Tuesday, September 3, 2019

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है (1-6)

कभी कभी मेरे दिल में -1

For all my friends working in private sector
Let us smile for a while.
कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
कि ग़र सरकारी नौकरी मिल जाती
तो ज़िंदगी में आराम हो भी सकता था
शाम को चाय पीकर बिस्कुट खाकर
दो घड़ी आराम से मैं सो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि कहीं कोई monday, Tuesday, Wednesday
Thursday और Friday की सूरत ही नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह से ज़िन्दगी जैसे
इसे Saturday और Sunday की ज़रूरत भी नहीं
ना कोई बोनस ना इन्क्रीमेन्ट ना प्रमोशन का कोई सुराग
भटक रही है आफिस में ज़िन्दगी मेरी
इक दिन रह जाऊंगा फाइलों के ढेर में कहीं खोकर
मैं जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है

Kabhi-Kabhi Part two मुस्कुराएं

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि फेसबुक के लाइक्स और ट्विटर के ट्वीट
वोटों में बदलते तो हम सौ हो भी सकते थे
हमारी गुगली सही डल जाती तो सबको धो भी सकते थे
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई सी एम, मिनिस्टर और सीपीएस तक नहीं
जबरन मिले विपक्ष के नेता पद की हमें ख्वाहिश थी नहीं
ना कोई चुनाव नज़दीक ना ही रैली कोई
भड़ास मन की खांसी मे निकालनी होगी
अब सोच समझ के हर जगह बोलना होगा
या फिर ईवीएम में कमी खंगालनी होगी
मैं जानता हूँ मेरे वालन्टियर्स मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी-कभी पार्ट -3 इस बार आओ सोचें!

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि सारे राज-भोगी गर कर्मयोगी बन जाते
तो राम राज आ भी सकता था
विश्व गुरू बन कर भारत
दुनिया को राह दिखा भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि दया, धर्म, प्यार और प्रेम की कोई बात ही नहीं
एंटी-रोमियो बन गए वो जिनकी कोई औकात ही नहीं
ना अक्ल, ना शक्ल, ना आचार है, ना विचार,
अजब अंदाज़ में वो सबको सिखाने चले हैं सदाचार
इज्जत की जीत के बाद अब दौर ए बदनामी आएगा ?
जहाँ हर रिश्ते को शक की नजर से देखा जाएगा !
और मेरे लिखे की हकीकत वो कहां समझ पाएगा।
मै जानता हूँ मेरे दोस्त मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में - 4

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि 'कड़ी निन्दा' कहने वाला कहते ही मर जाए
उसकी लाश पे कोइ कुछ लाख मदद धर जाए
पर ऐसा अक्सर होता नहीं है,
भाषण देने वाला रोता नहीं है।
ये 'कड़ी निन्दा' मानो मिसाइल बन गया है
ना चलती हैं तोप, ये ज़ुबां पे तन गया है
संस्कृति की बात करने वाले, संस्कृत को हैं भूले
"शठे शाठ्यम समाचरेत्" पर हम झुलाते हैं झूले
ये लफ्फाजी, ये खोखला बड़प्पन हमें कहाँ ले जाएगा
देशवासी यूँ ही बेमौत मरे, तो देश कहाँ चल पाएगा
अपने ही देश में घूमने को हम इजाज़त क्यों मांगे?
विदेशों में घूमने वाला बड़ी बड़ी डींग क्यों हांके?
कोई ये ना पूछेगा कि भीड़ खामोश क्यों थी?
कोई ये ना समझेगा सियासत मदहोश क्यों थी?
पर इस बात की बार बार तोहमत लगेगी
जो बोल सकते थे, क्या सहमत थे वे भी ?
कानों से सुनना और आंखों से बस देखना
कलम को कुंद और अक्ल को मंद बना देता है
तुम्हारा बोलना इसलिए ज़रूरी है दोस्त
कि खामोश रहना ज़ुबां को जंग लगा देता है
धरती का सूरज छिपे तो भी सुबह की आस होती है
आत्मा के अंधेरे में भटकती जिन्दगी अभिशाप होती है
मैं ये वो सब तमाम बातें जानता हूँ
अपने भीतर का तमस पहचानता हूँ
हर शब्द को सौ बार छानता हूँ मेरे दोस्त मगर फिर भी
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है!

कभी-कभी मेरे दिल में-5

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
कि कई मामलों की जांच,
कमीशन वाली सियासत में ना उलझती
तो इंसाफ़ हो भी सकता था
फरेबी कार्रवाइयों पर करोड़ों खर्चने वाला देश
बेअदबी और कत्ले-आम के मनहूस दाग
अपने माथे से धो भी सकता था
मगर ये हो ना सका
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है कि
कोई जांच कोई गवाही कोई सुनवाई भी नहीं
सियासत ने कोई गुत्थी कभी सुलझाई ही नहीं
ना सरेआम नस्लकुशी करने वालों को सज़ा होती है
बेअदबी के दोषियों पे राजनीति ना एक रज़ा होती है
अदालतों में आस की डोर सांसों के साथ टूट जाती है
न्याय की देवी आंखों पे पट्टी बाँध भीतर भीतर रोती है
चंद सफेदपोशों ने हर मुद्दे को मज़ाक बना डाला है
कुरसी वालों ने वोट वालों संग किया गड़बड़झाला है
अब उम्मीद रक्खें भी तो किस से करें
उन्होंने शाही अंदाज़ से सब कत्ल कर डाला है
फिर कुछ वक्त के बाद वायदे दोहराए जाएंगे
कसमे वादे कर इंसाफ के सब्ज़बाग दिखाए जाएंगे
फिर शातिर सियासत शह और मात पहले तय कर लेगी
धर्म और जात के नाम पे लोग फिर अपनी जान गवाएंगे
और वो चलेगा कमिश्न या जांच टीम वाली फिर चाल नई
मैं जानता हूँ मेरे कपतान मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

कभी-कभी मेरे दिल में -6

कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
कि मंदी को अगर तरक्की माना जाता
तो देश में विकास का सैलाब आ ही सकता था
सब कमियों को छुपाने के लिए
मैं झूठी देशभक्ति का तराना गा भी सकता था
मगर ये हो ना सका...
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
कि कहीं पर भी प्रगति की कोई बात नहीं
रुपये की तो लगता है जैसे कोई औकात नहीं
ना जीएसटी से बदली है व्यापार की तस्वीर
लगातार गिरके बिगड़ी जीडीपी की भी तकदीर
आंकड़ों के खेल को किसी ने ऐसा घुमाया है
मेक इन इंडिया लगे गडरिए की कहानी में
झूठ मूठ वाला शेर आया है, शेर आया है
अब तो कहानी में चुप रहने वाले ने टविस्ट घोला है
हमेशा बोलने वाला चुप है जब से ये मौन बोला है
इस के सवालों का मेरे पास नहीं कोई जवाब
देखा है किसने देश के हालात किए इतने खराब
फिर भी मेरी आवाज़ पर ले आओगे चुनावी इंकलाब
अच्छे से पता है मुझे मेरे भगतों मगर यूँ ही
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है

गगन

No comments:

Post a Comment