Tuesday, November 3, 2015

राजनीति, सम्मान और तितली !


एक तरफ देश के राजनीतिक रूप से सक्रिय बड़े राज्यों में से एक बिहार में चुनाव की पूरी प्रक्रिया और दूसरी तरफ एक सिलसिला पढे लिखे अदीबों की सम्मान वापसी का। देश की आज़ादी के तकरीबन 70 साल होने को हैं.... इस दौर की ये दो तस्वीरें अलग हैं... जुदा हैं... पर दोनों में कितने ही सवाल हैं जो एक जैसे हैं.... बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरीके से भाषा के तमाम बंध और छंद राजनीति के राग पर दम तोड़ गए और अमर्यादा की तान पर जिस तरीके से देश के नीति नियन्ताओं ने हुंकार भरी उसने एक बड़े तबके के ज़हन में ये सवाल तो उठाया ही होगा कि क्या हमें अब भी ऐसी राजनीति की ज़रूरत है... या ऐसी राजनीति और कितने सालों तक की जाएगी... जहां किसी क्षेत्र विशेष के विकास पर खुली चर्चा की बजाए एक दूसरे की छीछालेदर के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.... अकेला बिहार ही क्यों... देश के ज़्यादातर राज्यों में राजनेताओं की भावभंगिमाओं का एक सा ही रूप दिखाई देता है... ये हैरान करने वाली बात है कि 67 साल से ज़्यादा लंबे दौर में ना तो राजनेताओं के तौर तरीके बदले और ना ही आम मतदाता के.... ऐसा लगता है मानों राजनीतिक मंच पर आने से पहले ये नेता एक दूसरे को व्हाट्सएप पर मैसेज देकर आ रहे हों कि आज देखना मैं तुम पर क्या जोक सुनाऊंगा और देखना फिर लोग कैसे पागल बनकर तालियां बजाऐंगे... और मेरे देश का बेचारा मतदाता... जो घर से दाल भात भी ढंग से खाकर नहीं आया होगा.... पर हां अपने मनभावन नेता की हर बात पर पूरा ज़ोर लगाकर नारे भी लगाएगा और तालियां भी पीटेगा... एक मंच पर जहां नेताओं की राजलीला है तो सामने खड़ी जनता भी कभी कभी.... कभी कभी नहीं... बल्कि अक्सर ही ठगी सी नज़र आती है.... नेताओं का स्तर क्या रह गया है... अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कितने ही राज्यों के बड़े बड़े नेताओं के भाषण तो आपको समझ ही नहीं आएंगे... कि जनाब आखिर कहना क्या चाहते हैं.... औऱ क्षेत्रीय दलों के बड़े चेहरे तो उस पृष्ठभूमि से आ रहे हैं जहां पढे लिखे होने के बावजूद भी वो सलीके से अपनी बात कहने की बजाए ठेठ गंवई अंदाज़ में सब कुछ उगल रहे हैं.... और इस सबके बीच एक और सीरीज़ है... सम्मान वापसी की... शुरु के कुछ एक मामलों को गंभीरता से ले लिया गया तो ये भी एक हैशटैग और ट्विटर ट्रैंडिंग बन गया.... किसी देश के कलमकार की मौत दुख का विषय है... पर उस मौत के मर्सिए अपने अंदाज़ में लिख कर खुद को सुर्खियों में लाने की कोशिश क्यों.... सम्मान वापसी करके मेरे देश के अदीब क्या कहना चाहते हैं... क्या ये कोई समझ पाया... नहीं... क्योंकि अब सिर्फ सम्मान वापसी और तीन चार ताज़ा घटनाओं के साथ सब सीमाएं बंध गई हैं.... क्या वाकई देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है... ये भी सवाल ज़रूरी है... फिर तो क्या सोशल नेटवर्किंग साईट्स और ब्लॉगिंग भी बंद हो जाएगी... क्या व्हाट्सएप पर बने ग्रुप भी खाली करा दिए जाएंगे... ये सवाल आपको बचकाने लग सकते हैं... पर दोस्तों अगर ऐसा नहीं है तो क्या ये सम्मान वापसी की होड़ शुरु करने की बजाए.... इन तमाम माध्यमों से आम लोगों तक अपनी बात मेरे देश के सम्मानित अदीब अपनी कलम के ज़रिए नहीं पहुंचा सकते थे.... या ये मान लिया जाए कि सम्मान वापसी क्योंकि सरल और सुप्रसिद्ध रास्ता नज़र आता है इसीलिए अपना लिया जाए भेड़चाल जैसा.... ऊपर से रही सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी है... 5-6 को बिठाओ, आपस में लड़वाओ, और फिर रेटिंग चेक कर लो.... चल जाए तो फिर से दोहरा दो.... राजलीला और अक्षर के क्षर होने के एकालाप के बीच हिंदी सिनेमा में तितली कुछ कहने की कोशिश में है... हर फैमिली फैमिली नहीं होती.... एक ऐसे परिवार की कहानी नज़र आती है जो है तो आम सा ही एक परिवार... पर ये परिवार देश सा लगता है.... प्रोमो देखे हैं फिल्म के... और पूरे देश की तस्वीर में अगर तितली को फिट कर दिया जाए तो ऐसा लगता है मानों देश में राजनीतिक गठबंधन के दौर की अंदरूनी तस्वीर को एक परिवार के ज़रिए किरदारों ने जीवंत कर दिया हो... जहां सब साथ साथ चल भी रहे हैं और मौका मिलते ही एक दूसरे को गिराने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते.... खास बात ये कि तितली में कई चेहरे आपको नए से लगेंगे... मन है जल्दी देखूं... और फिर आप से साझा करूं क्या देखा.... तब तक आप भारत दक्षिण अफ्रीका के बीच टैस्ट और बिहार के राजनीतिक क्रिकेट कप के विजेता का इंतज़ार कीजिए...

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