बापू हैप्पी बर्थडे।
कैसे हो... ये तो नहीं पूछूँगा...
मालूम है दुखी होगे
हो भी क्योँ ना
आखिर हमारी पीढी ने ऐसा कौन सा तीर मारा है जिसे देखकर तुम्हे खुशी हो।
सिवाए इसके कि रामलीला मैदान में दो लोक नेताओं की लीला का परदा उठाया है और गिरा भी दिया। अंदाज़ बेशक अलग थे... एक की शुरूआत भूखे रहने के अनशन से हुई हालाँकि भूख असल में किस चीज़ की थी अभी भी इस पर बड़ी बहस शुरू हो सकती है। लेकिन जैसी नीयत वैसी बरकत बचपन से सुना है... तो नीयत में गड़बड़ी थी... ना बापू ना... हम तो कह नहीं सकते लेकिन कहीँ ना कहीँ तो कुछ ना कुछ तो था। तभी तो रामलीला मैदान में परदा उठने के बाद एक रंग में नज़र आए लोक नेता के चेहरे का रंग वर्दी के रंग को देखते ही उड़ गया... खैर ज़ख्मों को कुरेदना मेरा मकसद नहीँ मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए... तो लीजिए बापू सूरत भी बदल गई और कपड़ों के रंग भी... इस बार जो शख्स मंच पर आया वो एक दम बिंदास तबीयत... सच्ची बोलूं तो कमाल का बंदा.... पहले जेल में बैठकर बिना कुछ किए वर्दी वालों को खूब डराया... बेचारे वर्दी वाले हालत ऐसी हो गई कि अब भी कोई तुम्हारे मार्का वाली यानी गाँधी टोपी पहन कर थाने चला जाए तो नीचे से उपर तक सब सैल्यूट करते हैं... बापू सच में लगा तुम कहीं ना कहीं ज़िन्दा ज़रूर हो... इतने दिनों के बाद तिरंगे को भी खुल कर लहराते हुए देखा... सो दूसरी लीला बहुत जबरदस्त लगी पर कहीं ना कहीं एक टीस ज़रूर दिल में है बापू... भारत छोड़ो आंदोलन तो 42 में चलाया था ना... इतने सालों के बाद भी नतीजा सामने नहीँ आ रहा... देख लो... इस मुल्क को छोड़ कर जाने को कोई तैयार ही नहीं ना भ्रष्टाचार, ना गरीबी, ना भुखमरी, ना बेकारी.... तभी तो सब इकट्ठे हो गए... तुम्हारे नाम पर... हाँ किसी ने ये भी मज़ाक मे कहा कि ये अहिंसा नहीँ है बल्कि हम हिंदुस्तानियोँ की हालत ही ऐसी हो गई है कि हम कुछ करना ही नहीँ चाहते... क्या वाकई ये सच है बापू... बताओ ना... तुमने तो सब देखा ही होगा ना... असल में तुम्हारी शहादत के बाद पता नहीँ क्योँ इस मुल्क में गाँधी की राह पर कदम रखने वाले हर शख्स को हर चौराहे पर एक गोडसे खड़ा नज़र आता है और फिर ज़ुबान से बस ये ही निकल जाता है हे राम...................
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