Friday, January 3, 2014

कैसे कहूं क्या सोचा था?



हो गई है पीर पर्वत सी मगर पिघली नहीं
इस हिमालय से कोई गंगा अभी निकली नहीं
परदों के मानिंद हिल, दीवार जस की तस खड़ी,
कैसे पूछूं किससे पूछूं, बुनियाद क्यूं हिलती नहीं,
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद ना था...
शोरोगुल में बातें दबी, सूरत मगर बदली नहीं,
मेरा सीना आग में जल जल कर राख हो गया
तेरे सीने में अभी चिंगारी भी सुलगी नहीं....

गगन

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