Sunday, April 8, 2018

खोज

बंदिशें ख़्वाहिशों का पता ढूंढती हैं
खिज़ां कलियों की खता ढूंढती है
नींद तेरे शहर में बे-ख्वाब आती है
हर दस्तक यहाँ मेरा पता ढूंढती है
है भीड़ बहुत, हमसफर भी बहुत हैं
किसे फिर निगाह हर जगह ढूंढती हैं
मेरे अहबाब लाए बगल में ही खंजर
पुलिस सबकी जेबों में क्या ढूंढती है
जो आए नहीं वादा करके अभी तक
ये पलक आँसुओं का निशां ढूंढती हैं
वो बरसेगा कब ये तो उसको पता है
फिर धरा क्यों गगन में घटा ढूंढती है

गगन

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