काहे
वो सब
जो अनकहा था
दबा कुचला सा पड़ा था कहीं
गुलाब की कली हर बार खिले
उनसे हर बार मिलें
बातें हों... मुलाकातें हों...
मैने कब चाहा था ऐसा
हां....
चाय की चुस्कियां
तो ले ही सकते हैं ना...
एक साथ...
इकट्ठे...
फिर उसी दुकान पर
कोने वाली मेज
और दो कुर्सियों के जुगाड़ पर
सोफे की फीलिंग लेते
आओ...खो जाएं
सपनों की दुनियां में
थोड़ा सा दीवाने हो जाएं......
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