मैं सुनना चाहता था तुम्हें
कुछ ऐसे
कि बस
तुम कहती रहो
और मैं सुनता रहूं
इंतजार कुछ सालों का था
जो सदियों सा लग रहा था
और फिर
मैंने तुम्हें सुना
जैसे सुनाई देती है
रेगिस्तान में बारिश की आवाज
जैसे घने जंगल में सुनाई देता है
कुदरत का संगीत
जैसे पूरी खामोशी में
आपका दिल आपसे करता है बात
कुछ ऐसे ही
मैंने सुना तुम्हें
एक अरसे के बाद
और हैरान हूं मैं
कि कैसे
तुमने संभाल कर रखी है
अपनी आवाज में वह खनखनाहट
जिसमें डूबा हुआ है
इस पूरे जहान का संगीत
गगन
No comments:
Post a Comment