Sunday, April 8, 2018

क़ातिलों का शहर

खुलकर बोलने से पहले
मुंह खोलने से पहले
ज़ुबां डोलने से पहले
शब्द घोलने से पहले
जानो! यहां बरपा कहर है
ये क़ातिलों का शहर है

ज़िन्दा ना कोई यहाँ
ज़िन्दा लाशें सभी हैं
मरघट में जाकर सोई
एक पूरी सदी है
आबोहवा में यहां
नफरत का ज़हर है
ये क़ातिलों का शहर है

विश्व शांति के साधक
मौन हो गए हैं
जो कल तक थे मुख्य
आज गौण हो गए हैं
अराजकता का अंधेरा
ना इसकी सहर है
ये क़ातिलों का शहर है

धर्म संस्कृति की यहाँ
हाट लगी है
गंगाजल की बोली
घाट-घाट लगी है
पानी को भी बनाया
पैसों की नहर है
ये क़ातिलों का शहर है

राजा की नीति ने
विश्वासघात किया है
आमजन को मलाल
किसका साथ दिया है
दम तोड़ गई
यहाँ लोक लहर है
ये क़ातिलों का शहर है

गगन





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