Monday, October 10, 2011

जगजीत...... शायद....

तुमने जग को जीता अपने सुरों से संगीत के जादू से... तुम्हारी आवाज़ में मखमली अहसास था जिसे हर उस शख्स ने महसूस किया जिसके हमनवां तुम तब तब बने जब उसे ज़रूरत थी... फिर ये सफर चाहे खुशियों से भरा हो या रास्तों में ग़म के काँटे रहे हों... जिस गीत को, ग़ज़ल को तुम्हारे होठों ने छू लिया वो अमर हो गया... बेशक तुम खुद आकाश के सूनेपन को महसूस करते रहे... खुद के ग़म को छिपाते रहे लेकिन खासियत यही थी कि हर हाल में मु्सकुराते रहे.... ज़िंदग़ी की किताब के हर वरक से आहिस्ता आहिस्ता नक़ाब सरकता गया... इस मुकम्मल सफर में तुम सभी के साथ रहे... ग़ज़ल गायकी की इस दुनियां में बहुत से चेहरे देखे बहुत सी आवाज़े सुनी लेकिन हर बार ज़हन में एक ही बात आती थी किसका चेहरा अब मैं देखूं तेरा चेहरा देखकर... मेरी आँखों ने चुना है तेरी आवाज़ को दुनिया देखकर..... क्या आवाज़ को देखा भी जा सकता है... ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सिर्फ तुम हो... एक दोस्त की दोस्ती का अहसास थी तुम्हारी आवाज़... तुम पूछते थे प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगे... और जवाब बस एक ही होता था तुमको देखा तो ये ख्याल आया... ज़िंदग़ी धूप तुम घना साया.... लेकिन अब दिल बार बार एक ही बात कह रहा है... तुम चले जाओगे तो सोचेंगे हमने क्या खोया और क्या पाया... ज़हन में कई सवाल हैं.... बहुत पहले से तुम कदमों की आहट जान लेते थे... ज़िंदग़ी को तुम दूर से पहचान लेते थे फिर तुम्हे कोई ऐसी जगह कैसे ले जा सकता है जहाँ ना चिट्ठी ना कोई संदेस.... खुद के बचपन के सावन, काग़ज़ की कश्ती और बारिश के पानी को तुम फिर से हासिल कर गए होगे... लेकिन इस दिल को कैसे समझाएं...जो ज़िंदग़ी की राह में इस कदर मजबूर हो गया कि इतने हुए करीब के हम दूर हो गए....फराज़ के अल्फाज़ ही कुछ सहारा दे रहे हैं.. जो गए हैं वो फिर कब लौटे हैं फराज़, फिर भी तू इंतज़ार कर शायद.....

1 comment:

  1. ऐसी पोस्‍ट के साथ संबंधित चित्र का प्रयोग करेंगे तो ज्यादा प्रभावी बन पडेगा.

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