मसान : पहली बार जब सुना कि इस टाइटल से फिल्म है... और कई फेस्टिवल्स में भी जा चुकी है... तो लगा कि मसान यानि शमशान के इलाके में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी का ताना बाना होगा... और फिल्म.... डॉक्यू़ड्रामा जैसी कुछ होगी.... हम कुछ चीज़े सोच लेते हैं ना.... बस वही सोच थी... देखकर काफी कुछ समझ में आया... लीक से हटकर एक ऐसी कहानी जिसे बेहद शानदार अंदाज़ में बुना गया है... आपने अब तक की फिल्मों में हीरो हीरोइन का मिलना दोनो का साथ जीना साथ मरना देखा होगा पर मसान अलग है.... शमशान घाट के कैनवास से उठा एक लड़का फिल्म में अपनी प्रेमिका के साथ पहली मुलाकात में ही एक अलग छाप छोड़ता है... "कोई लड़की 5 रुपए की नमकीन के लिए इतना हल्ला भी तो नहीं करती..." डायलॉग्स में दम है... अदाकारी की बात करें तो संजय मिश्रा बाकी के कलाकारों से काफी आगे खड़े हैं.... हालांकि कहीं कोई कमतर नहीं है... पर संजय बेहतरीन हैं... एक और नज़रिया इस फिल्म को लेकर है... ये फिल्म एक अंगूठी का सफर लगती है... एक उच्च मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की को बचपन में ही जन्म दिन पर दी गई अंगूठी हाथ की उंगली में फंस जाती है.... वहीं अंगूठी क्लाइमेक्स में एक हीरो के हाथों हीरोइन के दाह संस्कार का बैकग्राउंड बनकर उभरती है... फिर वही अंगूठी उसी हीरो की ज़िंदगी से तमाम पुरानी यादों को पीछे छोड़ आगे बढने की कोशिश और फिर वही अंगूठी मुसीबत में फंसे एक पिता के लिए उम्मीद की किरण... काफी कुछ ऐसा है जो याद रहेगा... तू किसी रेल सी गुज़रती है.... ये मैने साल 2001 में हांसी में एक स्टूडेंट के तौर पर कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग की पहली साहित्यिक कार्यशाला अटेंड करते हुए सुनी थी.... फिल्म में गीत शुरु हुआ तो दिल को एक सुकून वाली खुशी मिली कि चलो बॉलीवुड में फिर से सार्थक गीतों का चलन शुरु होता नज़र आता है... फिल्म के बाकी गीत भी अच्छे हैं... छूने वाले हैं... फालतू नहीं हैं.... अच्छा सिनेमा देखना चाहते हैं तो मसान देखिए... कुछ कह देने की चाह या सोच या फिक्र को दिल में पाले रखना और फिर उसे कहकर एक राहत महसूस करना, इस बात का सिनेमाई चित्रण है मसान। परफेक्ट वन।
No comments:
Post a Comment