नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं
रेस्तरां में पार्टी का जश्न मना
जनता का उल्लू बनाते हैं
कितने दलितों पर चला दांव
तब दिल्ली उन्हें नसीब हुई
जैसे चाहा फिर राज किया
कामयाब सभी तरकीब हुई
इनकी बातों में आकर क्यों
हम आपस में लड़ते जाते हैं
नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं
कब सदन चले कब बंद रहे
ये किस पर करता निर्भर है
ये देश चलाने वालों का
क्यों दोहरा दिखे चरित्र है
तीखे सवालों से बचने को
ये मीठी बातें बनाते हैं
नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं
धरने जिन्हें लगें ताकत की दवा
जो आम आदमी के ख़ैरख़्वाह
वो कहते कुछ और करते कुछ
चाहें मिले हमें बस वाह वाह वाह
राजनीति की नई उम्मीदों पर
वो माफी फेरते जाते हैं
नेता को दिखता वोट बैंक
इसलिए उपवास सजाते हैं
गगन
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