Saturday, November 28, 2015

...इतना डरते हैं तो.....

पिछले कुछ वक्त से देश में एक अलग तरीके की बहस चल रही है... ये बहस ना तो महंगाई और गरीबी के आंकड़ों पर है.. ना ही मुद्दा भ्रष्टाचार का है... ना बात देश के पढे लिखे नौजवानों के भविष्य की है... बात सिर्फ एक है कि आप डरते हैं या निडर हैं.... क्या अपने डर और निडरता की परिभाषा सिर्फ इतनी ही है कि कोई आकर हमे मार जाएगा ये हमारा डर है और हम किसी से भी नहीं डरते.... किसी के बाप में दम नहीं कि हमें कुछ कहे ये निडरता है... बात आगे बढी तो तमाम परिभाषाएं तय कर दी गई.... जो डरते हैं उन्हें कहां जाना चाहिए ये भी तथाकथित निडर लोगों ने बता दिया और जो नहीं डरते उन साधारण से दो आंख, दो कान, एक नाक वाले मनुष्यों की तुलना खूंखारतम माने जाने वाले, तीखे दांतों वाले, और एक पूंछ वाले शेर से भी कर दी गई... बिना ये सोचे समझे कि जंगली दुनिया से वैज्ञानिक युग तक आने में कितनी ही इंसानी पीढियों का श्रम लगा है... एक झटके में इन्सान को जानवर के टाईटल्स देकर महिमा मंडित किया जा रहा है... दौर ही ऐसा है कि डरने की बात और देश की असहिष्णुता (असहनशीलता) की बात वो लोग कर रहे हैं जिनके चारों तरफ किसी भी सार्वजनिक जगह पर 8-10 हट्टे कट्टे बाउंसर्स का ग्रुप होता है और निडरता और देश के सहिष्णु (सहनशील) होने की बात वो कर रहे हैं जिन्होंने शब्दों की मर्यादा की तमाम सीमाएं लांघ दी...  पूरी तस्वीर एक साथ रख कर देखें तो लगता है एक पागल ने आप के उपर पत्थर फैंका और आपने हाथों में पत्थर उठाकर उस पागल की ओर निशाना तान दिया और दूर कहीं बैठा एक शख्स ये सब देखकर सिर्फ ये ही सोचता है कि देखो कैसे पागल हैं... एक दूसरे पर पत्थर फैंक रहे हैं... हुज़ूर अगर डर और निडरता की असल तस्वीर देखनी है तो उस मुफलिस की आंखों में झांक कर देखिएगा जिसका सबसे बड़ा डर है कि आज की शाम वो अपने परिवार को दो रोटी खिला सकेगा या नहीं... और निडरता भी उसी शख्स की आंखों में ही नज़र आएगी जो अपने परिवार के लिए रोज़ी रोटी का जुगाड़ करने के बाद उसके पास उनकी हिफाज़त के लिए बैठता है... गली के कुत्तों से... कि कहीं कोई उसकी रोटी छीनकर ना ले जाए... बात छोटी लग सकती है... लेकिन सच यही है... असल में हमने अपनी सहूलतों के हिसाब से परिभाषाएं गढ़ ली हैं तमाम विषयों की... सच को ना हम स्वीकार पा रहे हैं और ना ही नकारते हैं... एक बड़ा सच ये है कि समाज में अपराध हर दौर में हुए हैं... अपराध का ग्राफ कम या ज़्यादा हुआ इससे आम आदमी को फर्क नहीं पड़ता उसे इस बात से फर्क पड़ता है जब वो रोज़ाना ब्लात्कार, चोरी अपहरण की वारदातों के बारे में सुनता और पढता है... ये एक ऐसा सच है जिसे स्वीकार करने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए... वहीं ये भी एक सच है कि गाहे-बगाहे ऊल-जुलूल बयान देकर अजीब सी बहस शुरु करने से खास कर बड़े चेहरों को बचना चाहिए... ये देश सब का है... सभी इससे प्यार करते हैं... किसी के लिए मादरे वतन है तो किसी की मातृभूमि... शब्दों का फर्क ना तो इस देश के लिए दिलों के प्यार को खत्म कर सकता है और ना ही इस देश की भौगोलिक स्थिति को बदलता है... संकीर्णता के दायरे से सभी को निकलना ही होगा... अगर देश को विस्तार की ओर ले जाना है... 

आखिर में डरने वालों और निडर लोगों के लिए 

लोग हर मोड़ पर रुक - रुक के संभलते क्यों है 
इतना डरते है तो फिर घर से निकलते क्यों है 

मैं ना जुगनू हूँ दिया हूँ ना  कोई तारा हूँ 
रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं 

'राहत इंदौरी'
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एक राह के हैं मीत, मीत एक प्यार के
एक बाग के हैं फूल, फूल एक हार के
देखती है यह जमीन, आसमान देखता
आसमान देखता......
कर्म हैं बंटे हुए पर एक मूल मर्म है
राष्ट्र भक्ति ही हमारा एक मात्र धर्म है...
कोटिकंठ साधकों का... एक राष्ट्र देवता...
'भारत विकास परिषद्'
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आइए

नफरत नहीं, प्यार फैलाएं... सदभाव जगाएं

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