जब द्रोपदी का सरे-दरबार
अंगुली पर बंधी पट्टी के बदले
तुमने लगा दिया अम्बार
शक्तिशाली भाई थे तुम
यह शक्ति उसे थमा देते
काश! कृष्ण तुम ऐसा करते
द्रोपदी को दुर्गा बना देते
शीलभंग करने वाले का
शीश-भंग होता प्रतिकार
ना रोती अबला बनती सबला
यह विश्व भी करता जय-जयकार
किसी दुशासन में फिर कहां दम था
जो सोच भी ले मन में व्यभिचार
त्रेता द्वापर से कलिकाल तक
यह अजब सी रीत चली आई
अब-जब नारी पर पड़े बिपता
ना आते कृष्ण ना रघुराई
देवी शक्ति के गढ़ से अब
हस्तिनापुर तक कोहराम मचा
फिर दुशासन ने द्रोपदी के
शील हरण का काल रचा
दे देते सुदर्शन चक्र उसे
दुशासन का काल बना देते
काश! कृष्ण तुम ऐसा करते
द्रोपदी को दुर्गा बना देते।
तुम नहीं करोगे तो तय है ये
जन-जन में रोष यूँ जागेगा
अस्मत का लुटेरा कोई भी हो
मौत से डरकर भागेगा
चौराहे पर जब फिर लाश टंगेंगी
ऐसे जुल्म और अत्याचारों की
शायद तब ही हो खत्म कहानी
नारी संग होते व्याभिचारों की
तुम कर्ता थे, ये दृश्य तुम्हीं
द्वापर में काश दिखा देते
काश! कृष्ण तुम ऐसा करते
द्रोपदी को दुर्गा बना देते
गगन
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