Saturday, November 14, 2015

Selfie का आइडिया Click करता है...

शुक्रवार की देर रात.... हरियाणा के जींद के गांव बीबीपुर से तकरीबन साढे 12-13 हज़ार किलोमीटर दूर वेम्बले स्टेडियम में बड़ी तादाद में दर्शक मौजूद थे... ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून अंग्रेज़ियत के स्टाईल में 'अच्चे दिन ज़रूर आयगा' कहकर अपना भाषण खत्म कर चुके थे। भारतीय पीएम मोदी का भाषण अपने चरम पर था... एक घंटे के भाषण के बाद यकायक पीएम ने ज़िक्र हरियाणा का किया... एक छोटे से गांव का सरपंच... बेटी के साथ सेल्फी लेने की शुरुआत की... सेल्फी विद डॉटर से...। ये शख्स है गांव बीबीपुर के सरपंच सुनील जागलान...। सुनील से मुझे तब मिलने का मौका मिला था जब हरियाणा में चुनाव का दौर था... और मौजूदा कैबिनेट मंत्री ओ पी धनखड़ के उस वक्त के बिहार से बहु लाने के बयान पर चर्चा हो रही थी। सुनील उसी चर्चा में शामिल होने के लिए नोएडा स्टूडियो आए... चर्चा को नाम दिया गया था मोलकी... ये शब्द हरियाणा के ज़्यादातर हिस्सों में खरीदी हुई बहुओं के लिए इस्तेमाल होता है... चर्चा खत्म हो गई... सुनील से उसके बाद कुछ देर कुछ एक चीज़ों पर बात हुई...। मोलकी की समस्या पर जो चर्चा शुरु हुई थी... उसके पीछे एक बड़ी वजह हरियाणा में गिरता लिंगानुपात था...। जुलाई 2014 में इस चर्चा से एक बात तय हो गई थी कि अब कुछ करना होगा...। इसी सोच के साथ सुनील जागलान ने जो कदम उठाया वो अपने आप में पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया। सेल्फी विद डॉटर उस गांव से शुरु हुआ जहां कितनी ही महिलाएं इससे पहले सेल्फी के बारे में शायद ही जानती हों... पर सुनील जागलान जैसे युवा नेतृत्व की ये काबिलियत है कि एक गांव लगातार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना रहा है... मैं उस दिन के बाद सुनील से मिला नहीं हूं... पर हां लगातार इस गांव से जुड़ी तमाम खबरें हम तक आती रही हैं... सेल्फी विद डॉटर तो एक अलग तरह का एक्सपेरिमेंट है... एक ऐसा आइडिया जो क्लिक करता है... मार्केटिंग के दौर में जो क्लिक करता है वो चलता नहीं बल्कि दौड़ता है... पर सिर्फ यहीं तक नहीं है...सुनील ने एक्सपेरिमेंट की एक सीरीज़ शुरु की है... गांव की गलियों और सड़कों का नाम बेटियों के नाम पर रखा गया है... घरों के बाहर नेमप्लेट पर बेटियों का नाम लिखा गया है.... यानि कुल मिलाकर अगर कहूं तो जैसा ताजा तस्वीरों में नज़र आया बीबीपुर वाकई एक आदर्श के तौर पर सामने आ रहा है...। पर सवाल अलग है... अकेला बीबीपुर ही क्यूं... बाकी के गांवों का क्या होगा... 6800 से ज़्यादा गांव हरियाणा में हैं... क्या सारे गांवों में लिंगानुपात को लेकर हालात सही हैं... गांवों में ही क्यों शहरों में भी क्या हालात सुधर गए हैं... रिपोर्ट्स बताती हैं कि ज़्यादा मुश्किल शहरों में है क्योंकि पढाई के साथ साथ ऐसे कई रास्ते पता लग चुके हैं जिनसे पढे लिखे परिवार जब तक नवजात बच्ची का मुंह ना देखना चाहें उसे कोख में मारते रहें....। कानून का काम जो है वो करता रहेगा... एनडीपीएस एक्ट लागू हो चुका है... गिरफ्तारियां हुई हैं... दोषी डॉक्टरों के करियर पर तलवार लटकी हैं... प्रचार प्रसार के ज़रिए.. इश्तिहार के ज़रिए जागरुक किए जाने के तमाम साधन अपनाए जा रहे हैं... यहां तक कि पूरे देश के लिए बेटी बचाओ बेटी पढाओ योजना की शुरुआत पीएम हरियाणा से करते हैं.... पर इस सबसे क्या... अगर हम अपनी सोच ही नहीं बदल पाए... सोच और विचार के दो स्तर होते हैं.... एक आधुनिक है नई पीढी... और एक पुरातन है... हमारे बुज़ुर्ग... किसी समाज के विकास की जब बात आती है तो सिर्फ एक के आगे बढने से कुछ नहीं होगा... वक्त गवाह है कि दरख्त वो ही मज़बूत रहता है जिसकी जड़ें गहराई पकड़ती हैं.... सुनील अपनी उम्र के बाकी युवाओं के लिए एक बेहतरीन उदाहरण हैं... मुझे याद है जब मैं कैथल मे कॉलेज की पढाई कर रहा था... दर्शन सिंह उस वक्त में सर्व सम्मति से गांव मालखेड़ी के सरपंच बने थे... उस वक्त में सोशल नेटवर्किंग साईट्स और स्मार्ट फोन का इतना ज़्यादा प्रचलन नहीं था... पर हां मुझे अच्छे से याद है कि एक युवा सरपंच और सार्थक दिशा में लिए गए फैसलों की वजह से दर्शन सिंह उस वक्त भी सुर्खियों में रहते थे...। खैर बेटियों को असुरक्षित मानने वाले लोगों के अपने तर्क हैं... पहला तो लगातार बढते अपराध... पहला नहीं बल्कि मैं अगर ये कहूं कि अकेला ये एक ऐसा फैक्ट है जिसने दुनिया भर के तमाम मां बाप को बेटियों की सुरक्षा को लेकर आशंकित कर दिया है तो गलत नहीं है... मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं और मेरी बहुत सी सहकर्मी युवा हैं... देश के अलग अलग राज्यों से हैं... पर सब के लिए एक चीज़ कॉमन है... अगर ड्यूटी का वक्त थोड़ा सा आगे पीछे है तो ज़्यादातर अपने घर पर एक बार फोन करके अपने सही सलामत होने की खबर ज़रूर देती हैं... यानि देश की राजधानी के साथ लगते क्षेत्र में अपने दम पर रह रही बेटियों को लेकर भी मां बाप की फिक्र अभी खत्म नहीं हुई... ये एक जुड़ाव भी है जो हम शुरु से ही महसूस करते हैं अपने परिवार और घर के साथ... पर सिर्फ इतना नहीं रोज़ाना अखबारों में छपती तमाम तरह के अपराधों की घटनाओं ने मुश्किल को और बढा दिया है...। ऐसे में मां बाप के डर की आशंका जायज़ है...। पर ज़रा रुकिए और फिर सोचिए... क्या हमारी बेटियां सिर्फ इसीलिए दुनिया में नहीं आएंगी क्योंकि हमारे ज़हन में उपजा डर उन्हें आने नहीं देना चाहता... कमज़ोर हमारी बेटियां हैं या हम हैं.. जो इस बात के लिए उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाए कि बिटिया तुम अपनी रक्षा करने में सक्षम हो... जो उन्हें सेल्फ डिफेंस की परिभाषा नहीं समझा पाए... जो उन्हें नन्हीं परी और राजकुमारी तो बनाते रहे पर उस नन्हीं परी में दुर्गा की शक्ति का अवतरण नहीं करा पाए... और सिर्फ एक ही बात से उन्हें डराते रहे कि ये समाज क्या कहेगा... अगर तुम ऐसा करोगी... अगर तुम वैसा करोगी... खुद एक पुरुष होने के बावजूद मैं इस बात को अच्छे से स्वीकार करता हूं कि बेटियां हर मायनों में बेटों से बढकर होती हैं... मानसिक.. शारीरिक.. और आत्मिक स्तर पर भी मज़बूत होती हैं बेटियां...। एक बात याद आ गई... कॉलेज के दिनों में को-एजुकेशन होने के बावजूद हमारे कॉलेज में लड़के लड़कियों के साथ मिलने बैठने बात करने का माहौल नहीं था। सिर्फ वो लोग जो एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेते वो ज़रूर आपस में बातचीत कर लेते थे। मैं रंगमंच से जुड़ा हुआ था.. कॉलेज का पहले साल से ही थियेटर करने का मौका मिलता रहा और फाइनल इयर तक आते आते एक ऐसा थियेटर ग्रुप हमने कॉलेज में बना लिया था जिसमें लड़के भी थे लड़कियां भी... हम लोग साथ बैठते... बातें करते...। बात ये है कि एक सही सोच.. सही नज़रिया हमें बेटों में विकसित करना होगा... बेटियां सुरक्षित हैं... रक्षित हैं.. अगर बेटों की सोच हम सही कर पाए...। हमें अपने बेटों को ये सिखाने की ज़रूरत है कि लड़कियां भी तुम्हारी ही तरह इसी धरती पर आई हैं... उनसे वैसा ही व्यवहार करो जैसा एक सभ्य समाज में तुम खुद के लिए चाहते हो... हरियाणा में एक अजीब सी बात.. जो कई बार चुभती है... वो ये कि कुछ एक लड़के, लड़कियों को देखते ही ऐसा रिएक्ट करेंगे जैसे वो लड़के नहीं बल्कि जंगल से लाए गए चिम्पांजी हैं और वो लड़कियां नहीं बल्कि आसमान से उतरी परियों की कहानियों की नायिकाएं हैं... अजीब से चिल्लाएंगे.. चीखेंगे... और सच बताऊं तो इन चीखने चिल्लाने वालों में इतना दम नहीं होता कि कहीं भी अपना परिचय तक भी ढंग से दे दें... ये भी उसी खेत की पौध जैसे होते हैं जहां इनके दिमाग में सिर्फ एग्रीकल्चर भर दिया जाता है... एक पुरुष प्रधान समाज का वंशज होने के नाते...। ये तमाम संस्कार, लिहाज, तहज़ीब, सलीका परिवार से आता है। परिवार में अपनी ही बहन से ढंग से बात ना कर पाने वाला बाहर आकर दूसरों की बहन बेटियों से भी सही बर्ताव कर ही नहीं सकता। ये सच है... पर क्या ये सब ऐसे ही रहेगा... नज़रिया और सोच तो बदलनी होगी ना... हम लोगों की मुश्किल ये है कि हम जिस चीज़ के लिए अभी तैयार नहीं हो पाए थे वो तेज़ी से हुई है... वो है फ्लो ऑफ इन्फॉर्मेशन... जिस पर कोई स्कैनर नहीं है... सब कुछ एक तेज़ बहाव जैसा आ रहा है.... और हम सिर्फ उसमें बहे जा रहे हैं... हमारे युवा भी... जिन्हें स्कूल के बाद और कॉलेज की शुरुआती पढाई के बीच ये सब तो पता लग गया कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में लाईफ स्टाईल क्या है... पर वो अपने आप को ज़हनियत के तौर पर उतना मज़बूत नहीं कर पाए जहां से वो लड़कियों को लेकर अपनी सोच को एक सही दिशा में रख सकें... एक लड़की एक लड़के की सबसे अच्छी दोस्त होती है... ये बात 16 आने सच है सही है... पर दोस्ती के इस भाव को समझने की ज़रूरत सबको है... उन तमाम लड़कों को भी जो सिर्फ गर्लफ्रैंड शब्द के सीमित मायनों तक उलझे हुए हैं... और उन माता पिता को भी जिनके लिए लाडले और लाडली में कोई फर्क ना होते हुए भी बेटियां सेफ नहीं हैं... भावनाओं और विचारों का आदान प्रदान दोस्ती होता है... ये समझ विकसित करें और जो शुरुआत सुनील जागलान ने सेल्फी विद डॉटर के ज़रिए की है उसे अपने युवा साथियों से मैं उम्मीद करूंगा कि सेल्फी विद फ्रैंड के तौर पर सार्थक तरीके से आगे लेकर जाएं... अगर हम लड़के और लड़कियों की दोस्ती को सिर्फ दोनों के बिगड़ने का ही नाम दे रहे हैं तो इन्फॉर्मेशन का जो फ्लो, अनचाही सूचना का जो बहाव आ रहा है वो खतरनाक होगा.. समाज के लिए, संस्कृति के लिए, सभ्यता के लिए... सोच को विकसित करें... और विचारों का दायरा बढाएं.... बुज़ुर्गों से अपेक्षा है कि युवाओं को समझें... और युवाओं से अपेक्षा है कि उम्मीदों पर खरे उतरें...। एक बात याद रखें कि पूरा दिन कहीं भी रहकर शाम को घर आएं तो नज़र झुकानी ना पड़े...। मेरे डैडी ने एक अच्छी बात जो हमारे परिवार में हमें सिखाई वो ये कि जब बाप का जूता बेटे के पांव में आ जाए तो दोनों दोस्त हो जाते हैं... अपने डैडी से हमारी ये दोस्ती हमेशा कायम है... कुल मिलाकर ये कि बदलाव की शुरुआत हो सकती है शुचितापूर्ण आचरण और विचार के साथ... और इस शुरुआत का जुड़ाव दोनों चीज़ों से है युवाओं की ऊर्जा और बड़ी उम्र का तज़ुर्बा... आइए दोनों के बीच अलगाव ना हो और दोनों का मेल हो ऐसा प्रयास करें ताकि अतीत को सम्मान, वर्तमान को समाधान और भविष्य को दिशा निर्देश मिले... ऐसा होगा ज़रूर ये तय है...।               

गगन दीप चौहान

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