Monday, November 18, 2019

प्यार के बीज

कि कुछ बीज
कभी खत्म नहीं होते
ज़मीं समतल या पत्थर हों
हो उर्वर या कि बंजर हो
हवा बहती ही उलटी हो
बाज़ी मौसम ने पलटी हो
ये अंकुर फूट जाते हैं
कलियाँ मुस्कुराती हैं
फूल भी खिलखिलाते हैं
बीज जिन के दिलों में
प्यार के कुदरत ने हैं बीजे
वो अक्सर मिल ही जाते हैं
चेहरे खिल ही जाते हैं
हाथों में हाथ थामे जब
देखें आंखों ही आंखों में
आंसुओं और खुशियों की
बातें हों मौन बातों में
तार जिनके जुड़े होते हैं
बिन कहे समझ जाते हैं
ये जिस्मों का नहीं बंधन
ये रूह की रूहदारी है
उम्र की हदों पर अब भी
बचपन जिनका तारी है
जो रिश्ता प्यार में डूबा
वो सब रिश्तों पे भारी है
है मासूमियत जिनकी पूंजी
सोच से पूरे सच्चे हैं
दुनिया की नज़र में बूढ़े
अंदर से अब भी बच्चे हैं
पके हों बाल और चेहरे को
झुर्रियों ने ही घेरा हो
जो बरसों बाद भी सोचें
काश ये अब भी मेरा हो
कि उनकी बोझिल आंखों में
चमक फिर आ ही जाती है
जब सिलवट ढके हाथों में
लेके कोई हाथ अदब से ही
कहो कैसे हो यूँ पूछे
तो हवा भी गुनगुनाती है
फूल फिर खिल ही जाते हैं
कलियाँ मुस्कुराती हैं
प्यार के बीज ऐसे हैं
किसी भी तौर ना मरते
किसी भी दौर ना मरते
कि अंकुर फूट जाते हैं
और वो मिल ही जाते हैं

गगन






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