'यार, ये कोई सिस्टम थोड़े ही है कि अगर चूहा गिरफ्त में आ गया तो उसे मार ही डालो... हां... अरे समझ में आता है कि कुछ फाइलों को नुक्सान पहुंचाया बेचारे ने... पर ऐसे थोड़े होता है कि सरेआम जान ही ले लो...' परेशानी के आलम में अपने बड़े बाबू सुबह से अब तक पता नहीं कितनी बार ये बात दोहरा चुके थे... सिलवटी चेहरे में पान और जर्दे से लाल हुए ओंठ उनके श्यामल चेहरे को मकान की दीवार पर टंगने वाले बजर बट्टू का रूप देते थे...। बस उनकी मूछें पीले रंग की नहीं थी... बाकी तो सब बिल्कुल वैसा... पलकों की सीमा रेखा को पार कर बाहर गिरने को बेताब आंखों की पुतलियां... मानो किसी ने बचपन में ही बड़े बाबू का गला दबा दिया हो और कार्टून फिल्मों के कैरेक्टर की तरह उनकी आंखें बाहर को निकल आई हों....। सरकारी दफ्तर में बाबू की कुर्सी को पिछले तकरीबन 28 साल से तोड़ने की कोशिश में लगे बड़े बाबू का ये चूहा प्रेम समझ नहीं आ रहा था...। मासूम से नए नवेले शागिर्द की तरह मैने भी आखिर पूछ ही लिया... 'बड़े बाबू ! बात क्या है... इतनी नाराज़गी... अरे एक चूहा ही तो मरा है... वैसे भी सारे दफ्तर में उसकी मौजूदगी से अजीब सी गंध भरी हुई थी...।'
'यही तो.... यही फर्क है तुम्हारी जेनरेशन एक्स वाई ज़ेड और हमारी जेनरेशन में.... हर चीज़ को बस एक ही नज़रिए से देखना.... अरे.... सोचो... थोड़ा दिमाग पर ज़ोर दो... कितना मददगार था ये चूहा सरकारी सिस्टम को चालू रखने में....।' बड़े बाबू तो बस बिफर ही पड़े।
'चालू रखने में... मतलब.... कैसे ?' सोचा नहीं था, पर एक दम मुंह से निकल ही गया, इंतज़ार किया कि बड़े बाबू आराम से ही जवाब दें।
'अरे मेरे चंदू लाल चंद्राकर... कैसे समझाऊं तुम्हें... तुम तो आए अभी हो.... साल भी नहीं हुआ... तुमसे पहले जीवन बाबू थे ना... उनकी रोज़ी बचाई थी इसी चूहे के पुरखों ने....।'
मामला मेरे लिए और ज़्यादा उलझ रहा था... चूहा और नौकरी... मतलब रॉबिन हुड टाईप चूहा... ना चाहते हुए भी चेहरे के हाव भाव में सवाल तैरने सा लगा। 'भई... जीवन बाबू ने सरकारी फाईल में हेराफेरी के ज़रिए किए थे लाखों के वारे न्यारे... जांच हुई तो फिर एक एक चीज़ की पड़ताल हुई... और सवाल जब फाईल का आया तो वो मिली ही नहीं.... जानते हो क्यों।'
'क्योंकि उसे... य... य... ये चूहा खा गया था' हैरानी के साथ आशंका के सम्मिश्रण वाला सवाल-कम-जवाब ज़ुबां पर आ ही गया।
'जी... छोटे बाबू... समझो... समझो हालात को... अरे सिर्फ जीवन बाबू की नौकरी नहीं... कारपोरेशन की इस तीन मंज़िला सरकारी इमारत में सारी इमारत की भी जांच हो जाए तो भी कोई हमारे इस कमरे में आने की हिम्मत नहीं करता... जानते हो क्यों?' बड़े बाबू का अजीब सा सवाल था।
'हूं... ऊं... हुं... नहीं.. नहीं तो....' नादान शागिर्द जैसा मेरा जवाब आया।
'ये जो अभी थोड़ी देर पहले तुम जिस अजीब सी गंध का ज़िक्र कर रहे थे ना... वो गंध ही है जो इस कमरे के अंदर मौजूद फाईलों.... मेरे... तुम्हारे और इस कमरे के अंदर दम तोड़ते सरकारी सिस्टम के लिए लक्ष्मण रेखा का काम करती है... ये अजीब सी गंध ही है जिसने 28साल की सरकारी नौकरी के मेरे करियर में एक बार भी किसी भी अधिकारी को यहां फटकने भी नहीं दिया... ये गंध ही है जिसमें रमकर फाईलों में मुंह छुपाए हुए कितनी ही बार मैने कितनी ही इन्स्पेक्शन कमेटियों को जांच के दौरान काम में बिज़ी होने का गच्चा दिया है...।' बड़े बाबू का एकालाप जारी था। अब मेरी समझ में भी चूहा प्रेम की ये पीड़ा आने लगी थी। ये चूहा प्रेम दरअसल सरकारी सिस्टम के एक कटु शाश्वत सत्य की तरह मेरे सामने मुंह बाए खड़ा था। मैं मन ही मन सोच रहा था कि देश के सिस्टम से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति कर भी दी जाए तो क्या.... आखिर सिस्टम में फाईलों के निपटारक चूहे और उनके प्रति दफ्तरों के बाबुओं का ये प्रेम जब तक खत्म नहीं होगा... तब तक चूहाचार... मेरा मतलब भ्रष्टाचार जारी रहेगा।
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