Tuesday, December 18, 2018
34 साल बाद....
महाभारत में एक पात्र है दुर्योधन... लेकिन इसी पात्र को कहीं कहीं पुत्र मोह से ग्रस्त, सत्ता पर काबिज़ रहने की इच्छा रखने वाले धृतराष्ट्र ने सुयोधन कह कर भी संबोधित किया है। सुयोधन और दुर्योधन में फर्क सिर्फ उतना ही है जितना सज्जन और दुर्जन में है। किसी का नाम सज्जन होने से वो सज्जन हो जाए ऐसा ज़रूरी नहीं... कर्म के आधार पर ही किसी की सज्जनता या दुर्जन होने का पता लगता है। 1984 के नवंबर महीने के शुरूआती तीन दिन में देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों, गलियों और तमाम इलाकों को सिखों के खून से रंग देने का जो कातिलाना खेल खेला जा रहा था... 2018 में 34 साल बाद उस के नायक तो नहीं पर खलनायक को दिल्ली हाईकोर्ट ने आखिरकार सज़ा सुना दी... वही दिल्ली जिसे कौरव पांडव हस्तिनापुर कहते थे... उसके आधुनिक इतिहास में नवंबर 1984 की एक दो और तीन तारीख को ना सिर्फ संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द को शामिल करने वाले देश के लिए एक काले अध्याय के रूप में सदियों तक याद रखा जाएगा बल्कि कितने ही ऐसे लोग जिनकी चीखें... भीड़ के सामने मजबूर होने की दुहाई.... दरिंदों के हाथों लुटती अस्मत... और मेहनत और प्यार से बसाए आशियानों से उठता धुआँ आज भी इंसानियत का दम घोट देता है। दिल्ली हाईकोर्ट के माननीय न्यायधीश ने अपने फैसले में इस कत्लेआम को मानवता के विरुद्ध अपराध करार दिया। हालांकि अदालत ने ये फिक्र भी ज़ाहिर की कि हमारे देश के अपराध सम्बंधी कानून में नस्लकुशी और मानवता के विरुद्ध अपराध जैसे शब्दों का शामिल ना किया जाना चिंताजनक है। 34 साल बाद फैसला आया तो पीड़ित परिवारों की आंखों से आंसू छलक आए... अदालत के अंदर की तस्वीरें भी कुछ जुदा नहीं थी... फैसला सुनाते हुए जस्टिस मुरलीधर की आंखे भी नम थी और मामले में पीड़ितों की पैरवी कर रहे एच. एस. फूलका भी अपने सहयोगी वकीलों के साथ आंसुओं को रोक नहीं पाए। हाईकोर्ट की आनलाईन साईट से फैसले की प्रति डाउनलोड कर पढने की कोशिश की तो कई बार भावनाओं का आवेग रोकना नामुमकिन था। आखिर कैसे कोई इंसानी भीड़ इतनी हिंसक हो सकती है कि किसी शख्स को मारने के लिए एक या दो बार नहीं बल्कि तीन-तीन बार हैवानियत का नंगा नाच खेले। सोचिए क्या बीती होगी उस बेटी पर जिसके बाबुल को उसकी आंखों के सामने भीड़ ने ज़िंदा जला दिया हो... बचने की हर कोशिश नाकाम हुई हो और आखिरकार बचे हो सिर्फ जले हुए जिस्म... किसी का धड़. किसी की टांगे... किसी की बांह... ज़्यादातर मामले ऐसे जहां कत्ल किए गए लोगों के चेहरे जला दिए गए थे... गले में टायर डाल कर ज़िन्दा जला दिया... परिवारों ने पहचान की तो बाजुओं पर गुदे हुए नाम पढकर... कलाई पर बंधी घड़ी देखकर... या फिर कपड़ों के रंग से...। अदालत के फैसले के शुरूआती कुछ पन्ने ही पढ लिए जाएं तो दिमाग सुन्न हो जाता है। आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि कैसे इतने बड़े नरसंहार को अंजाम दिया गया। और क्यों... जवाब ढूंढने की कोशिश में नवंबर महीने का ही एक सूत्र हाथ लगा... साल 1950 था... संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने संविधान सभा में जो अंतिम वक्तव्य दिया उसकी पहली पंक्ति और दूसरा पैराग्राफ काफी कुछ बयान करता है।
प्रजातंत्र को केवल बाह्य स्वरूप में ही नहीं बल्कि वास्तव में बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
....दूसरी चीज जो हमें करनी चाहिए, वह है जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को ध्यान में रखना, जो उन्होंने उन लोगों को दी है, जिन्हें प्रजातंत्र को बनाए रखने में दिलचस्पी है, अर्थात् ''अपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में भी समर्पित न करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान न कर दें कि वह संस्थाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाए।'' उन महान व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में कुछ गलत नहीं है, जिन्होंने जीवनपर्यन्त देश की सेवा की हो। परंतु कृतज्ञता की भी कुछ सीमाएं हैं। जैसा कि आयरिश देशभक्त डेनियल ओ कॉमेल ने खूब कहा है, ''कोई पुरूष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता, कोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।'' यह सावधानी किसी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में अधिक आवश्यक है, क्योंकि भारत में भक्ति या नायक-पूजा उसकी राजनीति में जो भूमिका अदा करती है, उस भूमिका के परिणाम के मामले में दुनिया का कोई देश भारत की बराबरी नहीं कर सकता। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परंतु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है।
एक बात समझ आई कि भारतीय प्रधानमंत्री मरहूम इंदिरा गाँधी के कत्ल के बाद हुए इस नरसंहार में जिन लोगों ने कातिलों का अग्रणी होने की भूमिका निभाई और जो इस बात का सहारा लेते हैं कि ये सिर्फ एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी (जबकि हकीकत इ्ससे कोसों दूर है)... वे तमाम लोग राजनीति में भक्ति या नायक पूजा के मतावलंबी तो अवश्य ही हैं या थे। और ऐसा नहीं कि राजनीति में नायक पूजा का ये दौर सिर्फ इंदिरा गांधी की मृत्यु के साथ ही शुरू या खत्म हो गया... बल्कि ये दौर अब भी जारी है। डॉ. अम्बेडकर ने उन लोगों के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर करने को कुछ हद तक सही माना था जिन्होंने जीवनपर्यन्त देश की सेवा की। पर मौजूदा दौर में एक बड़ी गिनती उन लोगों की है जो ऐसे नेताओं की अंध भक्ति में लीन है जिनका राजनीतिक कद ऊंचा तो बेशक बहुत ज़्यादा हो पर मर्यादित रूप में वे कहां किस पैमाने पर खरे उतरते हैं ये सवाल लाख टके का है। क्या नेताओं की अंध भक्ति का ये रास्ता और ऊपर से सत्ता का दुरुपयोग कर सियासत का किसी भी घटनाक्रम की जांच प्रक्रिया को प्रभावित करते जाना हमे सही मायने में दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र बना रहने देगा। शायद नहीं...
34 साल बाद हाईकोर्ट के फैसले ने बहुत सी उम्मीदों को ज़िन्दा किया है... पर इन 34 सालों में हमने गंवाया भी बहुत कुछ है इसे भी नकारा नहीं जा सकता... कितने ही परिवार ऐसे हैं जो वक्त पर न्याय ना मिलने से निराश हो कर दुनिया के दूसरे हिस्सों में जा बसे... और इसके साथ ही अपने दिलों में बसा कर ले गए एक नफरत.. देश के सिस्टम और कानून के लिए। इस नफरत का सहारा लेकर कोई भी उन्हें बरगलाए, उनके जज़्बात को छेड़ देश के खिलाफ कोई भी ज़हर उगलवाए तो उसके सामने हम बेबस से हो जाते हैं... क्यों कि उन लोगों की यादों में बसे ज़ख्म टीस देते हैं... कुछ मित्रों ने लिखा, पीड़ित परिवारों की आंखों में खुशी के आंसू.... माफी चाहता हूं पर अगर आप आंसुओं को कभी महसूस कर पाए हों तो आंसुओं में तपिश होती है.... माननीय अदालत ने जो फैसला सुनाया उससे पीड़ित परिवारों की आंखों से जो आंसू के रूप में बहा वो ऐसा दर्द था जिसे 34 साल तक वो अंदर ही अंदर पी रहे थे... आंसुओं को बाहर निकलने नहीं दिया... अंदर ही ये हलाहल इकट्ठा होता रहा... और गनीमत ये कि अब जाकर भी न्याय हुआ और दोषियों को सज़ा मिली.. तो ये लावा फूटा... इन आंसुओं की बूंदों में मैने महसूस किया एक मां का दर्द, एक पत्नी की पीड़ा, एक बहन का संताप, एक बेटी की अनकही दास्तान... खुशी नहीं.... अभी भी कितने चेहरे ऐसे हैं जिनके खिलाफ गवाही देने को बहुत से लोग तैयार हैं... ये चेहरे बहुत बड़े ओहदों पर भी पहुंचे हैं.... अगर हम वाकई चाहते हैं कि 34 साल बाद ही सही पर दुनिया हमारे देश को एक सही मायने में लोकतांत्रिक देश का दर्जा दे तो एक कोशिश अब भी करने की ज़रूरत है जिस में दुनिया के अलग अलग कोने में जाकर बसे ऐसे परिवारों को इकट्ठा किया जाए जो गवाही देना चाहते हैं... सबूत देना चाहते हैं और बताना चाहते हैं वो दर्द जिसके गुनाहगार सिर्फ एक दो चेहरे नहीं बल्कि एक पूरी की पूरी जमात है... जो आज भी धमकियां देकर, रौब झाड़कर कानून की पहुंच से बाहर है। ऐसे लोगों को निर्भय कर और इस विश्वास के साथ देश लाया जाए कि उन्हें इन्साफ मिलेगा तो शायद हम एक नई सुबह की शुरूआत कर पाएं।
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