आओ दोस्त
चाय पी लें
बीते लम्हे
फिर जी लें
वो
जो नुक्कड़ वाली
चाय की फड़ी है
जहां कितनी ही
यादें जुड़ी हैं
वहां बैठ
बातों का बस्ता खोलें
सपनों के कंचे निकालें
उमंगों की आंख मिचौली खेलें
आओ दोस्त
चाय पी लें
क्या कहा
मीठी नहीं
फीकी चाय
थोड़ी सी ठंडी भी हो
ये चाय है
ज़िन्दगी नहीं
बिना मीठे
और गर्माहट के
बेस्वाद लगती है
रिश्तों की नर्मी के
हम लम्हे संजो लें
आओ दोस्त
चाय पीलें
याद है पिछली बार
जब यहां आए थे
सूरज की धूप थी
थी चिड़िया की भी आवाज़
पेड़ की मंद मंद हवा ने
कैसे बदल दिया था
मौसम का मिज़ाज
खाली गिलास
देसी मट्ठी
और वो
सीमेंट के बीम का बैंच
राह देख रहा है
आज भी
आओ
एसी की ठंडक से बाहर
फिर उस रुत को जी लें
आओ दोस्त
चाय पी लें
-गगन दीप चौहान
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