तो सवाल ये भी उठेगा कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन के बावजूद गुरु की नाम लेवा संगत पर पुलिस ने सख्त कार्रवाई क्यों की ? सवाल उस हालात को लेकर भी उठाए गए जिसमें इतिहास में पंजाब के अंदर ही हुई कार्रवाई में राजनेताओं की खामोशी  संदेह के घेरे में थी... पर क्योंकि चर्चा का विषय इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान परिस्थिति है तो ये विषय दिग्भ्रमित करने वाला हो जाता... खैर, पूरे हालात में एसजीपीसी प्रतिनिधि से जैसे जवाब की आस समाज और सिख समुदाय को है, वैसा नज़र नहीं आया। एसजीपीसी आयोजन का विरोध इस तर्क के साथ तो करती रही कि श्री अकाल तख्त साहिब से मंज़ूरी नहीं ली गई, पर एक तटस्थ संस्था के तौर पर जबकि सिख समुदाय के सामने कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं... ऐसे में सिखों की प्रतिनिधि संस्था के तौर पर खुद एसजीपीसी ने सरबत खालसा बुलाकर एक ही मंच पर तमाम विचारकों को इकट्ठा होने का मौका क्यों नहीं दिया गया... ये वो सवाल था जिसका सीधा जवाब एसजीपीसी प्रतिनिधि निर्मल सिंह नहीं दे पाए... इसके पीछे एक वजह उनकी राजनीतिक मजबूरी यानि शिरोमणि अकाली दल के बाहुल्य वाली एसजीपीसी की एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी का सदस्य होना हो सकता है... पर मेरा निजी तौर पर मानना ये है कि जब आपको सिख धर्म की प्रतिनिधि संस्था का सदस्य सिख समुदाय ने चुन लिया तब आपको राजनीतिक विचारधारा नहीं बल्कि सिख धर्म की भलाई से जुड़े कदम उठाने में अहम भूमिका निभानी चाहिए... दुख की बात ये कि ऐसा नहीं है... अगर कहा जाता है कि बहुत कुछ गलत हो रहा है... तो जब तक आपस की बातचीत के ज़रिए कोई हल निकालने की ज़िम्मेदार और सजग कोशिश सिख धर्म की सर्वोच्च संस्था एसजीपीसी नहीं करेगी तब तक एक आम साधारण सिख को ये सवाल लगातार परेशान करता रहेगा कि वो क्या करे.... सिख होने के नाते पंथ के सरबत खालसा में शामिल हो और गुरमता बनाने में अपनी भूमिका निभाए ... या श्री अकाल तख्त साहिब के प्रति श्रद्धा पूर्वक सीस झुका कर अपनी आस्था को डांवाडोल होने से रोके... अमरजीत सिंह के शब्दों में कहूं तो.. "बीमारी तो सब जान रहे हैं... पर मुश्किल ये कि इलाज हर कोई अपने तरीके से करना चाहता है.... गोली हर कोई अपने पन्ने वाली देना चाहता है...."। धर्म संवाद की राह है, विवाद की नहीं... ये बात हर शख्स को आज समझनी होगी शायद तभी गुरु साहिबान के दिखाए रास्ते पर दृढता से चलने में समूची कौम कामयाब हो पाएगी... 

गगन दीप चौहान


(नोट : ये लेख पंजाब में मौजूदा हालात पर विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों से हुई बातचीत पर आधारित है। कृप्या किसी भी विचार को अन्यथा ना लिया जाए)

 
  

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