Wednesday, January 1, 2014

बिना लोक का तंत्र...


ओ भविष्य की 30 वोटों...
माफ करना
मुझे कहना पड़ा
क्या हुआ अगर तुम मासूम थे
आने वाले दिनों में तो बड़े हो जाते...
फिर वोट बनते...
और हिस्सा बन जाते
उसी भीड़ का
जो सैफई में मौजूद..
तुम्हारी कब्रगाह से 400 किलोमीटर दूर
शामिल है राजा के जश्न में...
या फिर बाहर खड़े होकर
आम आदमी जैसे
नारे लगाते जश्न के खिलाफ...
या फिर शायद..
दिल्ली में एक नई आस के साथ
राह देखते कि
आम आदमी वाले आएंगे
तुम्हारे दुखड़े सुनने...
इस देश में होते
तो कोई ना कोई मुहर
लगती तुम पर भी
लोकतंत्र की ये कौन सी
परिभाषा है...
कोई बताएगा...

गगन

No comments:

Post a Comment