Sunday, November 8, 2015

जो जीता, वो सिकंदर ! जो हारा, वो......

इससे पहले कि बिहार के चुनाव के संदर्भ में इस पंक्ति को दोहराएं आपसे निजी ज़िंदगी के कुछ पल साझा करना चाहता हूं... जिन पलों में इस लाईन की अहमियत हमने समझी थी... अपने कॉलेज के दिनों में कई भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का मौका मुझे मिला... और इन्हीं मुकाबलों के दौरान दूसरे कॉलेज के साथी मिले जिनमें से कई अच्छे दोस्त बन गए... एक फैक्टर हम सभी में कॉमन था कि हम सभी कहीं ना कहीं, किसी ना किसी तरीके से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग की साहित्यिक कार्यशालाओं में प्रतिभागी रह चुके थे... चाहे विनीत हो... सौरभ हो... या फिर मैं खुद...। बात मुकाबलों की आती तो आपस में ही एक दूसरे से गलाकाट प्रतियोगिता करते...। फिर जीत तो एक को ही मिलनी थी... जो जीत जाता वो दूसरों को दोस्ती में समझाता... अरे कोई बात नहीं मैं जीता या तू बात तो एक ही है... तब हम सब एक ही बात कहते... देख जो जीता वो सिकंदर... जो हारा वो बंदर.... यानि वक्त और आवाम सिर्फ जीते हुए शख्स के चेहरे ही याद रखता है... मुझे याद है कि गवर्नमेंट कॉलेज हिसार में 23 जनवरी को होने वाली भाषण प्रतियोगिता में विनीत फर्स्ट आया था और मैं सेकिंड... बाद में जब हम दोनों बात कर रहे थे तो मुकाबले की तैयारियों के ज़िक्र में विनीत ने बताया कि यार मैने तो अजय देवगन वाली भगत सिंह की फिल्म देखी थी और सुबह यहां आ कर उसी फिल्म को रि प्रोड्यूस कर दिया भाषण की तरह... मैं हैरान था कि मैं नाहक ही किताबों से पढकर तैयारी करता रहा... आइए अब बिहार चलते हैं... बिहार के चुनाव नतीजों ने छुट्टी के दिन बीजेपी और सहयोगियों को कार्यालय में जहां खामोशी से बैठ ये सोचने के लिए मजबूर किया है कि आखिर कमी कहां रह गई तो वहीं लालू-नितीश की जोड़ी से जुड़े लोग जश्न में मशगूल हैं... तमाम टीवी चैनलों पर आपने तस्वीरें देखी होंगी... नितीश लालू के मिलन की... इन तस्वीरों को एक मिनट के लिए अगर रोक लें और फिर गौर करें लालू और नितीश कुमार की बॉडी लैंग्वेज पर तो आपको एक फर्क नज़र आएगा... लालू जहां पूरी तरह उत्साह में लबरेज़ हैं वहीं नितीश खामोश और कुछ सोच में डूबे हुए... चुनाव प्रचार के बाद की थकावट नितीश के हावभाव की वजह हो सकती है पर राज्य के सीएम का ओहदा जिस शख्स को मिलने जा रहा हो उसे परेशानी क्या.... परेशानी है... परेशानी सहयोगी हैं... जिनके साथ आने वाले 5 साल तक बिहार पर राज करना है.. नितीश जिस सोच के साथ इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में उतरें और साथ ही अगर ये भी जोड़ लें कि मुलायम सिंह यादव महागठबंधन से जिस सोच को लेकर दूर हुए वो एक सी हैं... 2019 के लोकसभा चुनाव में तीसरे मोर्चे का पीएम कैंडिडेट... राजनीति की बिसात पर दूर की गोटी खेलने वाले नेताओं की कोशिश कुछ ऐसी ही थी कि देश के बड़े राज्य बिहार में जीत के ज़रिए पूरे देश में खुद को एक बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर लिया जाए.... ऐसा ना होता देख ही मुलायम सिंह महागठबंधन से दूर हुए... अब लालू और नितीश की जोड़ी की सरकार बनने जा रही है तो नितीश के माथे पर फिक्र की लकीर की वजह भी लालू ही हैं.... लालू यादव का अक्स और उन पर लगे भ्रष्टाचार के तमाम आरोप... जिनकी वजह से लालू इस बार विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ पाए... और लालू का विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल को तौर पर उभर कर सामने आए राजद का सुप्रीमो होने के नाते किंग मेकर होना नितीश को कहीं ना कहीं ये सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि 2019 के चुनाव में जिस मौजूदा प्रधानमंत्री का मुकाबला उन्हें करना है उसके लिए एक बेहद शानदार अक्स उन्हें कायम करना होगा.... जो बेदाग़ हो... जिस पर भ्रष्टाचार का कोई इल्ज़ाम ना हो... पर लालू के सहयोगी के तौर पर क्या वो ऐसा कर पाएंगे... ये सवाल कायम है... वहीं बीजेपी के लिए ये चुनाव नतीजे संभलने का मौका हैं.... विकास का नारा लेकर बिहार गई बीजेपी करोड़ों के पैकेज की घोषणा के बाद भी कहां चूकी... क्या बीजेपी के अंदर ऑल इज़ वैल है... क्या संघ की भूमिका को स्वीकारने या नकारने या उसे लेकर तटस्थ रहने में बीजेपी को कोई राह नज़र आती है.... कुछ मित्रों का मानना है कि संघ भी अंदरखाते नहीं चाहता था कि बीजेपी चुनाव जीते.... क्योंकि ये एक जीत अमित शाह के कद को संघ के मुकाबले काफी बड़ा कर देती और संघ की भूमिका कहीं ना कहीं कमतर हो जाती... इसीलिए चुनाव के शुरुआत के वक्त में ही संघ की तरफ से आरक्षण की मांग पर एक ऐसा बयान दिया गया जिसने आरक्षण व्यवस्था पर बहुत ज़्यादा निर्भर बिहार के लिए कई सवाल खड़े कर दिए.... रही सही कसर देश भर में बीजेपी नेताओं के बीफ और बाकी के मसलों पर दिए बयानों ने पूरी कर दी... सवाल इस बात को लेकर भी हैं कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की मैनेजमैंट आखिर फेल क्यूं हुई... क्या पार्टी के कार्यकर्ता और नेता बीजेपी अध्यक्ष को पूरी तरह स्वीकार पाए हैं.... एक बात ये भी है कि बीजेपी, बीजेपी होने से पहले संघ का राजनीतिक विंग है... क्या ये बात अब भी उतनी ही तर्कसंगत है.... एक और बड़ा सवाल ये भी है कि आखिर अब बिहार की तस्वीर क्या होगी... क्या ये सरकार भी यूपी में पहले की 6-6 महीने वाले मुख्यमंत्रियों की सरकार की तरह काम करेगी.... लोकतंत्र में ताकत वोट की होती है... बिहार के मतदाता ने जो जनादेश इस बार दिया है उसे देखकर सैद्धांतिक तौर पर उसकी अहमियत समझ नहीं आती पर हां ये ज़रूर है कि पूरा चुनाव बाहरी बनाम बिहारी तक सिमट गया... ज़्यादातर वोट एंटी बीजेपी या कहें एंटी मोदी गया... जिसकी वजह दाल भी रही... जिसने बीजेपी की दाल नहीं गलने दी... बीजेपी ऐसे हालात में अब क्या करेगी.... शत्रुघन सिन्हा ने नतीजों की शाम जो बयान दिया उसकी एक लाईन पूरे सिस्टम को बयान कर रही है कि ''कैप्टन को ताली भी मिलती है और गाली भी...'' क्या इन चुनावों का सटीक विश्लेषण कर बीजेपी अपने आप को सही रूप में एक बार फिर सामने ला पाएगी और बिहार की नई सरकार क्या 5 पूरे साल या 2 ढाई अधूरे साल के बाद एक बार फिर जनता की अदालत में जाएगी... देखना दिलचस्प होगा... बहरहाल आगे-आगे देखिए होता है क्या....

गगन दीप चौहान              

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