मेरे शब्द नाचने से डरने लगे हैं
निज़ाम खुश है दिन फिरने लगे हैं
वक्त था जब आँधी का अ लिखने से
खबर आती थी दरख्त गिरने लगे हैं
अब परिंदों का चालान काटेंगे जनाब
आदमज़ात आसमान में उड़ने लगे हैं
क्या कभी खबर आएगी शरीफों की
सुर्खियों में अब बदमाश छपने लगे हैं
आसमान चुप,हवा खामोश,अजब सन्नाटा
बहुत दिनों बाद दिन डरने लगे हैं
गगन
No comments:
Post a Comment