A फार आवाम या आम लोग मतलब मेरे और आप जैसे आम लोग... इन लोगों का दिल बहलाने के लिए किसी ने इनकी ताकत को नाम दिया लोकतंत्र या जम्हूरियत... और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं हम...हम जिनकी गिनती अपने आप में रिकॉर्ड बनाती जा रही है... मुश्किल ये है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जिस B फार बीमारी से बुरी तरह से प्रभवित हुआ है उसक नाम है B फार भ्रष्टाचार.. अब इस बीमारी का नाम लेते ही हमारे मन में नेता और राजनीति जैसी गालियाँ क्यूं आने लगी भई हम और आप कौन सा दूध के धुले हैं छोटा हो या बड़ा कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ भ्रष्टाचार तो आपने भी किया है और मैने भी...और शायद ये भी सच है कि इसी वजह से ही दिन रात मुल्क के खज़ाने से C फार चोरी करने वाले चंद C फार C!@&%$(ये शब्द Censored है)(और ये भी सच है कि गालियाँ लिखकर ब्लॉग खराब नहीं करना चाहिए)तो चंद C इस देश पर राज कर रहे हैं। पहले अंग्रेज़ों ने लूटा और अब ये ग़ैर हिन्दुस्तानी..। खैर इनका तो लाईफ टाईम मंत्रा बस ये ही है लगे रहो मुन्ना भाई देश को लूटने में ही सही... चिन्ता सबको एक ही है अपना भरे D फार देश और इस देश के वासी जाएं भाड़ में....असल में D फार देशभक्ति के सर्टिफिकेट कुछ इस स्पीड से बंटे है कि सब सिर्फ अपने खासमखास लोगों तक ही रह गए और D फार देशवासी अपने दुखों के चक्कर में फंसकर रह गए.... अब E फार इंटरटेनमैंट जैसी इस राजनीति में F फार फेल और पास कौन कब कैसे और कितना हुआ है इसके लिए ज़्यादा G फार ज्ञान लेने की ज़रूरत नहीं... पिछले दो-चार चुनावों उपचुनावों के नतीजे उठा करके देख लो आइडिया लग ही जाएगा। किसको जनता ने H फार हार पहनाए और किसके H फार हाथ में बाबा जी का ठुल्लू पकड़ाया... और क्यों... ये
जिसे समझ में आया उसका I फार इंटेलिजेंस क्वॉशेंट यानि आई. क्यू. वाकई दमदार है.... खैर, चुनाव की हार जीत को छोड़िए... आइए अपनी बात करें... भई सारा देश सिर्फ राजनीति से थो़ड़े ही चलता है कुछ योगदान तो इस में देश की J फार जनता का भी है.... तो ये जय-जयकार करने वाली जनता कब किसकी नैया डुबो दे और कब किसे बिना कुछ किए बादशाह बना दे ये तो खुद जनता को भी पता नहीं होता.... और सुनाइये क्या हाल हैं आपके.... बातचीत का सिलसिला ऐसे ही शुरू होता है ना... जब भी किसी दोस्त से मिलते हैं... तो आप से मेरी दोस्ती तो काफी पुरानी है कम से कम 3 से 5 मिनट पुरानी तो है ही ना... अरे भई अगर आप इस देश की ए बी सी डी को पढते हुए यहां तक पहुंचे है तो आप मेरे दुश्मन तो होंगे नहीं... दोस्त ही होंगे... तो दोस्त हाल कैसे हैं आपके... ये अगर आप कुछ ऐसे बयान करने जा रहे हैं कि हाल क्या है दिलों का ना पूछो सनम... इस बार का बजट तो K फार कहर ढा गया... ना तो इनकम हुई और ना टैक्स कम हुआ... न्यू इंडिया का ये सपना किसको दिखा गया... अरे... अरे अरे... क्या हुआ... आप तो बुरा ही मान गए... क्या कहा मैने जले पे नमक छिड़क दिया.... आंख में उंगली कर दी... नहीं नहीं जनाब ऐसा नहीं वो तो आपसे L फार लव और L फार लगाव इ्तना
ज़्यादा है कि आपका हाल चाल पूछना मेरा फर्ज़ है.... अब अगर आपको मेरे सवालों पर मेरी बातों पर गुस्सा आ रहा है तो मुझे नहीं बल्कि M फार... अरे नहीं नहीं...ये नाम नहीं लिखना क्या पता भगतों को बुरा लग जाए... और फिर मेरे इन प्यारी सी बातों पर देश की संस्कृति और सभ्यता के तमाम बड़े पहरेदार तहज़ीब और अदब की अति वाली भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दें... भई आज कल N फॉर नेशनलिज़्म यानि देशभक्ति और M फॉर माननीय की भक्ति आपस में इतने रड्ड गड्ड किए जा रहे हैं कि कभी कभी लगता है जैसे... चलिए छोड़िए... हम O फार ओनली वन देश के बारे में बात करें.... वैसे हमारा देश और उनका देश देखें तो वो एक नज़्म हल्की-सी याद आती है कि
एक हमारी और इक उनकी, मुल्क में हैं आवाज़ें दो.... अब ये तुम पर कौन सी तुम आवाज़ सुनों तुम क्या मानों.... हम कहते हैं इंसानों में इंसानों से प्यार रहे वो कहते है हाथों मे त्रिशूल रहे तलवार रहे. हम कहते हैं बेघर बेदर लोगों को आबाद करो वो कहते हैं भूले बिसरे मंदिर मस्जिद याद करो...
अब लिखी किसने थी ये नज़्म ये मुझे तो पता है पर मैं यहां शेयर नहीं करूंगा... वरना ये कविता भी धर्म के रंग में रंग जाएगी और मैं देशभक्त या देशद्रोही बन जाउंगा...... आप सिर्फ नज़्म मेरा मतलब कविता का मर्म समझिए.... वैसे फरवरी का महीना चल रहा है और ये महीना तो वैसे ही P फार प्यार का महीना है... सिर्फ इसलिए नहीं कि P फार पाश्चात्य संस्कृति के असर में आकर मैं वैलेंटाईन की बात कर रहा हूं बल्कि इसलिए भी क्योंकि हमारी संस्कृति के मुताबिक बसंत की बहार भी छा चुकी है.... कितने ही अलग अलग Q फार क्वालिटी के फूल कितनी ही Q फार क्वांटिटी में अलग अलग बाग बगीचों में खिल गए हैं... वैसे हिन्दी वाले फूलों के साथ साथ अगर अंग्रेज़ी वाले फ़ूलों की बात भी करें तो ये कभी भी किसी भी मौसम में या बेमौसमी बे साख्ता कहीं भी खिल जाते हैं.... क्या कहा आपने... आपने ऐसे अंग्रेज़ी वाले फ़ूल नहीं देखे.... अरे हुज़ूर थोड़ा सा इंतज़ार कीजिए... बस 12-13-14 तारीख के आस पास ये दिखेंगे आपको... पहली बार नज़र आएगा कि डालियों पर फूल नहीं है बल्कि अंग्रेज़ी फ़ूलों के हाथों में डालियां है... डंडे है... और ना जाने क्या क्या... और इन अंग्रेज़ी फ़ूलों का शिकार होंगे वो मासूम से अंग्रेज़ फ़ूल और कलियां.... जो बसंतोत्सव में खिलने की कोशिश करेंगे.... वैसे एक सवाल तो है कि जिस देश में प्यार का R फार रंग इतना गहरा माना गया हो... जो छुड़ाए से भी ना छूटे.... उस देश में ऐसे अंग्रेज़ी फ़ूलों की बिना क्वालिटी वाली फ़सल को पानी कौन देता है.... अपने आस पास झाँक कर देखिएगा ज़रा.... ये S फार समझदारी के नाम पर सिर्फ ज़हर घोलने वाले अंग्रेज़ी फ़ूल आपको किसी भी भेस में नज़र आ जाएंगे.... कहते हैं कि T फार टाईम यानि वक़्त हर किसी को बदल देता है.... पर इन अंग्रेज़ी फ़ूलों की सोच और विचार के साथ साथ आचार व्यवहार कितने ही T फार टाईम से जस के तस हैं... पूरी दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम कहने वाले देश के परिवार में ये अंग्रेज़ी फ़ूलों का फ्लेवर समझ से परे है.... U फार यूनिटी यानि एकता के नाम पर कैसे इन लोगों ने समाज को टुकड़े टुकड़े करके देश के दुश्मनों को पनपने का मौका दिया है उसे ये चाहकर भी कभी नहीं समझ पाएंगे... वो किसान के बेटों वाली कहानी इन के स्कूलों में शायद थी ही नहीं जिसने अपने बेटों को लकड़ी के गट्ठे की तरह एक साथ बंधकर रहने का सबक दिया था... इन्होंने तो गट्ठा ही खोल दिया.... खोला ही नहीं बल्कि लकड़ियों को अलग अलग कर कहीं तो़ड़ रहे हैं कहीं जला रहे हैं.... हैरानी होती है कि हमारे देश में जो V फार वैष्णव जन तो तेणे कहिए जो पीर पराई जाणे रे वाला भजन चलता था क्या वो इन लोगों के कानों तक नहीं पहुंचता.... क्या इन्हें किसी ने ये नहीं बताया कि W फार वर्ल्ड के लिए W फार वार की नहीं बल्कि पीस यानि शाँति की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है.... क्यों इन्हें समझ नहीं आता कि इनका X फार Axe फैक्टर इस देश के टुकड़े टुकड़े करने में लगा है और अगर यही हाल रहा तो दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत एक ऐसे Z फार ज़लज़ले का शिकार होगी कि कोई नामलेवा भी ना बचेगा.... काश ये समझ जाएं...कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.... क्यों कहा गया था....?
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